भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 492, कुल 511 में से

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४६२ ] [ श्रीशारदा तिलक से आवृताक्षह से संयुत इन षट्चक्रों के मध्यों को डाकिनी प्रभृति से आश्रित और ब्रह्मादि देवों से परिचित तीनों जगतों कें परदेवों का भेदन करती हुई, चित्त में आनन्द में करे ।७८। आधार से गुण वृत्त द्वारा शोभा युक्त वपु, सत्वर निर्गत्वरा, कमलों का भेदन करने वाली आनन्द प्रबोध के उत्तर चिन्मयघना, संक्षुब्ध ध्रुवमण्डल से अमृत करों द्वारा प्रस्पन्दमान अमृत का स्रोत, कन्दलिता अमन्द विद्युत् के समान आकार वालो भगवती भवानी की भावना करनी चाहिये ।७६। ➖➖ एकविंश पलट ॥ गायत्री महिमा ॥ प्रणवाद्या व्याहृतयः सप्त स्युस्तत्पदादिकाः ।१ चतुर्विंशत्यक्षरात्मा गायत्री शिरसान्विता ।२ सर्ववेदोद्धृतः सारौ मन्त्रोऽयं समुदाहृतः । ब्रह्मा देव्यादिगायत्री परमात्मा समीरिताः ।३ ऋष्याद्याः प्रणवस्यैते मुनिभिः परिकीर्तिताः ।४ जमदग्निभरद्वाजभृगुगौतमकश्यपान् । विश्वामित्रवसिष्ठाख्यौह व्या तीनामृषीन्विदुः ।

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