भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

८२ ] [ श्री शारदा तिलक इन्द्रमग्निं यमं रक्षोवरुणं पवनं विधुम् । ईशानं पन्नगाधीशमधऊर्ध्वं पितामहम् । ११४ पीतो रक्तोऽसितो धूम्रः शुक्लो धूम्रसितावुभौ । गौरोऽरुणः क्रमादेते वर्णतः परिकीर्तिताः । ११५ वज्रं शक्तिं दण्डमसिं पाशमङ्कुशकं गदाम् । शूलं चक्रं पद्ममेषामायुधानि क्रमाद्विदुः । ११६ पीतशुक्लसिताकाशविद्युद्रक्तसितायिताः । कुरविन्दपाटलाभा वज्राद्याः परिकीर्तितः । ११७ अन्त में मूल परिषदों से समन्वित लोकपालों का यजन करना चाहिये । इनका हेतिजात्यधिपों से समन्वित पूर्वादि क्रम से दिशाओं में पूजन करे ।११३। इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, पवन, चन्द्र, ईशान, पन्नगाधीश का नीचे और ऊपर पितामहका अर्चन करना चाहिये । ये वर्ण के द्वारा क्रमसे पीत, रक्त, असित, धूम्र, शुक्ल, धूम्र और सित दोनों, गौर और अरुण होते है ।११४-११५। इनके आयुध क्रम से वज्र, शक्ति, दण्ड, असिपात, अंकुश, गदा, शूल, चक्र, और, पद्म होते हैं ।११६। ये वज्र आदि आयुध पीत, शुक्ल, सित, आकाश, विद्युत, रक्त, सितासित, कुरविन्द और पाटल की आभा वाले कीर्तित किये गये हैं ।११७। एवं संपूज्य विधिवन्निवेद्यान्तं ततोगुरुः । दक्षिणे स्थण्डिलं कृत्वा तत्राधाय हुताशनम् । ११८ संस्कृत्य विधिवद्विद्वान्वैश्वदेवं समाचरेत् । तत्र सम्पूज्य गन्धाद्यैर्देवतामुक्तविग्रहम् । ११९ तारव्याहृतिभिर्हुत्वा मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् । सर्पिष्मता पायसेन पञ्चविंशतिसंख्यया । १२० हुत्वा व्याहृतिभिर्भूयो गन्धाद्यैः पुनरर्चयेत् । तां याजायित्वा पीठस्थमूर्तों वह्निं विसर्जयेत् । १२१

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 96, कुल 511 में से · BharatKosha