शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] [ श्री शारदा तिलक उसको करके गुरु इसके साथ वेदी में दर्भों के आस्तर में उस रात में शयन करे । यह अधिवास कहा गया है ।१३८-१३६।
पंचम पटल
ततोऽग्निजननं वक्ष्ये सर्वतन्त्रानुसारतः । आचार्यकुण्डे विधिवत्संस्कृते शास्त्रवर्त्मना । १ अष्टादश स्युः संस्काराः कुण्डाना तन्त्रचोदिताः । वीक्षणं मूलमन्त्रेण शरेण प्रोक्षणं मतम् । २ तेनैव ताडन दर्भेर्वर्मथाऽभ्युक्षणं स्मृतम् । अस्त्रेण खननोद्धारो हृन्मन्त्रेण प्रपूरणम् । ३ समीकरणमस्त्रेण सेचन वर्मणा मतम् । कुट्टनं हेतिमन्त्रेण वर्ममन्त्रेण मार्जनम् । ४ विलेपनं कलारूपकल्पनं तदनन्तरम् । त्रिसूत्रीकरणं पश्चाद्वृद्धयेनार्चनं मतम् । ५ अस्त्रेण वज्रोकरणं हृन्मन्त्रेण कुशः शुभैः । चतुष्पथं तनुत्रेण तनुयादक्षपाटनम् ।६ यागे कुण्डानि संस्कुर्यात्संस्कारैरेभिरोरितैः । अथवा तानि संस्कुर्याच्चतुर्भीक्षणादिभिः । ७ इसके अनन्तर समस्त तन्त्रों के अनुसार शास्त्रों के निर्दिष्ट मार्ग के द्वारा विधि के सहित संस्कार किये हुये कुन्ड में अग्नि के जनन को बतलाया जाता है ।१। तन्त्रों में चोदित कुन्डों के अठारह संस्कार होते हैं। मूल मन्त्र के द्वारा वीक्षण नामक संस्कार होता है। और शर के द्वारा प्रोक्षण माना गया है ।२। उसी के द्वारा दर्भों से ताड़न नामक संस्कार होता है। वर्म्म के द्वारा अभ्युक्षण कहा गया हैं। अस्त्र से