शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
चतुर्थ पटल ] [ ७७ होना चाहिये तथा परम सावधान और इन्द्रियों की जीतने वाला रहना चाहिये । आचार्य अपने दाहिने भाग में समस्त पूजा के द्रव्यों को स्था- पित करे ।१८। परम सुगन्धित जल से भरा हुआ एक घट जो बहुत ही शोभन हो मध्य में रखे । और करों में प्रक्षालन करने के लिये पीछे एक पात्र स्थापित करे ।१९। घृतप्रज्वालितान्दीपान्स्थापयेत्परितः शुभान् । दर्पणं चामरं छत्रं तालवृन्तं मनोहरम् ।२० मङ्गलांकुरपात्राणि स्थापयेद्दक्षु देशिकः । कृतांजलिपुटोभूत्वा वामदक्षिणपाश्र्वयोः ।२१ नत्वा गुरून् गणेशानं भूतशुद्धिं समाचरेत् । करशुद्धिं समासाद्य पश्चात्तालत्रयं ततः । २२ उर्द्धवोर्द्धवमस्तमन्त्रेण दिग्बन्धमपि देशिकः । तेन संजनितं तेजो रक्षां कुर्यात्समन्ततः ।२३ सुषुम्णा वर्त्मनाऽऽत्मानं परमात्मनि योजयेत् । योगयुक्तेन विधिना चिन्मन्त्रेण समाहितः ।२४ अपने चारों ओर घृत के द्वारा जलाये हुये परम शुभ दीपों को स्थापित करे । दर्पण-चमर-छत्र-मनोहर लाल वृन्त और मङ्गल अङ्- कुरों के पात्रों को दैविक दिशाओं में स्थापित करें । दोनों हाथों को जोड़कर वाम और दक्षिण पार्श्वोमें गुरुजनों को तथा गणेशों को प्रणाम करके फिर भूत शुद्धि करे । अपने करों की शुद्धि करके पीछे तीन दिशाओं का बन्धन करे । उससे संजनित तेज सभी ओर से रक्षा करे । ।२३। सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा अपनी आत्मा को परमात्मा में योजित करना चाहिए । परम समाहित रहे और योग में युक्त विधि से तथा चिन्मात्र के द्वारा योजन करे ।२४। कारणे सर्वभूतानान्तत्त्वान्यपि च चिन्तयेत् । बीजभावेन लीकानि व्युत्क्रमात्परमात्मनि ।२५
७८ ] [ श्रीशारदा तिलक ततः संशोषये द्देहेहं वायु बीजेन वायुना । वह्निवीजेन तेनैव संदहेत्सकलां तनुम्।२६ विश्लेषयंत्तदा दोषानमृतेनामृताम्भसा। आप्लाव्याप्लावयेद्देहमापादतलमस्तकम् ।२७ आत्मलीनानि तत्त्वानि स्वस्थानं प्राप्तेत्तदा। आत्मानं हृदयाम्भोजमानयेत्परमात्मनः ।२८ मनुना हंसदेवस्य कुर्यान्न्यासादिकं ततः ऋषिश्चन्दोदेवतानि न्यसेन् मन्त्रस्य मन्त्रवित् ।२६ आत्मनो मूर्ध्नि बदने हृदये च यथाक्रमात् । विधाय मूलमन्त्रेण प्राणायामं यथाविधि ।३० समस्त भूतों के कारण में तत्वों का भी विशेष चिन्तन करना चाहिए । जो बीज भाव से व्युत्क्रम से परमात्मा में लीन हैं ।२५। इसके अनन्तर वायु बीज के द्वारा वायु से देह को संशोषण करे । उसी वह्नि बीज के द्वारा अपने सम्पूर्ण देह का दहन करे ।२६। उस अवसर में अमृत जल स दोषों का विश्लेषण करे । देह को आप्लावित करके मस्तकसे चरणों तक आप्लावित करना चाहिये ।२७। तब आत्मा में लीन हुए तत्त्वों को पुनः अपने स्थान पर प्राप्त करा देवे । परमात्मा के हृदय कमल में आत्मा का आनयन करना चाहिये ।२८। फिर हंसदेव के मन्त्र के द्वारा व्योम आदि का समाचरण करे । मन्त्र के ज्ञाता मन्त्र को ऋषि-छन्द और देवता का न्यास करे ।२६। आत्मा का मस्तक में मुख में और उदय में यथाक्रम मूलमन्त्र से न्यास करे और फिर विधि के साथ प्राणायाम करना चाहिए । विदध्यान्मातृकान्यासं मन्त्रन्यासमनन्तरम् । अंगुष्ठादिष्वंगुलीषु न्यसेदङ्गैः सजातिभिः ।३१ अस्त्रं तत्तलयोर्न्यस्य कुर्यात्तालत्रयादिकम् । दिशस्तेनैव बध्नीयाच्छोटिकाभिः समाहितः ।३२
चतुर्थ पटल ] [ ७६ हृदयादिषु विन्यस्येच्चाङ्गमन्त्रांस्ततः सुधीः हृदयाय नमः पूर्वं शिरशे वह्निवल्लभा ॥३३ शिखायै वषडित्युक्तं कवचाय हुमीरितम् । नेत्रत्रयाय वौषट् स्यादस्त्राय फडिति क्रमात् । ३४ षडङ्गमन्त्रानित्युक्तान्षडङ्गेषु नियोजयेत् । पञ्चाङ्गानि मनोर्यस्य तत्र नेत्रमनुन्यजेत् । ३५ अङ्गहीनस्य मन्त्रस्य त्वेनैवाङ्गानि कल्पयेत् । तत्तत्कल्पोक्तविधिना न्यासानन्यान्समाचरेत् । ३६ फिर मातृका न्यास करके अनन्तर में मन्त्र का न्यास करना चाहिए। सजाति अङ्गों से अंगुष्ठादि अंगुलियों में न्यास करे । ३१। उनके तलों में अस्त्र का न्यास करके तीन तालियां आदि करे। समा- हित होकर उसी के द्वारा दिशाओं का छोटिकाओं से बन्धव करना चाहिए । ३२। इसके उपरान्त सुधी पुरुष हृदय आदि से अङ्ग मन्त्रों का विन्यास करे । न्यास का क्रम यह है पहिले हृदयाय