भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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चतुर्थे पटल ] [ ८७ इन्द्रवल्लीसमाबद्धं सुरद्रुमधिया गुरुः । कुम्भवक्त्रं पिधायास्मिंश्चषकं सफलाक्षतम् ।८५ संस्थापयेत्फलधिया विधिवत्कल्पशाखिनम् । ततः कुम्भं निर्मलेन क्षौमयुग्मेन वेष्टयेत् ।८६ वहाँ पर गन्धाष्टक तीन प्रकार का होता है जो शक्ति-विष्णु और शिवके स्वरूप वालाहोता है । चन्दन-अगर-कर्पूर-चोरकुंकुम-रोचना- कपि से युक्त जटामांसी-यह शक्ति का गन्धाष्टक जानना चाहिए । चन्दन-अगरु-ह्रीवेर-कुंकुम-सेव्यक-जटामांसी मुरकुष्ठ-यह विष्णु भगवान् का अष्टगन्ध होता है । चन्दन-अगरु-कर्पूर-तमाल जल-कुंकुम -कुशील और कूट-यह शिव का गन्धाष्टक होता है । पाश आदि तीन अक्षरों के स्वरूप वाले के अन्त में फिर अमुष्यः-यह पद होना चाहिए । क्रमात् प्राणा इह प्राणास्तथा जीव इह स्थितः- अमुष्य सर्वान्द्रियाणि-यह कह कर पुनः 'अमुष्य'-इस पद को कहे ।७८-७९-८०-८१-८२। वाङ्-मनों नयन-श्रोत्र-घ्राण-इन पदों को कह कर पीछे 'इहगत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु'-यह कह कर दो ठकार कहे ।८३। यह प्राण प्रतिष्ठा करने का मंत्र कहा गया है जो सब जीव का प्रदान करने वाला है इसके पश्चात् पीपल-पनस- आम्र के कोमल पल्लवों से जो बन्ध्वल्ली से समाबद्ध होवें गुरु देववृक्ष की बुद्धि से घट के मुख को ढक कर पके फल और अक्षतों के सहित विधि के साथ फल की बुद्धि से कल्प शाखा को संस्थापित करना चाहिए । इसके बाद निर्मल दो क्षौम वस्त्रों से कुम्भ का वेष्ठन कर देवे ।८४-८६। मूलेन मूर्त्तिमिष्ट्वाऽस्मिञ्छायायां कल्पशाखिनाम् । आवाह्य पूजयेत्तस्यां मन्त्री मन्त्रस्य देवताम् ।८७ मूलमन्त्रं समुच्चार्य सुषुम्णावर्त्मना सुधीः । आनीय तेजःस्वस्थानान्नासिका रन्ध्रनिर्गतम् ।८८