शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश पटल ] [ ४७१ वलय के विभ्रम का उद्वहन करती हुई पाँच पद्मों का विदलन कर समुद्भवत है ।६३। हे माता ! महेश्वर देव की कुटुम्बिनी । उससे निर्गत अमृत रस से अभिविक्त गात्रीं वाली उस मार्ग से पुनः निलय को प्राप्त हुई आप जिनके हृदय में स्फुरण किया करती है वे मनुष्य मुक्त होकर पुनः गर्भ में नहीं आया करते हैं ।६४। लम्बमान कुन्तलों के भार से अभिराम मुख वाली तथा पीवर स्तनों वाली और शरीर के कृश मध्य भाग वाली, चिन्ताक्ष सूत्र से कलश से लिखित हस्तों वाली हे गौरी ! मैं मन से बारम्बार आपकी मूत्ति का आवर्त्तन किया करता हूँ ।६५। योग में समाधिस्थ होकर छं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके प्रसन्न मन से इन्द्रियों के गण को आवृद्ध करके पाश-अंकुश-अभय और वरदान से सुशोभित दोनों करों वाली हे भुवनेश्वरि! सुरक्त वर्ण वाली आपको योगीगण देखा करते हैं ।६६ उत्तप्तहाटकनिभैः करिभिश्चतुर्भीरा- वर्जिताऽमृतघटैरभिषिच्यमाना । हस्तद्वयेन रुचिरे नलिने वहन्ती- पद्मापि साभयवरा भवति त्वमेव ।६७ अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि- र्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिराजम् । दूर्वादलद्युतिरमर्त्यविपक्षपक्षांन् न्यक्कर्वतो त्वमसि देवि ! भवानि ! दुर्गा ।६८ आविन्निदाघजयशीकरशोभिवक्त्रां गुञ्जागुणेन परिकल्पितहारयष्टिम् । पत्रांशुकामसितकान्तिमसङ्गतन्त्रमाद्यां पुलिन्दतरुणामसकृत्स्मरामि ।६६ हंसैर्गतिक्कणितनूपुरद्रकृष्टै- मूर्त्तिरिवाथंवचनैरनुगम्यमानौ !