नमः-शिर से स्वाहा-शिखायै वषट् -कवचाय हुम् - नेत्रत्रयाय वौषट् और अस्त्राय फट-इसी क्रम से करे । ३३-३४। फिर छे अङ्गों में युक्त षडङ्ग- मन्त्रों को नियोजित करना चाहिए। जिस मन्त्र के पाँच अङ्ग हैं वहाँ पर नेत्र मन्त्र का यजन करे । ३५। अङ्गहीन मन्त्र के अपने ही के द्वारा अंगों की कल्पना करे। उस-उस कल्प में कही हुई विधि से अन्य न्य-सों का समाचरण करना चाहिए। ३६। कल्पयेदात्मनोदेहे पीठं धर्मादिभिः क्रमात् । अंसोरुयुग्मयोर्विद्वान्प्रादक्षिण्ये न देशिकः । २७ धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं न्यस्य त् क्रमात् । मुखापार्श्वनाभिपाष्ठोऽधर्मादींश्च प्रकल्पयेत् । ३८ धर्मादयः स्मृताः पादाः पीठगात्राणि चापरे । अनन्तं हृदये पद्ममस्मिन्सूर्येन्दुपावकान् । ३६
८० ] [ श्रीशारदा तिलक एषु स्वस्वकला न्यस्येन्नामाद्यक्षरपूर्विकाः । सत्त्वादींस्त्रीन् गुणान् न्यस्येत्तथैवात्र गुरुत्तमः । ४० आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमत्र तु । ज्ञानात्मानं प्र (च) विन्त्यस्य न्यस्येत्पीठमनुन्ततः । ४१ अपने देह में धर्मादिके द्वारा क्रम से पीठ की कल्पना करे । विद्वान् आचार्य प्रदक्षिणा से कन्धे और ऊरुओं के युग्म में क्रम से धर्म-ज्ञान वैराग्य और ऐश्वर्य का न्यास करे । मुखपार्श्व —नाभिपार्श्व में अधर्म आदि की कल्पना करे । ३७-३८। धर्म आदिक पाद कहे गये हैं और दूसरे पीठ गात्र हैं। हृदय में अनन्त पद्म का और इसमें सूर्य-चन्द्र- अग्नि का—इनमें अपनी-अपनी नाम से पूर्व अक्षरों वाली कलाओं का न्यास करे । ३६-४०। आत्माका अन्तरात्मा का और परमात्मा का यहाँ पर ज्ञानात्मा का न्यास करके फिर पीठ मन्त्र का न्यास करना चाहिए ।४१। एवं देहमये पीठे चिन्तयेदिष्टदेवताम् । मुद्राः प्रदर्श्य विधिवदर्घ्यस्थापनमाचरेत् । ४२ शंखमस्त्राम्बुना प्रोक्ष्य वामतोवह्निमण्डले । साधारं स्थापयेद्विद्वान् बिन्दुस्रु (च्यु) तसुधामयैः ।४३ तोयैः सुगन्धिपुष्पाक्तैः पूरयेत्तं यथाविधि । आधा पावकं शंख सूर्य तोयं सुधामयम् । ४४ स्मरेद्वह्न्यर्कचन्द्राणाँ कलास्तास्तेष्वनुक्रमात् । मूलमन्त्रं जपेत्स्पृष्ट्वा न्यसेत्तस्याङ्गमन्त्रवित् । ४५ हृन्मन्त्रेणाभिसम्पूज्य हस्ताभ्यां छादयन्नपः । जपेद्विद्यां यथान्यायं देशिको देवताधिया । ४६ अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य च । धेनुमुद्रां समासाद्य रोधतेत्तत्त्वमुद्रया ।४७
चतुर्थ पटल ] [ ८१ दक्षिणे प्रोक्षणीपात्रमाधायाद्भिः प्रपूरयेत् । किञ्चिदर्घाम्बु संगृह्य प्रोक्षण्यम्भसि योजयेत् । ४८ अर्घस्योत्तरतः कार्यं पाद्यं साचमनीयकम् । आत्मानं यागवस्तूनि मण्डलं प्रोक्षयेद्गुरूः । ४६ इस रीति से देहगम पीठ में अपने इष्टदेव का चिन्तन करना चाहिये । फिर विधि के साथ मुद्राओं को प्रदर्शित करके अर्घ स्थापना का समाचरण करे ।४०। अस्त्राग्बु से शंख का प्रोक्षण करके वह्नि- मण्डल के वाम भागमें विद्वान् व्यक्ति विन्दुयुत सुधासे परिपूर्णों के द्वारा साधार की स्थापना करे ।४३। उसको सुगन्धित पुष्पादिके द्वारा जल से यथाविधि पूरित करें । आधा-पावक - शंख-सूर्य और सुधामय जल का स्मरण करे ।४४। वहिन-चन्द्र और सूर्य की उन कलाओं का और अनुक्रम से उनमें स्मरण करना चाहिए । स्पर्श करके मूल मन्त्र का जप करे, और मन्त्र का ज्ञाता उसके अंग का न्यास करे ।४५। देवता की बुद्धि से आचार्य हृन्मन्त्र के द्वारा भली भाँति पूजन करके हाथों से जल का छादन करते हुए न्यायानुसार विद्याका जप करे ।४६। अस्त्र मन्त्र के द्वारा संरक्षण करके तथा कवच से अवगुण्ठन करके धेनुमुद्रा का समासादन करके उसका अपनी मुद्रा से रोधन करे ।४७। दक्षिण में प्रोक्षणी पात्र का आधान करके उस को जल से पूरित कर देवे । कुछ अर्ध जल का संग्रह करके प्रोक्षणी के जल में योजित कर देवे ।४८। वर्ष के उत्तर में आचमनीय के सहित पाद्य करना चाहिये। गुरु को चाहिये कि अपने आपको-हवन की दन्तुओं की ओर मण्डल को प्रोक्षित करे ।४६। प्रोक्षणीपात्रतोयेन मन्त्रतनुनान्यदपि क्रमात् । न्यासक्रमेण देहे स्वे धर्मादीन्पूजयेत्तत । ५० पुष्पाद्यैः पीठमन्त्रं तस्मिंश्च परदेवताम् । पञ्चकृत्वाः पुनः कुर्यात्पुष्पाञ्जलिमनन्तधीः । ५१
