शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंय पटल ] [ ७१ विल्वादिपत्रजं श्याममित्युक्तं पञ्चवर्णकम् । अंगुलोत्सेधविस्ताराः सीमारेखाः सिताः शुभाः । १२४ कर्णिकां पीतवर्णेन केसपाण्यरुणेन च । शुभ्रवर्णेन पत्राणि तत्सन्धिः श्यामलेन च । १२५ रजसा रञ्जयेन्मन्त्री यद्वा पीतैव कर्णिका । केसराः पीतवर्णाक्ताः अरुणानि दलानि च । १२६ सन्धयः कृष्णवर्णाः स्युः पीतेनाप्यसितेन वा । रञ्जयेत्पीठगर्भाणि पादाः स्यु रुणप्रभाः । १२७ अवशिष्ट छै पदों से कोणों का चतुष्टय होता है। उस मण्डल को परम मनोहर पाँच वर्णों के द्वारा रंजित करना चाहिये । १२२। पीला हल्दी का चूर्ण होता है और श्वेत तण्डुलों का चूर्ण है-कुसुम्भों का चूर्ण अरुण वर्ण माला होता है। और पुलाकज जलाया हुआ कृष्ण होता है । १२२। विल्व आदि के पत्तों समुत्पन्न श्याम होता है-ये पांच वर्ण कहे गये हैं। एक अद्भूत उत्सेध (ऊँचाई) और विस्तार से समन्वित सित एवं शुभ सीमा की रेखाये होती हैं । १२४। कर्णिका को पीत वर्ण से और अरुण वर्ण से केसरों को—शुभ्र वर्ण से पत्रों का और उनकी सन्धि को श्यामल वर्ण से रजक द्वारा मन्त्रधारी रंजन करे अथवा कर्णिका पीत ही होवे । केसर पीत वर्ण से अक्त होवे और दल अरुण होवे । १२५-१२६। सन्धियाँ कृष्ण वर्ण वाली होवें या पीत अथवा सित से युक्त होवें । पीठ के गर्भों का रंजन करे और पाद अरुण प्रभा वाले होने चाहिये । १२७। गात्राणि तस्य शुक्लानि विथीषु च चतसृषु । आलिखेत्कल्पलतिका दलपुष्पफलान्विताः । १२८ वर्णैर्नानाविधैश्चित्राः सर्वदृष्टिमनोहराः । द्वाराणि श्वेतवर्णानि शोभा रक्ताः समीरिताः । १२६ उपशोभाः पीतवर्णाः कोणांन्यसितभांसि च । तिस्रोरे (ले) खा बहिः कुर्यात्सितरक्तासितैः (१) क्रमात् । १३०