भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

चतुर्थे पटय ] [ ८५ हेमादिरचितं कुम्भमस्त्राद्भिः क्षालितान्तरम् । चन्दनागुरुकर्पूरधूमितं शोभनाऽऽकृतिम् । ६६ आवेष्टिताऽङ्गं नीरन्ध्रं तन्तुना त्रिगुणात्मना । अर्चित गन्धपुष्पाद्यैः कूर्चाक्षतसमन्वितम् ।७० नवरत्नोदरं मन्त्री स्थापयेत्तारमुच्चरन् । ऐक्यं सङ्कल्प्य कुम्भस्य पीठस्य च विधानवित् । ७१ क्षीरद्रुमकषायेण पलाशत्वग्भवेन वा । तीर्थोदकैर्वा कर्पूरगन्धपुष्पसुवासितैः । ७२ आत्माऽभेदेन विधिवन्मातृकां प्रतिलोमतः । जपन्मूलमन्त्रं तद्गतपूरयेद्देवताधिया । ७३ शंखेक्वाथाम्बुसंपूर्णे गन्धाष्टकमभीष्टदम् । विलोड़्य पूजयेत्तस्मिन्नाबाह्या सकलाः कलाः । ७४ दश वह्ने कलाः पूर्वं द्वादश द्वादशात्मनः । कलाः षोडश सोमस्य पश्चात्पञ्चाशतं कलाः ।७५ जपित्वा प्रतिलोमेन मूलमन्त्रं च मन्त्रवित् । समाहितेन मनसा ध्यायन्मन्त्रस्य देवताम् । ७६ प्राणप्रतिष्ठा कुर्वीत तत्र तत्र विचक्षणः । कलात्मकं शंखसंस्थं क्वाथं कुम्भे विनिःक्षिपेत् । ७७ हेम आदि विशुद्ध धातुओं के द्वारा निर्माण हुए कुम्भ को जिसका अन्तर भाग अस्त्र के जल के द्वारा क्षात्रिलित कर लिया गया है जो चन्दन, अगरु कर्पूर से धूपित होवें तथा शोभन आकृति से संयुक्त हो, जिसका अङ्ग आवेष्ठित होवे-जो नीरन्ध्र त्रिगुणात्मना तन्तुओं के द्वारा किया गया होवे । उसका गन्ध पुष्पादिके द्वारा अर्चन किया जावे और कूर्च तथा अक्षत से संयुक्त होवे । उस के मध्यमें नौ प्रकार के रत्न होवे । ऐसे घट की स्थापना करनी चाहिये । और मन्त्रधारी प्रणव का उच्चारण करते हुये विधान का ज्ञाता कुम्भ और पीठ को एक समान संकल्प करे ।६६-७१।