८२ ] [ श्रीशारदा तिलक उत्तमाङ्गे हृदाधारे पादेसर्वाङ्गके क्रमात् । विना नैवेद्यं गन्धाद्यै रूपचारैः समर्चयेत् । ५२ गुरुपदिष्टविधिना शेषमन्यत्समापयेत् । सर्वमेतत् प्रयुञ्जीत प्रोक्षणीस्थेन वारिणा । ५३ विसृज्य तोयं प्रोक्षण्याः पूरयेत्तां यथा पुरा । ततस्तन्मण्डलं मन्त्री गन्धाद्यैः साधु पूजयेत् । ५४ प्रोक्षणी पात्र के जल से मन्त्र के द्वारा अन्य का भी क्रम से प्रोक्षण करना चाहिये। न्यास के ही क्रम से अपने देह में फिर धर्म आदि का भी अर्चन करना चाहिये ।५०। पुष्पादिक के द्वारा पीठमन्त्र के अन्त तक उसमें पर देवता का पूजन करे। फिर अनन्य बुद्धि वाला होकर पाँच बार पुष्पांजलि करे ।५१। उत्तमाङ्ग में हृदाक्षर में- पाद में और सर्वाङ्ग में क्रम से नैवेद्य के बिना ही गन्ध आदि उपचारों के द्वारा अर्चन करना चाहिये ।५२। गुरुदेव के द्वारा जिस विधि का उपदेश दिया गया है उसीसे अन्य शेष कृत्योंका समापन करे। यह सभी प्रोक्षणी पात्र में संस्थित जल के द्वारा प्रयोग करना चाहिए ।५३। प्रोक्षणी पात्र के जल का विसर्जन करके फिर पूर्व की ही भांति वस्तु को पूरित कर देवे। इसके उपरान्त मन्त्रधारी उस मण्डल का गन्ध आदि से भलीभाँति पूजन करे ।५४। शालिभिः कर्णिकामध्यमापूयोपरि तण्डुलैः । अलंकृत्य पुनस्तेषु दर्भानास्तीर्य तन्त्रवित् । ५५ कूर्चमक्षतसंयुक्तं न्यसेत्तेषामथोपरि । आधारशक्तिमारभ्य पीठमन्त्रमयं यजेत् । ५६ अधः कूर्मशिलारूढां शरच्चन्द्रनिभप्रभाम् । आधारशक्तिं प्रजयेत्पङ्कजद्वयधारिणीम् । ५७ मूर्ध्नि. तस्याः समारूढं कूर्मं नीलाभमर्चयेत् । ऊर्ध्वं ब्रह्मशिलासीनमनन्तं कुन्दसन्निभम् । ५८
चतुर्थ पटल ] [ ८३ यजेच्चक्रधरं मूर्ध्नि धारयन्तं वसुन्धराम् । तमालश्यामलां तत्र नोलेन्दीवरधारिणीम् । ५६ अभ्यर्च्चयेद्वसुमतीं स्फुरत्सागरनेशलाम् । तस्यां रत्नमयं द्वीपं तस्मिंश्च मणिमण्डपम् । ६० यजेत्कल्पतरूंस्तस्मिन्साधकाभीष्टसिद्धिदान् । अधस्तात्पूजयेत्तेषां वेदिकां मण्डपोज्ज्वलाम् । ६१ शाली के द्वारा कणिका के मध्य को आपूरित करके और ऊपर तण्डुलों से अलंकृत करके फिर उनमें दर्भों को फैलाकर तन्त्र का ज्ञाता पुरुष इसके अनन्तर उनके ऊपर कूर्च-अक्षत से संयुत का न्यास करे । आधार शक्ति का आरम्भ करके मन्त्रमय पीठ का यजन करे ।५६। नीचे की ओर कूर्म शिलापर समारूढ़-शरत्काल के चन्द्रमा के समान मुख वाली दो पंकजों के धारण करने वाली आधार शक्ति का यजन करना चाहिये ।५७। उसके मस्तक में समारूढ़ और नील आभा वाले कूर्म का समर्चन करना चाहिये । ऊपर की ओर कुन्दकी आभा वाले- ब्रह्मशिला पर समासीन अनन्त का यजन करे ।५८। वसुन्धरा को मूर्धा में धारण करते हुए चक्रधर का यजन करे । तमाल के समान श्यामला-नील इन्दीवर को धारण करने वाली, जिसके चारों ओर स्फुरित सागरों की मेखला विद्यमान है, ऐसी वसुमती देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए । उसमें रत्नों से परिपूर्ण द्वीप है और उस द्वीप में मणि- निर्मित मण्डप है । उस मण्डपमें कल्प तरुओंका अर्चन करे जो साधना करने वाले मनुष्योंके अभीष्टोंके देने वाले हैं । उनके नीचे मण्डपोज्ज्वला वेदि का अर्चन करना चाहिये ।५६-६१। पश्चादभ्यर्चयेत्तस्यां पीठं धर्मादिभिः पुनः । रक्तश्यामहरिद्वेन्द्रनीलाभात्पादरूपिणः । ६२ वृषकंसरभूतंभरूपान् धर्मादिकान्यजेत् । गात्रेषु पूजयेत्तांस्तु नञ्पूर्वानुक्तलक्षणान् । ६३
८४ ] [ श्रीशारदा तिलक आग्नेयादिषु कोणेषु दिक्षु चाथाम्बुजं यजेत् । आनन्दकन्दं प्रथमं संविन्नालमन्तरम् ।६४ सर्वतत्त्वात्मकं पद्ममभ्यर्च्य तदनन्तरम् । मन्त्री प्रकृतिपत्राणि विका मयकेसरान् ।६५ पञ्चाशद्बीजवर्णाढ्यां कर्णिकां पूजयेत्ततः । कलाभिः पूजयेत्सार्द्धं तस्यां सूर्येन्दुपावकान् । ६६ प्रणवस्य त्रिभिर्वर्णैरथ सत्त्वादिकान् गुणान् । आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमर्चयेत् । ६७ ज्ञानात्मानं च विधित्पीठमन्त्रावसानम् । पीठशक्तिः केसरेषु मध्ये च सवराभयाः । ६८ इसके पीछे धर्मादिक के सहित पीठ का उसमें यजन करे । अब धर्मादिक का स्वरूप बतलाते हैं-रक्त श्याम-हरिद्रा-इन्द्रनील की आभा वाले पादरूपी हैं-वृष केसरीभूतेभ के स्वरूपसे संयुत हैं ऐसे धर्मा- दिक का यजन करना चाहिये । उनका तत्र पूर्व अनुक्त लक्षणों वालों का गात्रों में पूजन करे ।