भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्थ पटल ] [ ६३ अवशिष्टेन हविषा विकिरेत्वरितो बलिम् । देवतायाः पार्श्वेभ्यो गन्धपुष्पाक्षतान्वितम् ।१२२ ततो नैवेद्यमुद्धृत्य शोधयित्वा स्थल पुन । पञ्चोपचारैः संज्पूय दर्शयेच्छत्रचामरे । १२३ कर्परशकलोन्मिश्रं ताम्बलं च निवेदयेत् । सहस्रावृत्त्या सञ्जप्य मूलमन्त्रमनन्यधीः । १२४ इस रीतिसे भली भाँति अर्चन करके गुरुविधिके साथ अन्तमें नैवेद्य निवेदन करके दक्षिण में स्थण्डिल की रचना करके वहाँ हुताशन का आधान करे ।११८। विद्वान् पुरुष विधि के साथ वैश्वदेव का संस्कार करके ही समाचरण करे । वहाँ पर उक्त विग्रह वाले देवताका गन्धादि उपचारों के द्वारा पूजन करे मन्त्र का ज्ञान रखने वाला तार (प्रणव) और व्याहृतियों के द्वारा होम करें । फिर मूलमन्त्रसे घृतयुक्त पायस के द्वारा पच्चीस सख्या में हवन करे और फिर व्याहृतियों के द्वार गन्धादि से अभ्यर्चन करे उसकी पीठ में स्थित मूर्ति में योजित करके अग्नि का विसर्जन कर देना चाहिये ।११६-१२१। जो हति अवशिष्ट रह जावे उससे सब ओर बलि का विकिरण करे । देवता के पार्षदों के लिये गन्ध-पुष्पों ओर अक्षतों से अन्वित नैवेद्य को उद्धत करके फिर स्थल का शोधन करना चाहिये । पाँच उपचारों के द्वारा पूजन करके छत्र और चमर को दर्शित करे ।१२२-१२३। कपूर के खन्ड से उन्मिश्रित ताम्बूल को निवेदित करे । अनन्य बुद्धि वाला होकर अर्थात् एकाग्रचित वाला रहकर एक सहस्र बार मूल मन्त्र का जप करे ।१२४। तज्जपं सर्वसम्पत्त्यै देववायै समर्पयेत् । ततः शम्भोर्दिशि गुरुर्विकिरेत्पूर्वसंचिते । १२५ हेमवस्त्रादिसंयुक्तां कर्करीतोयपूरिताम् । संस्थाप्य तस्यां सिंहस्यां खङ्गखेटकधारिणीम् । १२६ घोररूपां पश्चिमास्यां पूजयेदस्त्रदेवताम् । चलासनेन सम्पूज्य तामादाय गुरुः पुनः । १२७