शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 356 में से
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**वक्तव्य-**पक्वाशय एवं आमाशय में स्वभाव से ही आकुञ्चनवत् गति हुआ करती है (जिसके कारण आहार आगे-आगे सरकता रहता है), इसकी गति का रुक जाना ही 'आनाह' (आङ् उपसर्ग पूर्वक णह बन्धने' धातु का घञ् प्रत्ययान्त रूप) है।
उरोग्रह-गणना
उरोग्रहस्तथा चैको- 'उरोग्रह' एक प्रकार का होता है।
वक्तव्य-'उरोग्रह' नामक रोग सम्भवतः 'उरः=उरःस्थल का ग्रह=जकड़ना' का अथवा हृदय की गति के निरोध (हार्ट-फेल) का अथवा फुप्फुस की गति के निरोध का नाम है।
हृद्रोग-गणना
-हृद्रोगाः पञ्च कीर्तिताः। वातादिभित्रयः प्रोक्ताश्चतुर्थः सन्निपाततः ॥ ५० ॥ पञ्चमः कृमिसञ्जातः- हृद्रोग पाँच कहे गये हैं-वायु आदि तीनों दोषों से तीन, चौथा सन्निपात से और पाँचवाँ कृमियों से।
**वक्तव्य-**दोनों फुप्फुसों के मध्य में रक्त का सञ्चालक हृदय नामक जो यन्त्र है, उसी में रोग होते हैं। 'पञ्चमः कृमिसञ्जातः' जो रोग है, उसमें उक्त 'हृदयाद' नामक कृमि उत्पन्न हो जाते हैं।
उदररोग-गणना
-तथाष्टावुदराणि च। वातात्पित्तात्कफात्रीणि त्रिदोषेभ्यो जलादपि ॥ ५१ ॥ प्लीह्नः क्षताद् बद्धगुदादष्टमं परिकीर्तितम्। 'उदर रोग' आठ होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. जल (जलोदर) से, 6. प्लीहा (यकृत्-विकार) से, 7. क्षत (आँतड़ियों में घाव या छिद्र होने) से तथा 8. बद्धगुद (मलाशय या गुद में मल की रुकावट होने) से।
**वक्तव्य-**उदर में अनेक रोग होते हैं, किन्तु वे उदर के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में होते हैं। सम्पूर्ण उदर में विकृति होने के कारण ही ये 'उदर-रोग' कहे जाते हैं।
गुल्मरोग-गणना
गुल्मास्त्वष्टौ समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रयः ॥ ५२ ॥ द्वन्द्वभेदास्त्रयः प्रोक्ताः सप्तमः सन्निपाततः। रक्तादष्टमकः ख्यातो- गुल्म आठ कहे गये हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, दो-दो दोषों से तीन; सातवाँ सन्निपात से और आठवाँ रक्त से (यह स्त्रियों के गर्भाशय में ही होता है)।
वक्तव्य-'गुल्म' वायुगोला के नाम से प्रसिद्ध रोग है।
मूत्राघात-गणना
- मूत्राघातास्त्रयोदश ।। ५३ ।। वातकुण्डलिका पूर्वा वाताष्ठीला ततः परा। वातवस्तिस्तृतीयः स्यान्मूत्रातीतश्चतुर्थकः ।। ५४ ।। पञ्चमं मूत्रजठरं षष्ठो मूत्रक्षयः स्मृतः। मूत्रोत्सर्गः सप्तमः स्यान्मूत्रग्रन्थिस्तथाष्टमः ।। ५५ ।। मूत्रशुक्रं तु नवमं विड्घातो दशमः स्मृतः। मूत्रासादश्चोष्णवातो वस्तिकुण्डलिका तथा ।। ५६ ।। मूत्राघातास्त्रयोऽप्येते पृथग्घोराः प्रकीर्तिताः। मूत्राघात तेरह होते हैं-1. वातकुण्डलिका, 2. वाताष्ठीला, 3. वातवस्ति, 4. मूत्रातीत, 5. मूत्रजठर, 6. मूत्रक्षय, 7. मूत्रोत्सर्ग, 8. मूत्रग्रन्थि, 9. मूत्रशुक्र, 10. विड्घात, 11. मूत्रासाद, 12. उष्णवात तथा 13. वस्तिकुण्डलिका। इनमें अन्तिम तीन मूत्राघात बहुत कष्टदायक होते हैं।
**वक्तव्य-**उक्त रोगों में मूत्र में रुकावट होती है, अथवा मूत्राशय में मूत्र बनता ही नहीं, अतः इन्हें मूत्राघात कहते हैं। उष्णवात और मूत्रासाद दोनों का सम्मिलित नाम 'सुजाक' हो सकता है। दोनों के लक्षणों पर आप ध्यान दें।
मूत्रकृच्छ्र-गणना
मूत्रकृच्छ्राणि चाष्टौ स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। ५७ ।। सन्निपाताच्चतुर्थं स्याच्छुक्रकृच्छ्रं च पञ्चमम्। विट्कृच्छ्रं षष्ठमाख्यातं घातकृच्छ्रं च सप्तमम् ।। ५८ ।। अष्टमं चाश्मरीकृच्छ्रं- मूत्रकृच्छ्र आठ होते हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, सन्निपात से चौथा, शुक्रकृच्छ्र पाँचवाँ, विट्कृच्छ्र छठा, घातकृच्छ्र सातवाँ और अश्मरीकृच्छ्र आठवाँ।
**वक्तव्य-**उक्त रोगों में पेशाब करने में अधिक कष्ट होता है; अतः इन्हें 'मूत्रकृच्छ्र' कहते हैं।