भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

८४ ] [ श्रीशारदा तिलक आग्नेयादिषु कोणेषु दिक्षु चाथाम्बुजं यजेत् । आनन्दकन्दं प्रथमं संविन्नालमन्तरम् ।६४ सर्वतत्त्वात्मकं पद्ममभ्यर्च्य तदनन्तरम् । मन्त्री प्रकृतिपत्राणि विका मयकेसरान् ।६५ पञ्चाशद्बीजवर्णाढ्यां कर्णिकां पूजयेत्ततः । कलाभिः पूजयेत्सार्द्धं तस्यां सूर्येन्दुपावकान् । ६६ प्रणवस्य त्रिभिर्वर्णैरथ सत्त्वादिकान् गुणान् । आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमर्चयेत् । ६७ ज्ञानात्मानं च विधित्पीठमन्त्रावसानम् । पीठशक्तिः केसरेषु मध्ये च सवराभयाः । ६८ इसके पीछे धर्मादिक के सहित पीठ का उसमें यजन करे । अब धर्मादिक का स्वरूप बतलाते हैं-रक्त श्याम-हरिद्रा-इन्द्रनील की आभा वाले पादरूपी हैं-वृष केसरीभूतेभ के स्वरूपसे संयुत हैं ऐसे धर्मा- दिक का यजन करना चाहिये । उनका तत्र पूर्व अनुक्त लक्षणों वालों का गात्रों में पूजन करे ।६२-६३। आग्नेय आदि कोणों में दिशाओं में अम्बुज का यजन करे । प्रथम आनन्दकन्द और इसके अनन्तर सम्वित् नालवाले सब तत्वों के स्वरूप वाले पद्म का अभ्यर्चन करके उसके उप- रान्त मन्त्रधारी प्रकृति पत्रों का और विकार से परिपूर्ण केसरों का यजन करे ।६४-६५। इसके उपरान्त पचास बीजों में आढ्य कर्णिका का पूजन करे। उसमें कलाओं के साथ सूर्य चन्द्र और पावक का पूजन करे प्रणव की तीस वर्णों के साथ यजन करना चाहिये । इसके अनन्तर सत्व आदिक गुणोंका-आत्मा का-अन्तरात्माका और पापात्मा का अर्चन करना चाहिये ।६६-६७। तथा ज्ञानात्माका और पीठ मन्त्र के अवसान् पर्यन्त विधिके साथ यजन करे । और केसरोंके मध्यमेंवर दान तथा अभयदान के सहित पीठ की शक्तियों का पूजन करना चाहिये -६८।