६२-६३। आग्नेय आदि कोणों में दिशाओं में अम्बुज का यजन करे । प्रथम आनन्दकन्द और इसके अनन्तर सम्वित् नालवाले सब तत्वों के स्वरूप वाले पद्म का अभ्यर्चन करके उसके उप- रान्त मन्त्रधारी प्रकृति पत्रों का और विकार से परिपूर्ण केसरों का यजन करे ।६४-६५। इसके उपरान्त पचास बीजों में आढ्य कर्णिका का पूजन करे। उसमें कलाओं के साथ सूर्य चन्द्र और पावक का पूजन करे प्रणव की तीस वर्णों के साथ यजन करना चाहिये । इसके अनन्तर सत्व आदिक गुणोंका-आत्मा का-अन्तरात्माका और पापात्मा का अर्चन करना चाहिये ।६६-६७। तथा ज्ञानात्माका और पीठ मन्त्र के अवसान् पर्यन्त विधिके साथ यजन करे । और केसरोंके मध्यमेंवर दान तथा अभयदान के सहित पीठ की शक्तियों का पूजन करना चाहिये -६८।
चतुर्थे पटय ] [ ८५ हेमादिरचितं कुम्भमस्त्राद्भिः क्षालितान्तरम् । चन्दनागुरुकर्पूरधूमितं शोभनाऽऽकृतिम् । ६६ आवेष्टिताऽङ्गं नीरन्ध्रं तन्तुना त्रिगुणात्मना । अर्चित गन्धपुष्पाद्यैः कूर्चाक्षतसमन्वितम् ।७० नवरत्नोदरं मन्त्री स्थापयेत्तारमुच्चरन् । ऐक्यं सङ्कल्प्य कुम्भस्य पीठस्य च विधानवित् । ७१ क्षीरद्रुमकषायेण पलाशत्वग्भवेन वा । तीर्थोदकैर्वा कर्पूरगन्धपुष्पसुवासितैः । ७२ आत्माऽभेदेन विधिवन्मातृकां प्रतिलोमतः । जपन्मूलमन्त्रं तद्गतपूरयेद्देवताधिया । ७३ शंखेक्वाथाम्बुसंपूर्णे गन्धाष्टकमभीष्टदम् । विलोड़्य पूजयेत्तस्मिन्नाबाह्या सकलाः कलाः । ७४ दश वह्ने कलाः पूर्वं द्वादश द्वादशात्मनः । कलाः षोडश सोमस्य पश्चात्पञ्चाशतं कलाः ।७५ जपित्वा प्रतिलोमेन मूलमन्त्रं च मन्त्रवित् । समाहितेन मनसा ध्यायन्मन्त्रस्य देवताम् । ७६ प्राणप्रतिष्ठा कुर्वीत तत्र तत्र विचक्षणः । कलात्मकं शंखसंस्थं क्वाथं कुम्भे विनिःक्षिपेत् । ७७ हेम आदि विशुद्ध धातुओं के द्वारा निर्माण हुए कुम्भ को जिसका अन्तर भाग अस्त्र के जल के द्वारा क्षात्रिलित कर लिया गया है जो चन्दन, अगरु कर्पूर से धूपित होवें तथा शोभन आकृति से संयुक्त हो, जिसका अङ्ग आवेष्ठित होवे-जो नीरन्ध्र त्रिगुणात्मना तन्तुओं के द्वारा किया गया होवे । उसका गन्ध पुष्पादिके द्वारा अर्चन किया जावे और कूर्च तथा अक्षत से संयुक्त होवे । उस के मध्यमें नौ प्रकार के रत्न होवे । ऐसे घट की स्थापना करनी चाहिये । और मन्त्रधारी प्रणव का उच्चारण करते हुये विधान का ज्ञाता कुम्भ और पीठ को एक समान संकल्प करे ।६६-७१।
८६ ] [ श्रीशारदा तिलक दूध वाले वृक्ष के कषाय से-पलाश वृक्ष से समुत्पन्न से अथवा तीर्थों के जल से जो कपूर-गन्ध और पुष्पों से सुगन्धित होवें । आत्मा के अभेद से प्रतिलोभ से विधि के साथ मातृका का और मूल मन्त्र का जप करते हुए देवता की बुद्धि से पूरित कर देना चाहिए ।७२-७३। क्वाथ के जल से सम्पूर्ण शंख में अभीष्ट के प्रदाता गन्धाष्टक का बिलोड़न करके सकल कलाओं कावाहन करे और पूजन करना चाहिये ।७४। पूर्व में वह्िनकी दशों कलाएं और बारह-बारह आत्मा की-सोम की सोलह कयाएं पीछे पचास कलाओं का पूजन व रे ।७५। मत्र के ज्ञान रखने वाला मूल मंत्र का प्रतिलोग के व्दारा जप करे और परम सावधान मन वाले को मंत्र के देवता का ध्यान करते हुये वहाँ-वहाँ पर विचरण पुरुष को प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये । और कलाओं के स्वरूप वाले शंख में स्थित क्वाथ का कुम्भ में विनिःक्षेपण कर देना चाहिये ।७६-७७। गन्धाष्टकं तत्त्रिविधं शक्तिविष्णुशिवात्मकम्। चन्दनागुरुकर्पूरचोरकुङ्कुमरोचना । ७८ जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः । चन्दनागुरुह्रीवेरकुष्ठकुङ्कुमसेव्यकाः । ७९ जटामांसीमुरमिति विष्णोर्गन्धाष्टकं विदुः । चन्दनागुरुकर्पूर तमालजलकुङ्कुमम् । ८० कुशीत कुष्ठ संयुक्तं शैवं गन्धाष्टकं विदुः । पाशादित्र्यक्षरात्मान्ते स्यादमुष्य पदन्ततः । ८१ क्रमात्प्राणा इह प्राणस्तथा सीव इह स्थितः । अमुष्य सर्वेन्द्रियाणि भूयोऽमुष्य पदं वदेत् । ८२ वाङ्मनस्त्वक्छ्रोत्रघ्राणप्राणपदान्वय । पश्चादिहागत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु ठद्वयम् । ८३ अयं प्राणममन्त्रः प्रोक्तः सर्वजीवप्रदायकः पश्चाद्वश्वत्थपनसचूतकोमलपल्लवैः । ८४
