शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ ] [ श्रीशारदा तिलक मण्डलं सर्वतो भद्रमैतत्साधारणं स्मृतम् । चतुरस्रां भुवं भित्वा दिग्भ्यो द्वादशधा सुधीः ।१३१ पातयेत्तत्र सूत्राणि कोष्ठानां दृश्यते शतम् । चतुश्चत्वारिशदाढ्यं पश्चात्षट् त्रिंशताम्बुजम् ।१३२ कोष्ठैः प्रकल्पयेत् पीठं षड् त्तं या नैवांत्र वीथिका । द्वारशोभे यथा पूर्वमुपशोभा न दृश्यते । १३३ अवशिष्टैः पदैः कुर्यात्षड्भिः कोणानि तन्त्रवित् । विदध्यात्पूर्ववच्छेषमेवं वा मण्डलं शुभम् ।१३४ चारों वीथियों के उसके पात्र शुक्ल होवे । फिर दलों-पुष्पों और फलों से संयुत कल्प लतिका का आलेखन करे ।१२८। नाना प्रकार के वर्णों के चित्र होवें तथा सब की दृष्टि में मन को हरण करने वाली होवे । द्वार श्वेत वर्ण के होवे तथा शोभा रक्त बतलाई गई है ।१२६। उपशोभा पीत वर्ण वाली होवे और कोण असित होवे । उसके वाहिर क्रम से सित—रक्त--असित तीन रेखायें बनावें ।१३०। यह साधा- रण सर्वतोभद्र मण्डल बताया गया है । चौकोर भूमि का भेदन करके द्वादश प्रकार से सुधी दिशाओं में सूत्रों का पातन करे तो सौ कोष्ठ दिखलाई दिया करते हैं। जो चौवालीस से युक्त और पीछे छत्तीस अम्बुजों वाला होता है ।१६१-१६२। कोष्ठों के द्वारा पीठ को कल्पित करे । यहां पर पंक्ति से वीथिका नहीं होती है । द्वार शोभाऐं जैसी पूर्व में है होती है और उपशोभा दिखलाई नहीं देती ।१३३। तन्त्र का ज्ञाता नवशिष्ट पदों से जो षट् है कोणों की रचना करे । शेष सभी पहिली ही भांति समझना चाहिये । इसप्रकार से शुभ मण्डल होता है । ।१ ३४। चतुरस्रे चतुष्षष्टिप (पा) दान्यारचयेत्सुधीः । पदैश्चतुर्भिः पद्मं स्यान्म (१) ध्ये तत्परितः पुनः ।१३५ बोथीश्चतस्रः कुर्वीत मण्डलान्तावसानिकाः । दिग्गतेष चतुष्केषु पङ्कजानि समालिकेत् १३६