शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ पटल ] | ६१ आरोप्य दर्शयेद्दीपानुच्चैः सौरभशालिनः । स्वाद्वूपदंशं विमलं पायसं सहशर्करम् । १०८ कदलीफलसंयुक्तं साज्यं मन्त्री निवेदयेत् । तत्रतत्र जलं दद्यादुपचारान्तरान्तरे । १०६ अङ्गादिलोकपालान्तं यजेदावरणान्यपि । केसरेष्वग्निकोणादिहृदयादीनि पूजयेत् । ११० नेत्रमग्ने दिजास्त्रस्त्रं ध्यातव्या अङ्गदेवताः । तुषारस्फटिवश्यामनीलकृष्णारणार्चिषः । १११ वरदाभयधारिण्यः प्रधानतनवः स्त्रियः । पश्चादभ्यर्चनीयाः स्युः कल्पोक्ताऽऽवृत्तवः क्रमात् । ११२ पूजा के समय में देवता के ऊपर हाथ को भ्रामित नहीं करना चाहिये । देशिकवर को चाहिये कि अगरु, शीर, गुग्गुलु-शर्करा, मधु, चन्दन आज्य से सम्मिश्रित करके देवताके नीचे धूप देवे । कर्पूर गर्भित वत्ती से-घृत अथवा तिलों के तैल से आरोपित करके सौरभ शाली दीपों को दर्शित करना चाहिये । मन्त्रधारी पुरुषको चाहिये कि स्वादू- पदंश, विमल, शर्करा से युक्त पायस, कदली के फलों से संयुत तथा आज्य में समन्वित निवेदन करे । उपचारों के बीच-बीच में वहाँ पर जल निवेदित करना चाहिए ।१०६-१०६। अङ्गों से आदि लेकर लोक पालों के-अन्त पर्यन्त आवरणों का यजन करे । केसरों में अग्निकोण से आदि हृदय प्रभृति का पूजन करना चाहिए । ११०। आगे नेत्र-दिशाओं में अस्त्र और अङ्ग देवता का ध्यान करना चाहिए । तुषार, स्फटिक, श्याम,नील,कृष्ण और अरुण अर्चियों से संयुत,वरदान और अभयदानको धारण करन वाली प्रधान तनु स्त्रियाँ क्रम से कल्पोक्त आवृत्तियों से युक्त पश्चात् अभ्यर्चन करने के योग्य है । १११-११२। अन्ते यजेल्लोकपालान्मूलपारिषदन्वितान् । हेतिजात्यधिगोपेतान्दिक्षु पूर्वांदितः क्रमात् । ११३