शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ पटल ] [ ७७ होना चाहिये तथा परम सावधान और इन्द्रियों की जीतने वाला रहना चाहिये । आचार्य अपने दाहिने भाग में समस्त पूजा के द्रव्यों को स्था- पित करे ।१८। परम सुगन्धित जल से भरा हुआ एक घट जो बहुत ही शोभन हो मध्य में रखे । और करों में प्रक्षालन करने के लिये पीछे एक पात्र स्थापित करे ।१९। घृतप्रज्वालितान्दीपान्स्थापयेत्परितः शुभान् । दर्पणं चामरं छत्रं तालवृन्तं मनोहरम् ।२० मङ्गलांकुरपात्राणि स्थापयेद्दक्षु देशिकः । कृतांजलिपुटोभूत्वा वामदक्षिणपाश्र्वयोः ।२१ नत्वा गुरून् गणेशानं भूतशुद्धिं समाचरेत् । करशुद्धिं समासाद्य पश्चात्तालत्रयं ततः । २२ उर्द्धवोर्द्धवमस्तमन्त्रेण दिग्बन्धमपि देशिकः । तेन संजनितं तेजो रक्षां कुर्यात्समन्ततः ।२३ सुषुम्णा वर्त्मनाऽऽत्मानं परमात्मनि योजयेत् । योगयुक्तेन विधिना चिन्मन्त्रेण समाहितः ।२४ अपने चारों ओर घृत के द्वारा जलाये हुये परम शुभ दीपों को स्थापित करे । दर्पण-चमर-छत्र-मनोहर लाल वृन्त और मङ्गल अङ्- कुरों के पात्रों को दैविक दिशाओं में स्थापित करें । दोनों हाथों को जोड़कर वाम और दक्षिण पार्श्वोमें गुरुजनों को तथा गणेशों को प्रणाम करके फिर भूत शुद्धि करे । अपने करों की शुद्धि करके पीछे तीन दिशाओं का बन्धन करे । उससे संजनित तेज सभी ओर से रक्षा करे । ।२३। सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा अपनी आत्मा को परमात्मा में योजित करना चाहिए । परम समाहित रहे और योग में युक्त विधि से तथा चिन्मात्र के द्वारा योजन करे ।२४। कारणे सर्वभूतानान्तत्त्वान्यपि च चिन्तयेत् । बीजभावेन लीकानि व्युत्क्रमात्परमात्मनि ।२५