भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्थ पटल ] [ ७५. तन्त्र में सम्प्रदायों के आवहन करने वाली है। आचार्य को चाहिए कि वह विधि के सहित स्नान करे और पूर्वार्चन में होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं को पूर्ण करे ४। सब प्रकार से समलङ्कृत होकर मौन व्रत धारण करके याग के सम्पादन करने के लिए याग मण्डप में प्रयाण करे। वहाँ पर जाकर आचमन करे और सामान्य अर्ध्य देवे ।५। द्वार को अस्त्र के जल से प्रोक्षण करके फिर द्वार पूजा करने का समा- चरण करे। वहाँ पर ऊर्ध्व उदुम्बर में महालक्ष्मी और सरस्वती का यजन करे। फिर दक्षिण की ओर वालो शाखा में विघ्नराज का और अन्य ओर क्षेत्रेश का अर्चन करे। उन दोनों के पार्श्व से संस्थित गङ्गा और यमुना का पुष्पों सहित जल से यजन करे। प्रति द्वार में क्रम से देहली में अस्त्र का अर्चन करना चाहिए। इसके अनन्तर आचार्य दिव्य दृष्टि से अवलोकन करे ।६-८। दिव्यानुत्सारयेद्विघ्नानस्त्राद्भिष्चान्तरिक्षान् । पाष्णिघातैस्त्रिभिर्भौमानिति विघ्नान्निवारयेत् ।६ किंचित्स्पृशन्वामशाखां देहलो लङ्घयेद्गुरुः । अङ्गं संकोचयन्न्तः प्रविशेदक्षिणाऽङ्घ्रिगा ।१० नैऋत्यां दिशि वास्त्वीशान् (शं) ब्रह्माणं च समर्चयेत् । पञ्चगव्य।घृतोयाभ्यां प्रोक्षयेद्यागमण्डपम् ।११ चतुष्पथान्तं तच्छुद्धिं विदध्याद्वीक्षणादिना । वीक्षणं मूलमन्त्रेण शरेण प्रोक्षणं मतम् ।१२ तेनैव ताडनं दर्णैर्वर्मणाभ्युक्षणं मतम् । चन्दनागरुकर्पूरैर्वूर्पयेदन्तरं सुधीः ।१३ अन्तरिक्ष में रहने वाले दिव्य विघ्नों का अस्त्र के जल के द्वारा उत्सारण करे। पाष्णि घात तीनों से भूमिगत विघ्नों का निवारण करना चाहिये ।६। वामशाखा का कुछ स्पर्श करके गुरु देहलीका लङ्घन करे। अपने अङ्ग का संकोच करते हुए ही दाहिने चरण के द्वारा उनमें प्रवेश करना चाहिए ।१०। नैऋत्य दिशा में वास्तु के ईशों का और