शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 103
सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 67 अपस्मार-गणना अपस्मारश्चतुर्धा स्यात् समीरात् पित्ततस्तथा ।। 40 ।। श्लेष्मणोऽपि तृतीयः स्याच्चतुर्थः सन्निपाततः । अपस्मार चार प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से और 4. सन्निपात से। वक्तव्य-अपस्मार को मृगी या मिरगी भी कहते हैं। आमवात-गणना चत्वारश्चामवाताः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 41 ।। चतुर्थः सन्निपातेन - आमवात चार होते हैं-वात, पित्त और कफ से तीन और चौथा सन्निपात से। वक्तव्य-आमवात को प्रचलित भाषा में 'गठिया' कहा जाता है। शूल-गणना
- शूलान्यष्टौ बुधा जगुः। पृथग्दोषैस्त्रिधा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधान्यपि ।। 42 ।। आमेन सप्तमं प्रोक्तं सन्निपातेन चाष्टमम्। विद्वान् लोग 'शूल' को आठ प्रकार का कहते हैं- पृथक्-पृथक् वात आदि दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन, आम से सातवाँ और सन्निपात से आठवाँ। वक्तव्य-शूल मध्यकाय में कहीं भी हो सकता है। इसके विशेष ज्ञान के लिए देखें-सु० उ० तं० अ० 42। परिणामशूल-गणना परिणामभवं शूलमष्टधा परिकीर्तितम् ।। 43 ।। मलैयैः शूलसङ्ख्या स्यात् तैरेव परिणामजम्। अन्नद्रवभवं शूलं ज्वरपित्तभवं तथा ।। 44 ।। एकैकं गणितं सुज्ञैः- परिणामशूल आठ प्रकार का कहा गया है-जिन मलों (वातादि दोषों और आम) से शूल की गणना की गयी है, उन्हीं से परिणामशूल भी हो जाता है। अन्नद्रवशूल एवं जरत्पित्त से होनेवाला शूल ये एक एक प्रकार के होते हैं। वक्तव्य-ऊपर कहे गये शूलों का स्पष्टीकरण- परिणामशूल-यह केवल आहार की पच्यमानावस्था (पचते समय) में होता है। अन्नद्रवशूल-यह केवल द्रव आहार पीने से अथवा आहार में मिलने वाले द्रव रसों (पित्त आदि) के विकार से होता है। जरत्पित्तशूल- यह पित्त के पचते समय होता है जो कै या उलटी होने पर शान्त हो जाता है। उदावर्त्त-गणना
- उदावर्तास्त्रयोदश । एकः क्षुन्निग्रहात्प्रोक्तस्तृष्णारोधाद् द्वितीयकः ।। 45 ।। निद्राघातात्तृतीयः स्याच्चतुर्थः श्वासनिग्रहात्। छर्दिरोधात् पञ्चमः स्यात् षष्ठः क्षवथुनिग्रहात् ।। 46 ।। जृम्भारोधात् सप्तमः स्यादुद्गारग्रहतोऽष्टमः । नवमः स्यादश्रुरोधाद् दशमः शुक्रधारणात् ।। 47 ।। मूत्ररोधान्मलस्यापि रोधाद् वातविनिग्रहात्। उदावर्तास्त्रयश्चैते घोरोपद्रवकारकाः ।। 48 ।। उदावर्त्त तेरह होते हैं-1. भूख को रोकने से, 2. प्यास को रोकने से, 3 निद्रा (नींद) को रोकने से, 4. श्वास (चढ़े हुये श्वास) को रोकने से, 5. कै (दूषित कै) को रोकने से, 6. छींक को रोकने से, 7. जँभाई को रोकने से, 8. उद्गार (डकार) को रोकने से, 9. आँसुओं को रोकने (जब रोने का वेग उत्पन्न हो, तो उसे रोकने) से, 10. शुक्र को अनुचित ढंग से (ब्रह्मचर्य रखना बहुत आवश्यक है) रोकने से, 11. मूत्र को रोकने से, 12. मल (विष्ठा) को रोकने से और 13. वायु (अपानवायु) को रोकने से, इनमें अन्तिम तीन उदावर्त्त बड़े भयंकर होते हैं। वक्तव्य-प्रकृति जिन पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल देना चाहती है, उनको हठात् न निकलने देना अर्थात् उक्त पदार्थों का उत् (उलटा) आवर्त्त (पीछे को घूमना या लौट जाना) 'उदावर्त्त' कहलाता है। इससे बहुत हानि होती है, अतः 'न वेगान् धारयेत् धीमान्' अर्थात् उक्त वेगों को नहीं रोकना चाहिये, ऐसा कहा गया है। जैसे रोगयुक्त श्वास के वेग को रोकना तो हानिकारक होता है, किन्तु प्राणायाम के समय उसे रोकना लाभदायक होता है। आनाह-गणना आनाहो द्विविधो ज्ञेय एकः पक्वाशयोद्भवः । आमाशयोद्भवश्चान्यः प्रत्यानाहः स कथ्यते ।। 49 ।। आनाह दो प्रकार का होता है-1. पक्वाशय का और 2. आमाशय का, इसे 'प्रत्यानाह' भी कहा जाता है।