भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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८८ ] [ श्रीशारदा तिलक करस्थमातृकाम्भोजे चैतन्यं पुष्पसञ्चये । संयोज्य ब्रह्मरन्ध्रेण मूर्त्यांमावाहयेत्सुधीः । ८६ संस्थापनं सन्निधानं सन्निरोधमनन्तरम् । सकलीकरणं पश्चाद्विदध्यादवगुण्ठनम् । ९० अमृतीकरणं कृत्वा कुर्वीत परमोकृतिम् । क्रमादेतानि कुर्वीत स्वमुद्राभिः समाहितः । ९१ इनमें मूल मन्त्र से मूर्ति का यजन करके कल्प वृक्षों की छाया में मन्त्र धारी व्यक्ति उसमें मन्त्र के देवता का आवाहन करके अभ्यर्चन करना चाहिए ।८९। मूल मन्त्र का भली भाँति उच्चारण करके सुधी पुरुष सुषुम्ना के मार्ग से नासिका के रन्ध्र से निर्गत अपने स्थान से तेज का आनयन करके कर में संस्थित मातृका पद्म में पुरुष के संचय चैतन्य को ब्रह्मरन्ध्र से संयोजित करके सुधी मूर्ति में आवाहन करे ।८८-८६। संस्थापन—सन्निधान—फिर सन्निरोधन—सकलीकरण और इसके पश्चात् अवगुण्ठन करना चाहिये ।६०। अमृतीकरण करके परमो कृति करे । अपनी मुद्राओं के द्वारा समाहित होकर क्रम से इनको करना चाहिये ।६१। अथोपचारान्कुर्वीत मन्त्रवित्स्वागतादिकान् । स्वागतं कुशलप्रश्नं निगदेदग्रतो गुरुः । ६२ पाद्य पादास्बुजे दद्याद्देवस्य हृदयाणुना । एतच्छ्यामाकदूर्वाब्जविष्णुक्रान्ताभिरीरितम् । ६३ सुधामन्त्रेण वदने दद्यादाचमनीयकम् । जातीलवङ्गकङ्कोलैस्तदुक्त तन्त्रवेदिभिः । ६४ अर्घ्यं दिशेत्ततो मूर्ध्नि शिरोमन्त्रेण देशिकः । गन्धपुष्पाक्षतयवकुशाग्रतिलमर्षपैः । ६५ सद्दूर्वैः सर्वदेवानामेतदर्घ्य मुदीरितम् । सुधाणुना ततः कुर्यान्मधुपर्क सुखाम्बुजे । ६६