भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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७६ ] [ श्रीशारदा तिलक ब्रह्मा का समर्चन करे। फिर पञ्चगव्य और अर्घ्य के जल से याग मण्डप का प्रोक्षण करना चाहिये ।११। चतुष्पथ के अन्त पर्य्यन्त उसकी शुद्धि वीक्षण आदि के द्वारा करे। वीक्षण मूल मन्त्र के द्वारा और शर के द्वारा प्रोक्षण माना गया है ।१२। उसी के द्वारा दर्भों से ताड़न और वर्म के द्वारा अभ्युक्षण माना गया है। इसके अनन्तर सुधी को चाहिये कि चन्दन-अगरु और कपूर से धूप देवे ।१३। विकिरान्विकिरेत्तत्र सप्तजप्ताञ्छराणुना । लाजाश्चन्दनसिद्धार्थ भस्मदूर्वाङ्कु राक्षताः ।१४ विकिरा इति सन्दिष्टाः सर्वविघ्नौघनाशनाः । अस्त्रजप्तेन दर्भाणां मुष्टिना मार्जयेच्चतान् ।१५ ईशस्य दिशि वर्द्धन्या आसनाय प्रकल्पयेत् । पुण्याह वाचयित्वा तु ब्राह्मणान्परितोष्य च ।१६ उक्तेषु मण्डलेष्वेकं वेदिकायां समालिखेत् । विशेन्मृद्वासने मन्त्री प्राङ् मुखो वाप्युदङ्मुखः ।१७ बद्धपद्मासनो मौनी समाहितजितेन्द्रियः । स्थापयेद्दक्षिणे भागे पूजाद्रव्याणि देशिकः । १८ सुवासिताम्बुसम्पूर्ण सव्ये कुम्भं सुशोभनम् । प्रक्षालनाय करयोः पश्चात्पात्रं निवेशयेत् । १६ वहाँ पर सात बार जाप किये शराणु से विकिरों का विवरण करना चाहिये । लाजा—चन्दन—सिद्धार्थ—भस्म—दूर्वों—अंकुर और अक्षत में विकर वतावे गये हैं जो कि सभी विघ्नों के विनाश करने वाले होते हैं। अस्त्र से अभिमन्त्रित दर्भों की मुष्टि ने उनका मार्जन करना चाहिये ।१३-१४। ईश की दिशा में वर्धनी से आसन के लिये परिकल्पना करे । पुण्याह याचन कराकर विप्रोंको तुष्ट करे ।१६। उक्त मण्डलों में से एक मण्डेल को वेदिका में लिखे । मन्त्रधारी पूर्व की ओर अथवा उत्तर की ओर मुख वाला होकर मृदु आसन पर बैठ जावे ।१७। आचार्य पद्मासन बोध करके स्थित होवे-उसे मौन व्रत धारी