शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ ] [ श्रीशारदा तिलक चतुर्भिरशैरानाहः कर्षराज्यग्रहि तच्छिरः । अंशद्वयेन निखनेत्पङ्के मृगपदाकृति । १०४ दण्डमूलाग्रयोर्गण्डी भवेत्कङ्कणभूषितः । स्रुवस्य विधिराख्यातः कथ्यते (१) मण्डलान्यथ । १०५ चतुरस्रे चतुष्कोष्ठे कर्णसूत्रसमन्विते चतुष्वंपि च कोष्ठेषु कोणसूत्रचतुष्टयम् ।१०६ मध्ये मध्ये यथा मत्स्या भवेयुः पातयेत्तथा । पूर्वापरायते द्वे द्वे मन्त्री याम्योत्तरायते ।१०७ पातयेत्तेषु मत्स्येषु समं सूत्रचतुष्टयम् । पूर्ववत्कोणकोष्ठेषु कर्णसूत्राणि पातयेत् ।१०८ हंस का अथवा हाथी का पोत्रि का मुख लिये । मुख के पृष्ठ भाग में इस स्रुव का लक्षण कहा गया है ।१०२। स्रुच के चौबीस भागों के द्वारा स्रुव की रचना करनी चाहिये इससे वाईस अंशों से दड का मान कीर्त्तित कियागया है ।१०३। इनके चार अंशोसे आनाह होता है और दो अंश से शिर बनावे वह कर्षराज्यग्राही अर्थात् पंक में मृगपदा- कृति होता है । षोड़शमास कर्ष कहा जाता है ।१०४। दन्ड के मूल के अग्रभागों में कंकण से भूषित गन्डी अर्थात् घट होता हे । स्रुवकी विधि तो बतला दी गयी है । अब मण्डल कहे जाते हैं ।१०५। कर्ण सूत्रसे सम- न्वित चतुरस्र चार कोष्ठ है । उन चारों कोष्ठों में कोण सूत्रका चतुष्टय मध्य-मध्य ये उसी भाँति पालन करे जिससे मत्स्य हो जावें । मन्त्रधारी पूर्व परायत दो-दो याम्य और उत्तरमें आयत उन मत्स्योंमें समान चार सूत्रों का पालन करे । पूर्व की ही भाँति कोणों के कोष्ठों में कर्ण सूत्रों का पालन करना चाहिये ।१०६-१०८। तदुद्भूतेषु मत्स्येषु दद्यात्सूत्रचतुष्टयम् । ततः कोष्ठेषु मत्स्याः स्युस्तेषु सूत्राणि पातयेत् ।१०६ यावच्छूद्वयं मन्त्री षट्पञ्चाशत्पदान्यपि । तावत्तेनैव विधिना तत्रसूत्राणि पातयेत् । ११०