चतुर्थे पटल ] [ ८७ इन्द्रवल्लीसमाबद्धं सुरद्रुमधिया गुरुः । कुम्भवक्त्रं पिधायास्मिंश्चषकं सफलाक्षतम् ।८५ संस्थापयेत्फलधिया विधिवत्कल्पशाखिनम् । ततः कुम्भं निर्मलेन क्षौमयुग्मेन वेष्टयेत् ।८६ वहाँ पर गन्धाष्टक तीन प्रकार का होता है जो शक्ति-विष्णु और शिवके स्वरूप वालाहोता है । चन्दन-अगर-कर्पूर-चोरकुंकुम-रोचना- कपि से युक्त जटामांसी-यह शक्ति का गन्धाष्टक जानना चाहिए । चन्दन-अगरु-ह्रीवेर-कुंकुम-सेव्यक-जटामांसी मुरकुष्ठ-यह विष्णु भगवान् का अष्टगन्ध होता है । चन्दन-अगरु-कर्पूर-तमाल जल-कुंकुम -कुशील और कूट-यह शिव का गन्धाष्टक होता है । पाश आदि तीन अक्षरों के स्वरूप वाले के अन्त में फिर अमुष्यः-यह पद होना चाहिए । क्रमात् प्राणा इह प्राणास्तथा जीव इह स्थितः- अमुष्य सर्वान्द्रियाणि-यह कह कर पुनः 'अमुष्य'-इस पद को कहे ।७८-७९-८०-८१-८२। वाङ्-मनों नयन-श्रोत्र-घ्राण-इन पदों को कह कर पीछे 'इहगत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु'-यह कह कर दो ठकार कहे ।८३। यह प्राण प्रतिष्ठा करने का मंत्र कहा गया है जो सब जीव का प्रदान करने वाला है इसके पश्चात् पीपल-पनस- आम्र के कोमल पल्लवों से जो बन्ध्वल्ली से समाबद्ध होवें गुरु देववृक्ष की बुद्धि से घट के मुख को ढक कर पके फल और अक्षतों के सहित विधि के साथ फल की बुद्धि से कल्प शाखा को संस्थापित करना चाहिए । इसके बाद निर्मल दो क्षौम वस्त्रों से कुम्भ का वेष्ठन कर देवे ।८४-८६। मूलेन मूर्त्तिमिष्ट्वाऽस्मिञ्छायायां कल्पशाखिनाम् । आवाह्य पूजयेत्तस्यां मन्त्री मन्त्रस्य देवताम् ।८७ मूलमन्त्रं समुच्चार्य सुषुम्णावर्त्मना सुधीः । आनीय तेजःस्वस्थानान्नासिका रन्ध्रनिर्गतम् ।८८
८८ ] [ श्रीशारदा तिलक करस्थमातृकाम्भोजे चैतन्यं पुष्पसञ्चये । संयोज्य ब्रह्मरन्ध्रेण मूर्त्यांमावाहयेत्सुधीः । ८६ संस्थापनं सन्निधानं सन्निरोधमनन्तरम् । सकलीकरणं पश्चाद्विदध्यादवगुण्ठनम् । ९० अमृतीकरणं कृत्वा कुर्वीत परमोकृतिम् । क्रमादेतानि कुर्वीत स्वमुद्राभिः समाहितः । ९१ इनमें मूल मन्त्र से मूर्ति का यजन करके कल्प वृक्षों की छाया में मन्त्र धारी व्यक्ति उसमें मन्त्र के देवता का आवाहन करके अभ्यर्चन करना चाहिए ।८९। मूल मन्त्र का भली भाँति उच्चारण करके सुधी पुरुष सुषुम्ना के मार्ग से नासिका के रन्ध्र से निर्गत अपने स्थान से तेज का आनयन करके कर में संस्थित मातृका पद्म में पुरुष के संचय चैतन्य को ब्रह्मरन्ध्र से संयोजित करके सुधी मूर्ति में आवाहन करे ।८८-८६। संस्थापन—सन्निधान—फिर सन्निरोधन—सकलीकरण और इसके पश्चात् अवगुण्ठन करना चाहिये ।६०। अमृतीकरण करके परमो कृति करे । अपनी मुद्राओं के द्वारा समाहित होकर क्रम से इनको करना चाहिये ।६१। अथोपचारान्कुर्वीत मन्त्रवित्स्वागतादिकान् । स्वागतं कुशलप्रश्नं निगदेदग्रतो गुरुः । ६२ पाद्य पादास्बुजे दद्याद्देवस्य हृदयाणुना । एतच्छ्यामाकदूर्वाब्जविष्णुक्रान्ताभिरीरितम् । ६३ सुधामन्त्रेण वदने दद्यादाचमनीयकम् । जातीलवङ्गकङ्कोलैस्तदुक्त तन्त्रवेदिभिः । ६४ अर्घ्यं दिशेत्ततो मूर्ध्नि शिरोमन्त्रेण देशिकः । गन्धपुष्पाक्षतयवकुशाग्रतिलमर्षपैः । ६५ सद्दूर्वैः सर्वदेवानामेतदर्घ्य मुदीरितम् । सुधाणुना ततः कुर्यान्मधुपर्क सुखाम्बुजे । ६६
चतुर्थ पटल ] [ ८१ आज्यन्दधिमधून्मिश्रमेतदुक्तं मनीषिभिः । तेनैव मनुना कुर्यादिभिराचमनीयकम् ।६७ गन्धाद्भि कारयेत्स्नानं वाससी परिधापयेत् । दद्याद्यज्ञोपवीतं च हाराद्याभरणैः सह ।६८ इसके अनन्तर मन्त्र का ज्ञाता पुरुष स्वागत आदि उपचारों का समाचरण करे । गुरु आगे स्वागत और कुशल प्रश्नका कथन करो।६२। हृदयाणु के द्वारा देव के चरण कमल में पाद्य देवे । यह श्यामाक दूर्वा- कमल और विष्णु कान्ता से कहा है ।६३। सुधामन्त्र के द्वारा मुख में आचमनीय अर्पितकरे । वह आमचनीयजाती फल लौंग और ककोलसे युक्त तन्त्र के वेत्ताओं के द्वारा कही गयी है ।६४। इसके उपरान्त देशिक (आचार्य) शिरोमन्त्र के द्वारा मूर्धा में अर्घ्य देवे। गन्ध-पुष्प- अक्षत-यव कुशाग्र-तिल-सर्षप-दूर्वा से सभी देवों का अर्घ्य कहा गया है । सुधामन्त्र के द्वारा मुख कमल में मधुपर्क समर्पित करना चाहिये ।