शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ पटल ] [ ८१ दक्षिणे प्रोक्षणीपात्रमाधायाद्भिः प्रपूरयेत् । किञ्चिदर्घाम्बु संगृह्य प्रोक्षण्यम्भसि योजयेत् । ४८ अर्घस्योत्तरतः कार्यं पाद्यं साचमनीयकम् । आत्मानं यागवस्तूनि मण्डलं प्रोक्षयेद्गुरूः । ४६ इस रीति से देहगम पीठ में अपने इष्टदेव का चिन्तन करना चाहिये । फिर विधि के साथ मुद्राओं को प्रदर्शित करके अर्घ स्थापना का समाचरण करे ।४०। अस्त्राग्बु से शंख का प्रोक्षण करके वह्नि- मण्डल के वाम भागमें विद्वान् व्यक्ति विन्दुयुत सुधासे परिपूर्णों के द्वारा साधार की स्थापना करे ।४३। उसको सुगन्धित पुष्पादिके द्वारा जल से यथाविधि पूरित करें । आधा-पावक - शंख-सूर्य और सुधामय जल का स्मरण करे ।४४। वहिन-चन्द्र और सूर्य की उन कलाओं का और अनुक्रम से उनमें स्मरण करना चाहिए । स्पर्श करके मूल मन्त्र का जप करे, और मन्त्र का ज्ञाता उसके अंग का न्यास करे ।४५। देवता की बुद्धि से आचार्य हृन्मन्त्र के द्वारा भली भाँति पूजन करके हाथों से जल का छादन करते हुए न्यायानुसार विद्याका जप करे ।४६। अस्त्र मन्त्र के द्वारा संरक्षण करके तथा कवच से अवगुण्ठन करके धेनुमुद्रा का समासादन करके उसका अपनी मुद्रा से रोधन करे ।४७। दक्षिण में प्रोक्षणी पात्र का आधान करके उस को जल से पूरित कर देवे । कुछ अर्ध जल का संग्रह करके प्रोक्षणी के जल में योजित कर देवे ।४८। वर्ष के उत्तर में आचमनीय के सहित पाद्य करना चाहिये। गुरु को चाहिये कि अपने आपको-हवन की दन्तुओं की ओर मण्डल को प्रोक्षित करे ।४६। प्रोक्षणीपात्रतोयेन मन्त्रतनुनान्यदपि क्रमात् । न्यासक्रमेण देहे स्वे धर्मादीन्पूजयेत्तत । ५० पुष्पाद्यैः पीठमन्त्रं तस्मिंश्च परदेवताम् । पञ्चकृत्वाः पुनः कुर्यात्पुष्पाञ्जलिमनन्तधीः । ५१