भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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तृतीय पटल ] [ ६७ याग में स्रुवको आगे बतलाये जाने वाले मार्गसे ही कल्पित करना चाहिये। गुरु को चाहिये कि शिशपा-श्रीपर्णी और दूध वाले वृक्षों का एक भाग ग्रहण करके उसको एक हाथ प्रमाण वाला भाग विभक्त करे। फिर छत्तीस विभाजन करे। बीस अंश से दण्ड होता है उन आठों से वेदी होतो है ।६४-६५। एक अंश से मित कण्ठ होता है और सात भागों से मित मुख होता है। कण्ठ का विस्तार वेदी के तीन अंश से कहा गया है।६३। अग्रभाग कण्ठ के समान होता है और मुख में मार्ग की कल्पना करनी चाहिये। कनिष्ठिका अंगुलि के मान से घृत के निर्गम के लिये वेदी के मध्य में एक भाग से कणिका की रचना करनी चाहिये। उसके बाहिर एक अंश से दोनों ओर अवट बनावे ।६७-६८। तस्य खातं त्रिभिर्भागैर्वृत्तं र्द्धांशतो भवेत् । अंशेनैकेन परितो दलानि परिकल्पयेत् ।६६ मेखला मुखवेत्रोःस्यात्परितोऽर्द्धाशमानतः । दण्डमूलाग्रयोः कुम्भौ गुणवेदांगुलै क्रमात् ।१०० गण्डीयुगं यमांशः स्याद्दण्डस्य नाह ईरितः । षड्भिरंशैः पृष्ठभागो वेद्याः कूर्माकृतिर्भवेत् ।१०१ उसका खात (गर्त) तीन भागों से और अध अंश से वृत होता है। एक अंश से सब ओर दलों की परिकल्पना करनी चाहिये । ।६६। चारों ओर अर्धांश मान से मुख वेदियो की मेखला होती है । क्रम से दण्ड के मूलाग्रो में गुण वेदांगुलो से दो कुम्भ बनावे । यमांश गन्डी युग होता है यह दण्डका आनाह कहा गया है । छै अंशों से वेदी का पृष्ठ भाग कूर्मकी आकृति वाला हुआ करता है ।१००-१०१। हंसस्य वा हस्तिनो वा पोत्रिणो वा मुखं लिखेत् । मुखष्य पृष्ठभागेऽस्थाः संप्रोक्त लक्षणं स्रुचः ।१०२ स्रुक्चतुर्विंशतिभिर्भागैरारचयेत्स्रुवम् । शंविंशत्या दण्डमानमंशैरेतस्य कीर्तितम् ।१०३