६५। ।६६। उस मधुपर्क को मनीषियों ने यही बतलाया है कि वह आज्य- दधि और मधु संमिश्रित होता है । उसी मन्त्र के द्वारा जल से आच- मन करे ।६७। गन्ध आदि से मिश्रित जल से स्नान करावे और फिर वस्त्रोंका परिधापन करना चाहिये । हार अदि आभरणोंके सहित यज्ञो- पवीत का समर्पण करे ।६८। न्यासक्रमेण मनुना पुटितैर्मातृकाक्षरैः । अभ्यर्च्य देवीं गन्धाद्यैरङ्गादीन्पूजयेत्ततः ।६६ गन्धश्चन्दनकर्पूरकालागुरुभिरीरितः । कमलेकरवीरे द्वे कुमुदे तुलसीद्वयम् । १०० जातीद्वयं केतके द्वे कह्लारं चम्पकोत्पले । कुन्दमन्दारपुन्नागपाटलानागचम्पकम् ।१०१ आरग्वधं कर्णिकारं पारन्ती नवमल्लिका । सौगन्धिकं सकोरण्टं पलाशशोकमल्लिकाः । १०२
६० ] [ श्रीशारदा तिलक धत्तूरं सर्जकं बिल्वममणं मुनिपत्रकम्। अन्यान्यपि सुगन्धान पत्रपुष्पाणि देशिकैः ।१०३ उपदिष्टानि पूजायामाददीत विचक्षणः । मलिनं भूमिसंस्पृष्ट कृमिकेशादिदूषितम् १०४ अङ्गरस्पृष्टं समाघ्रातं त्यजेत्पर्युषित गुरुः । देवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा ।१०५ न्यास क्रम से मंत्र के द्वारा सम्पुटित मातृका के अक्षरों से देवी का अभ्यर्चन करके गन्ध आदि उपचारों के द्वारा फिर अङ्ग आदिका पूजन करे ।६६। जोपूजन गन्ध चंदन, कपूर, कालागुरु,से बतलाता गया है । पूजन में कौन-कौन से पुष्पों का ग्रहण करना चाहिये-यह बत- लाया जाता है-दो कमल दो करवीर दो कुमुद, दो तुलसीदल, जाती के दो पुष्प, दो केतकी पुष्प, कल्हार, और चम्पा, उत्पल कुन्द, मन्दार, पुन्नाग, पाटला, नाग चम्पा, आरग्वध, कर्णिकार, पारन्ती, नव मल्लिका, सौगन्धिक, कोरण्ट,पलाश, अशोक, मल्लिका, धतूर, सर्जक, बिल्व, पत्र, मुनिपत्रक ये तथा अन्य भी सुगन्धित पत्र पुष्प आचार्यों के द्वारा पूजामें उपदिष्ट किये गये हैं । विचक्षण पुरुष इनका आदान करे । गुरुदेव ऐसे पुष्पों का त्याग कर देवे जो मलिन अर्थात् मुर्झाया हुआ हो जिस पुष्प को भूमि का स्पर्श हो गया हो अर्थात् जो वृक्ष से टूटकर भूमि पर गिर गया हो-तो कृमि और केशादि के द्वारा दूषित हो गया हो-जिस पुष्प का किमी भी अङ्ग द्वारा स्पर्श हो गया हो-जिसका अवघ्राण कर लिया हो गया और जो पर्युषित अर्थात् वासी हो, उस पुष्प का परित्याग कर देना चाहिये । सदा ही कुसुमों को देवता के मस्तक पर उपहित करे ।१००-१०५। पूजाकाले देवतया नोपरि भ्रामयेत्करम् । अगूरूशीरगुग्गुलशर्करामधुचन्दनैः ।१०६ धूपयेद्वाज्यसंमिश्रैर्नार्चिर्देवस्य देशिकः । वर्त्या कर्पूरभिण्या सर्पिषा तिलजेन वा ।१०७
चतुर्थ पटल ] | ६१ आरोप्य दर्शयेद्दीपानुच्चैः सौरभशालिनः । स्वाद्वूपदंशं विमलं पायसं सहशर्करम् । १०८ कदलीफलसंयुक्तं साज्यं मन्त्री निवेदयेत् । तत्रतत्र जलं दद्यादुपचारान्तरान्तरे । १०६ अङ्गादिलोकपालान्तं यजेदावरणान्यपि । केसरेष्वग्निकोणादिहृदयादीनि पूजयेत् । ११० नेत्रमग्ने दिजास्त्रस्त्रं ध्यातव्या अङ्गदेवताः । तुषारस्फटिवश्यामनीलकृष्णारणार्चिषः । १११ वरदाभयधारिण्यः प्रधानतनवः स्त्रियः । पश्चादभ्यर्चनीयाः स्युः कल्पोक्ताऽऽवृत्तवः क्रमात् । ११२ पूजा के समय में देवता के ऊपर हाथ को भ्रामित नहीं करना चाहिये । देशिकवर को चाहिये कि अगरु, शीर, गुग्गुलु-शर्करा, मधु, चन्दन आज्य से सम्मिश्रित करके देवताके नीचे धूप देवे । कर्पूर गर्भित वत्ती से-घृत अथवा तिलों के तैल से आरोपित करके सौरभ शाली दीपों को दर्शित करना चाहिये । मन्त्रधारी पुरुषको चाहिये कि स्वादू- पदंश, विमल, शर्करा से युक्त पायस, कदली के फलों से संयुत तथा आज्य में समन्वित निवेदन करे । उपचारों के बीच-बीच में वहाँ पर जल निवेदित करना चाहिए ।१०६-१०६। अङ्गों से आदि लेकर लोक पालों के-अन्त पर्यन्त आवरणों का यजन करे । केसरों में अग्निकोण से आदि हृदय प्रभृति का पूजन करना चाहिए । ११०। आगे नेत्र-दिशाओं में अस्त्र और अङ्ग देवता का ध्यान करना चाहिए । तुषार, स्फटिक, श्याम,नील,कृष्ण और अरुण अर्चियों से संयुत,वरदान और अभयदानको धारण करन वाली प्रधान तनु स्त्रियाँ क्रम से कल्पोक्त आवृत्तियों से युक्त पश्चात् अभ्यर्चन करने के योग्य है । १११-११२। अन्ते यजेल्लोकपालान्मूलपारिषदन्वितान् । हेतिजात्यधिगोपेतान्दिक्षु पूर्वांदितः क्रमात् । ११३
