शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४७० ] [ श्रीशारदा तिलक येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयुर्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि ! गर्भभाजः । ६४ आलम्बिकुन्तलभरामभिरामवक्त्रा- मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् । चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्य- हस्तामावर्तयामि मनसा तव गौरि ! मूर्तिम् । ६५ आस्थाय योगमविजित्य च वैरिशट्- कमावध्य चेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने । पाशांकुशाभयवराढ्यकरां सुरक्तामा- लोकयन्ति भुवनेश्वरियागिनस्त्वाम् ।६६ कलाओं का अधिप चन्द्रमा कुमुदिनीको आनन्दित करता है । कम- लिनी मध्यने तर को नहीं करता है । एक के मोदन विधि में उसका स्तवन किया जाता है फिर आप तो समस्त प्रप'च को अपने ! दृष्टिपात के द्वारा आनन्दित किया करती है ।७६। समस्त जगतों की आप आद्या हैं अर्थात सब जगतोंसे प्रथम हुई हैं तो भी आप नवयौवन धारण करने वाली हैं। आप पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं तो भी अत्यधिक कोमल हैं, त्रयी को उत्पन्न करने वाली हैं तो भी उस त्रयी के द्वारा समीक्षिता नहीं है। हे गौरि ! आप ध्यान करने के योग्य हैं तो भी मन के मार्ग में स्थित नहीं होती हैं अर्थात मनके द्वारा अचिन्तनीय हैं ।६०। अत्यन्त दुर्लभ मनुष्यों में चिरकाल में दुर्लभ जन्म पाकर भी इन्द्रियों को पटुता प्राप्त किया करता है। हे जगतों के जनन करने वाली ! जो मनुष्य आपका अर्चन नहीं किया करते हैं वे मनुष्य निःश्रेणिका पर अधिरोहण करके भी पुनः अधः पतित हो जाया करते हैं ।६१। हे भवानी ! जो मनुष्य कपूर के चूर्णसे शीतल जल से लोलित चन्दन से और सुन्दर गंध वाले पुष्पों से समुत्सुक होते हुए अशेषभुवनों के अधिभू के प्राप्त करने का प्रयत्न किया करते हैं ।६१। प्रथम सरोज में मध्य पदवी में आविष्ट होकर ! सुप्ताहि राज सदृश विश्व को विरचित करके विद्युल्लता के