शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय पटल ] [ ६६ षट् त्रिंशता पदैर्मध्ये लिखेत्पद्म' सलक्षणम् । बहिः पड् क्त्या भवेत्पीठं पंक्तियुग्मेन वीथिकाम् ।१११ द्वारशोभोपशोभास्त्रान् शिष्टाभ्यां परिकल्पयेत् । शास्त्रोक्तविधिना मन्त्री ततः पद्मं समालिखेत् ।११२ पद्मक्षेत्रस्य सन्त्यज्य द्वादशांशं बहिः सुधीः । तन्मध्यं विभजेद्वृत्तै स्त्रिभिः समविभागतः ।११३ आद्य' स्यात्कर्णिका स्थानं केशराण द्वितीयकम् । तृतीय पद्ममन्त्राणामुक्तांशेन दलाग्रकम् ।११४ उससे समुत्पन्न हुये मत्स्यों के चार सूत्र देवे । जिन कोष्ठोंमें मत्स्य होते हैं उनमें सूत्रों का पालन करे ।१०६। मन्त्रधारी को चाहिये कि जब तक दो सौ छप्पन होवे तब तक उसी विधि से वहाँ पर सूत्रों क पालन करता रहे । ११० । छत्तीस पदों से मध्य में लक्षण के सहित पद्म का लेखन करे । बाहिर पंक्ति से पीठ होती है और दो पंक्तियों से वीथिका होती है और शिष्टों के द्वारा द्वारशोभा और उप शोभास्त्रों को परिकल्पित करना चाहिये । फिर मन्त्र के धारण करने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह शास्त्रों में वर्णित विधि से पद्म को समालिखित करे ।१११-११२। सुधी को चाहिये कि बाहिर पद्म क्षेत्रके द्वादश अंश का भली भाँति परित्याग करके उसके मध्य का सम विभाग से तीन वृत्तों के द्वारा विभाजन करे ।११३। उक्त अंश से आदि में होने वाला कर्णिका का स्थान है—दूसरा केसरों का है और तीसरा पद्म पत्रों का दलाग्र का स्थान होता है । १४। बाह्यवृत्तान्तरालस्य मानेन विधिना सुधीः । निधाय केसराग्रेषु परितोऽर्द्धं निशाचरान् । ११५ लिखित्वा सन्धिसस्थानि तत्र सूत्राणि पातयेत् । दलाग्राणां च यन्मानं तन्मानं वृत्तमालिखेत् । ११६ तदन्तराले तन्मध्यसूत्रस्योभयतः सुधीः । आलिखेद्वाह्यहस्तेन दलाग्राणि समन्ततः ।११७