शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोविंश पटल ] । ५६६ संशय का अवसर नहीं है। और यह महालक्ष्मी की कृपा छै मासों के ही अन्दर हो जाती है ।३१। ब्रह्मत्व की श्री की प्राप्ति के लिये तो ब्रह्म वृक्ष अर्थात् पलाश के पुष्पों से हवन करना चाहिये। इस विषय में बहुत अधिक कथन करने से क्या लाभ है। केवल यही कहना पर्याप्त है कि ठीक रीति के अनुसार भलीभाँति साधित की हुई द्विजों के लिये यह विद्या सिद्ध होती है और सभी कामनाओं के दोहन करने वाली मानी गयी है। ३२-३३। अब त्रिष्टुप् मन्त्र को बताया जाता है। यह आग्नेय मन्त्र है। जैसा मैं कहता हूँ यह सभी अर्थों का साधक मन्त्र है। यह ऋग्वेद का मन्त्र है। मन्त्र-“ओ३म् जातवेद से सुनवाम सोम मरातीयतोनिदहाति वेदः । मनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धु न्दुरितात्याग्निः ।" इस महामन्त्र का मारीच कश्यप ऋषि कहा गया है। इसका त्रिष्टुप् छन्द है और इसका देवता जातवेद अग्नि कहा गया है ।३४। नौ, सात, छै, सात और आठ तथा सप्त मूलमन्त्र के वर्णों के द्वारा इसकी षडङ्ग विधि अर्थात् छं अङ्ग न्यासों की विधि कही गयी है ।३५। सप्तभिर्मूलमन्त्रार्णैः षडङ्गविधिरीरितः । अगुष्ठगुल्फजंघासु जानुनोरुरुयुग्मके ।।३६ कट्यन्धुनाभिषु हृदि स्तनयोः पार्श्वयोर्द्वयोः । पृष्ठतः स्कन्धयोर्मध्ये बाहुमूलोपबाहुषु ।।३७ प्रकूर्परप्रकोष्ठेषु मणिबन्धतलेषु च । मुखनासाक्षिकर्णेषु मस्तमस्तिष्कमूर्द्धसु ।।३८ क्रमेणविन्यसेद्वर्णान्मन्त्री मन्त्रसमुद्भवान् । शिखाललाटनयनकर्णोष्ठरसनास्वथ ।।३६ सकण्ठबाहुहृत्कुक्षिकटिगुह्योरुजानुषु । जंघयोः पदयोर्न्यस्येतपदान्यस्त मनोः सुधीः ।।४०