भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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विंश पटल ] [ ४६१ शिव का अर्चन करती हुई शिव की अर्द्धाङ्गिनी आपकी कल्याण का विस्तार करें ।७५। सिन्दूरपुञ्जनिभमिन्दुकलावतंसमानन्दपूर्णनयनत्रयशोभिवक्त्रम् आपीनतुङ्गकुचनम्रममङ्गतन्त्र शम्भोः कलत्रममितां श्रियमातनोतु ॥७६ नयनकमलैर्दीर्घादीर्घैरलङ्कृतदिङ्मुखम् । विनतमरुतां कोटीपाग्रैर्निघृष्टपदाम्बुजम् ॥ तरुणशकलं चान्द्रं बिभ्रद्घटस्तनमण्डलम् । स्फुरतु हृदये वन्धू कामं कलत्रमुमापतेः ॥७७ वर्णैरर्णवषड् दिशारविकलाचक्षुर्विभक्तैः कृपा- दाद्यै - सादिभिरावृताक्षहयुतैः षट्चक्रमध्यानिमान् डाकिन्यादिभिरक्षितान्परिचितान् ब्रह्मादिभिर्देवतै भिन्दाना परदेवता त्रिजगतां चित्ते विधत्तां मुदः ॥७८ सिन्दूर के समूह के समान चन्द्र की कला के आभूषण वाली, आनन्द से परिपूर्ण तीन नेत्रों के ज्ञाता सुशोभित मुख से संयुक्त, स्थूल और ऊंचे स्तनों के द्वारा नम्र ऐसी कामदेव की तन्त्र स्वरूप भगवान् शम्भु की भामिनी अपरिमित श्री का विस्तार करे ।७६। बड़े-बड़े नेत्ररूपी कमलों के द्वारा दिशाओं के मुख को अलंकृत करने वाली, विनम्र मरुतों के कोटीराग्रों द्वारा पदाम्बुजों को निघृष्ट तरने वाली, तरुण खन्ड वाले चन्द्रमा से घटस्तन मन्डल को धारण किये हुये बन्धूक के सदृश उमापति की भामिनी हृदय में स्फुरण करे ।७७। अर्णवषट् दिशाओं से रविकला रूपी चक्षु से विभक्त वर्णों से क्रमशः आद्यसादि