८२ ] [ श्री शारदा तिलक इन्द्रमग्निं यमं रक्षोवरुणं पवनं विधुम् । ईशानं पन्नगाधीशमधऊर्ध्वं पितामहम् । ११४ पीतो रक्तोऽसितो धूम्रः शुक्लो धूम्रसितावुभौ । गौरोऽरुणः क्रमादेते वर्णतः परिकीर्तिताः । ११५ वज्रं शक्तिं दण्डमसिं पाशमङ्कुशकं गदाम् । शूलं चक्रं पद्ममेषामायुधानि क्रमाद्विदुः । ११६ पीतशुक्लसिताकाशविद्युद्रक्तसितायिताः । कुरविन्दपाटलाभा वज्राद्याः परिकीर्तितः । ११७ अन्त में मूल परिषदों से समन्वित लोकपालों का यजन करना चाहिये । इनका हेतिजात्यधिपों से समन्वित पूर्वादि क्रम से दिशाओं में पूजन करे ।११३। इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, पवन, चन्द्र, ईशान, पन्नगाधीश का नीचे और ऊपर पितामहका अर्चन करना चाहिये । ये वर्ण के द्वारा क्रमसे पीत, रक्त, असित, धूम्र, शुक्ल, धूम्र और सित दोनों, गौर और अरुण होते है ।११४-११५। इनके आयुध क्रम से वज्र, शक्ति, दण्ड, असिपात, अंकुश, गदा, शूल, चक्र, और, पद्म होते हैं ।११६। ये वज्र आदि आयुध पीत, शुक्ल, सित, आकाश, विद्युत, रक्त, सितासित, कुरविन्द और पाटल की आभा वाले कीर्तित किये गये हैं ।११७। एवं संपूज्य विधिवन्निवेद्यान्तं ततोगुरुः । दक्षिणे स्थण्डिलं कृत्वा तत्राधाय हुताशनम् । ११८ संस्कृत्य विधिवद्विद्वान्वैश्वदेवं समाचरेत् । तत्र सम्पूज्य गन्धाद्यैर्देवतामुक्तविग्रहम् । ११९ तारव्याहृतिभिर्हुत्वा मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् । सर्पिष्मता पायसेन पञ्चविंशतिसंख्यया । १२० हुत्वा व्याहृतिभिर्भूयो गन्धाद्यैः पुनरर्चयेत् । तां याजायित्वा पीठस्थमूर्तों वह्निं विसर्जयेत् । १२१
चतुर्थ पटल ] [ ६३ अवशिष्टेन हविषा विकिरेत्वरितो बलिम् । देवतायाः पार्श्वेभ्यो गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् ।१२२ ततो नैवेद्यमुद्धृत्य शोधयित्वा स्थल पुन । पञ्चोपचारैः संज्पूय दर्शयेच्छत्रचामरे । १२३ कर्परशकलोन्मिश्रं ताम्बलं च निवेदयेत् । सहस्रावृत्त्या सञ्जप्य मूलमन्त्रमनन्यधीः । १२४ इस रीतिसे भली भाँति अर्चन करके गुरुविधिके साथ अन्तमें नैवेद्य निवेदन करके दक्षिण में स्थण्डिल की रचना करके वहाँ हुताशन का आधान करे ।११८। विद्वान् पुरुष विधि के साथ वैश्वदेव का संस्कार करके ही समाचरण करे । वहाँ पर उक्त विग्रह वाले देवताका गन्धादि उपचारों के द्वारा पूजन करे मन्त्र का ज्ञान रखने वाला तार (प्रणव) और व्याहृतियों के द्वारा होम करें । फिर मूलमन्त्रसे घृतयुक्त पायस के द्वारा पच्चीस सख्या में हवन करे और फिर व्याहृतियों के द्वार गन्धादि से अभ्यर्चन करे उसकी पीठ में स्थित मूर्ति में योजित करके अग्नि का विसर्जन कर देना चाहिये ।११६-१२१। जो हति अवशिष्ट रह जावे उससे सब ओर बलि का विकिरण करे । देवता के पार्षदों के लिये गन्ध-पुष्पों ओर अक्षतों से अन्वित नैवेद्य को उद्धत करके फिर स्थल का शोधन करना चाहिये । पाँच उपचारों के द्वारा पूजन करके छत्र और चमर को दर्शित करे ।१२२-१२३। कपूर के खन्ड से उन्मिश्रित ताम्बूल को निवेदित करे । अनन्य बुद्धि वाला होकर अर्थात् एकाग्रचित वाला रहकर एक सहस्र बार मूल मन्त्र का जप करे ।१२४। तज्जपं सर्वसम्पत्त्यै देववायै समर्पयेत् । ततः शम्भोर्दिशि गुरुर्विकिरेत्पूर्वसंचिते । १२५ हेमवस्त्रादिसंयुक्तां कर्करीतोयपूरिताम् । संस्थाप्य तस्यां सिंहस्यां खङ्गखेटकधारिणीम् । १२६ घोररूपां पश्चिमास्यां पूजयेदस्त्रदेवताम् । चलासनेन सम्पूज्य तामादाय गुरुः पुनः । १२७
६६ ] [ श्री शारदा तिलक उसको करके गुरु इसके साथ वेदी में दर्भों के आस्तर में उस रात में शयन करे । यह अधिवास कहा गया है ।१३८-१३६।
पंचम पटल
