शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें70 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
[वाम स्तम्भ / Left Column]
अण्डवृद्धि-गणना अण्डवृद्धिस्तथा चैका- अण्डवृद्धि एक होती है। वक्तव्य- केवल अण्ड या वृषण के बढ़ने का नाम 'अण्डवृद्धि' है। गण्डमाला-गणना -तथैका गण्डमालिका ॥ ६७ ॥ गण्डमाला एक होती है। वक्तव्य- इस रोग में लसीका-ग्रन्थियाँ विकृत हो जाती हैं। गण्डालजी-गणना गण्डालजी तु चैका स्यात्- 'गण्डालजी' एक होती है। इसे घेंघा भी कहा जाता है। ग्रन्थि-गणना -ग्रन्थयो नवधा मताः। त्रिभिर्दोषैस्त्रयो रक्ताच्छिराभिर्मेदसो व्रणात् ॥ ६८ ॥ अस्थ्ना मांसेन नवमः- ग्रन्थियाँ नौ मानी जाती हैं-१-३. वात आदि दोषों से तीन, ४. रक्त की विकृति से, ५. शिराओं की विकृति से, ६. मेदा की विकृति से, ७. व्रण की विकृति से, ८. अस्थि की विकृति से तथा ९. मांस की विकृति से। वक्तव्य- ये बिना मुँह के फोड़े होते हैं। अर्बुद-गणना -षड्विधं स्यात् तथार्बुदम्। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तान्मांसादपि च मेदसः ॥ ६९ ॥ 'अर्बुद' छः प्रकार का होता है-१. वायु से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. रक्त से, ५. मांस से तथा ६. मेदा से। वक्तव्य- अर्बुद को ही 'रसौली' भी कहते हैं। श्लीपद-गणना श्लीपदं च त्रिधा प्रोक्तं वातात्पित्तात्कफादपि। श्लीपद तीन प्रकार का होता है-वात, पित्त और कफ से। इसी को 'फीलपाँव' कहते हैं। विद्रधि-गणना विद्रधिः षड्विधः ख्यातो वातपित्तकफैस्त्रयः ॥ ७० ॥
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
रक्तात् क्षतात् त्रिदोषैश्च- विद्रधि छः प्रकार का कहा गया है-वात, पित्त तथा कफ से तीन, रक्त से एक, क्षत (घाव) से एक और त्रिदोष से एक। वक्तव्य- यह अत्यन्त भयंकर फोड़ा है। इसमें प्रायः लेपादि क्रियाएँ सफल नहीं होतीं। इसमें अन्ततोगत्वा चीरा देना ही पड़ता है। यह दो प्रकार का होता है-१. बाह्यविद्रधि और २. अन्तर्विद्रधि। इनमें से पहला बाहरी शरीर पर और दूसरा शरीर के भीतरी अवयवों (वृक्क, यकृत्, एवं प्लीहा आदि) में होता है, जो और भी भयंकर होता है। व्रण-गणना -व्रणाः पञ्चदशोदिताः। तेषां चतुर्धा भेदाः स्युरागन्तुर्देहजस्तथा ॥ ७१ ॥ शुद्धो दुष्टश्च विज्ञेयस्तत्सङ्ख्या कथ्यते पृथक्। वातव्रणः पित्तजश्च कफजो रक्तजो व्रणः ॥ ७२ ॥ वातपित्तभवश्चान्यो वातश्लेष्मभवस्तथा। तथा पित्तकफाभ्याञ्च सन्निपातेन चाष्टमः ॥ ७३ ॥ नवमो वातरक्तेन दशमो रक्तपित्ततः। श्लेष्मरक्तभवश्चान्यो वातपित्तासृगुद्भवः ॥ ७४ ॥ वातश्लेष्मासृगुत्पन्नः पित्तश्लेष्मास्रसम्भवः। सन्निपातासृगुद्भूत इति पञ्चदश व्रणाः ॥ ७५ ॥ व्रण (घाव) पन्द्रह प्रकार के होते हैं और उनके चार भेद होते हैं। यथा-१. आगन्तु (सद्योव्रण जो कि तलवार आदि शस्त्रों के लगने से होता है), २. देहज या शारीरज, जो कि फोड़ा निकलकर घाव हो जाता है, ३. शुद्ध (अविकृत) तथा ४. दुष्ट (विकृत)। अब उनकी गिनती पृथक्-पृथक् कही जाती है-१. वातज, २. पित्तज, ३. कफज, ४. रक्तज, ५. वातपित्तज, ६. वातकफज, ७. पित्तकफज, ८. सन्निपातज, ९. वातरक्तज, १०. पित्तरक्तज, ११. कफरक्तज, १२. वात-पित्तरक्तज, १३. वातकफरक्तज, १४. पित्तकफरक्तज और १५. त्रिदोषरक्तज। सद्योव्रण-गणना सद्योव्रणस्त्वष्टधा स्याद्विक्षिप्तविलम्बितौ। छिन्नभिन्नप्रचलिता घृष्टविद्धनिपातिताः ॥ ७६ ॥ सद्योव्रण (आगन्तु व्रण) आठ प्रकार का होता है-१.