भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 511 में से

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८२ ] [ श्रीशारदा तिलक उत्तमाङ्गे हृदाधारे पादेसर्वाङ्गके क्रमात् । विना नैवेद्यं गन्धाद्यै रूपचारैः समर्चयेत् । ५२ गुरुपदिष्टविधिना शेषमन्यत्समापयेत् । सर्वमेतत् प्रयुञ्जीत प्रोक्षणीस्थेन वारिणा । ५३ विसृज्य तोयं प्रोक्षण्याः पूरयेत्तां यथा पुरा । ततस्तन्मण्डलं मन्त्री गन्धाद्यैः साधु पूजयेत् । ५४ प्रोक्षणी पात्र के जल से मन्त्र के द्वारा अन्य का भी क्रम से प्रोक्षण करना चाहिये। न्यास के ही क्रम से अपने देह में फिर धर्म आदि का भी अर्चन करना चाहिये ।५०। पुष्पादिक के द्वारा पीठमन्त्र के अन्त तक उसमें पर देवता का पूजन करे। फिर अनन्य बुद्धि वाला होकर पाँच बार पुष्पांजलि करे ।५१। उत्तमाङ्ग में हृदाक्षर में- पाद में और सर्वाङ्ग में क्रम से नैवेद्य के बिना ही गन्ध आदि उपचारों के द्वारा अर्चन करना चाहिये ।५२। गुरुदेव के द्वारा जिस विधि का उपदेश दिया गया है उसीसे अन्य शेष कृत्योंका समापन करे। यह सभी प्रोक्षणी पात्र में संस्थित जल के द्वारा प्रयोग करना चाहिए ।५३। प्रोक्षणी पात्र के जल का विसर्जन करके फिर पूर्व की ही भांति वस्तु को पूरित कर देवे। इसके उपरान्त मन्त्रधारी उस मण्डल का गन्ध आदि से भलीभाँति पूजन करे ।५४। शालिभिः कर्णिकामध्यमापूयोपरि तण्डुलैः । अलंकृत्य पुनस्तेषु दर्भानास्तीर्य तन्त्रवित् । ५५ कूर्चमक्षतसंयुक्तं न्यसेत्तेषामथोपरि । आधारशक्तिमारभ्य पीठमन्त्रमयं यजेत् । ५६ अधः कूर्मशिलारूढां शरच्चन्द्रनिभप्रभाम् । आधारशक्तिं प्रजयेत्पङ्कजद्वयधारिणीम् । ५७ मूर्ध्नि. तस्याः समारूढं कूर्मं नीलाभमर्चयेत् । ऊर्ध्वं ब्रह्मशिलासीनमनन्तं कुन्दसन्निभम् । ५८

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