ततोऽग्निजननं वक्ष्ये सर्वतन्त्रानुसारतः । आचार्यकुण्डे विधिवत्संस्कृते शास्त्रवर्त्मना । १ अष्टादश स्युः संस्काराः कुण्डाना तन्त्रचोदिताः । वीक्षणं मूलमन्त्रेण शरेण प्रोक्षणं मतम् । २ तेनैव ताडन दर्भेर्वर्मथाऽभ्युक्षणं स्मृतम् । अस्त्रेण खननोद्धारो हृन्मन्त्रेण प्रपूरणम् । ३ समीकरणमस्त्रेण सेचन वर्मणा मतम् । कुट्टनं हेतिमन्त्रेण वर्ममन्त्रेण मार्जनम् । ४ विलेपनं कलारूपकल्पनं तदनन्तरम् । त्रिसूत्रीकरणं पश्चाद्वृद्धयेनार्चनं मतम् । ५ अस्त्रेण वज्रोकरणं हृन्मन्त्रेण कुशः शुभैः । चतुष्पथं तनुत्रेण तनुयादक्षपाटनम् ।६ यागे कुण्डानि संस्कुर्यात्संस्कारैरेभिरोरितैः । अथवा तानि संस्कुर्याच्चतुर्भीक्षणादिभिः । ७ इसके अनन्तर समस्त तन्त्रों के अनुसार शास्त्रों के निर्दिष्ट मार्ग के द्वारा विधि के सहित संस्कार किये हुये कुन्ड में अग्नि के जनन को बतलाया जाता है ।१। तन्त्रों में चोदित कुन्डों के अठारह संस्कार होते हैं। मूल मन्त्र के द्वारा वीक्षण नामक संस्कार होता है। और शर के द्वारा प्रोक्षण माना गया है ।२। उसी के द्वारा दर्भों से ताड़न नामक संस्कार होता है। वर्म्म के द्वारा अभ्युक्षण कहा गया हैं। अस्त्र से
पंचम पटल ] [ ६७ खनन और उद्धार होते हैं और हृन्मन्त्र के द्वारा प्रपूरण संस्कार किया जाता है ।३। अस्त्र से समीकरण और वर्म के द्वारा सचन नाम वाला संस्कार सम्पन्न होता है । हेति मन्त्रसे कुट्टन तथा वर्मके मंत्र से मार्जन किया जाता है ।४। विलेपन और कला रूप कल्पन उसके अनन्तर होता है । पीछे त्रिसूतीकरण और इसके पश्चात् हृदय मंत्र से अर्चन माना गया है ।५। अस्त्र से बाजीकरण और हृन्मन्त्र के द्वारा शुभ कुशाओं से चतुष्पथ करे और तनुत्र के द्वारा अक्ष पाटल करना चाहिए ।६। इन कथित संस्कारों से याग में कुण्डों का सत्कार करना चाहिए । अथवा उनका चार वीक्षण प्रभृति के ही द्वारा संस्कार करे ।७। तिस्रस्तिस्रो लिखेल्लेखा हृदा प्रागुदगग्रणाः । प्रागग्राणां स्मृता देवा मुकुन्देशपुरन्दराः ।८ रेखाणामुदगग्राणो ब्रह्मवैवस्वतेन्दुवः । अथवा षट्कोणावृतं त्रिकोण तव सीलखेत् ।६ सर्वाण्यभ्युक्ष्य तारेण योगपीठमथार्चयेत् । वागीश्वरीमृतुस्नानां नीलेन्दीवरसन्निभाम् ।१० वागीश्वरेण संयुक्तामुपचारैः प्रपूजयेत् । सूर्यकांतादितम्भूतं यद्वा श्रोत्रियगेहजम् ।११ आनीय चाग्नि पात्रेण क्रव्यादांशं पसित्यजेत् । संस्कुर्यात्तं यथान्यायं देशिकोवीक्षणादिभिः ।१२ प्राक् अथवा पूर्व दिशा में अथवा उत्तर में हृदय मन्त्र के द्वारा अग्रगामिनी तीन-तीन लेखायें लिखनी चाहिये । पूर्व में अग्रगामिनी लेखाओं के-मुकुन्द-ईश और पुरन्दर देवता कहे गये हैं ।८। उत्तर की ओर अग्रभागों वाली रेखाओंके देवता ब्रह्मा-वैवस्वत और इन्दु होते हैं। अथवा षट् कोण से समावृत त्रिकोण वहाँ पर लिखना चाहिये ।६। इन सबका प्रणव के द्वारा अभ्युक्षण करके इसके अनन्तर योगपीठका अर्चन करे । ऋतुकाल के उपरान्त स्नान' की हुई-नील इन्दीवर के सदृश्य वागीश्वरी का जो वागीश्वर से समन्वित होवे उपचारों के द्वारा पूजन
६८ ] [ श्रीशारदा तिलक करना चाहिए। सूर्यकान्त आदि मणियों से समुत्पादित की हुई अथवा किसी श्रोत्रिय के गृह में समुत्पन्न अग्नि का पात्र के द्वारा समानयन करके, क्रव्यादाके अंश का परित्याग कर देना चाहिये। आचार्य वीक्षण आदि के द्वारा न्यायानुसार उसका संस्कार करे ।१०-१२। औदर्यबैन्दवाग्निभ्यां भौमस्यैक्यं स्मरन्वसोः । योजयेद्वह्निबीजेन चैतन्यं पावके तदा ।१३। तारेण मन्त्रितं मन्त्री धेनुमुद्रामृतीकृतम् । अस्त्रेण रक्षितं पश्चात्तनुत्रेणावगुण्ठितम् ।१४ अर्चितं त्रिः परिभ्राम्य कुण्डस्योपरि देशिकः । प्रदक्षिणं तदा तारमन्त्रोच्चारणपूर्वकम् ।१५ आत्मनोऽभिमुख वह्नि जानुस्पृष्टमहीतलः । शिवबीजधिया देव्या योनावेव विनिः क्षिपेत् ।१६ पश्चाद्देवस्य देव्याश्च दद्यादाचमनीयकम् । ज्वालयेन्मनुनानेन तमग्निमथ देशिकः ।१७ औदर्य-वैन्दव अग्नियों से भौम वसु की एकता का स्मरण करते हुए तब पावक मे वह्नि वीज के द्वारा चैतन्य को योजित करे ।१३। मन्त्रधारी प्रणव के द्वारा अभिमन्त्रित-धेनु मुद्रा से अमृती कृत — अस्त्र के द्वारा रक्षित और पीछे तनुत्र के द्वारा अवगुण्ठित को आचार्य कुण्ड के ऊपर अर्चि तन्त्री को परिभ्रामित करके तब प्रदक्षिण तारमन्त्र से समु- च्चारण के साथ भूमि तल में घुटनों का स्पर्श करने वाला अपने सामने वह्नि को देवी के शिव बीज की बुद्धि से योनि में ही विनि-क्षिप्त करना चाहिए ।१४-१६। इसके पीछे देवी को और देव को आचमनीय अर्पित करे। देशिकको उसके अनन्तर उस अग्निको ज्वलित करना चाहिए।१७ चित्पिङ्गल' हनदहपचयुग्मान्त्युदीर्य च । सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा मन्त्रोऽय प्रागुदीरितः ।१८