शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 71 अविक्लुप्त (चाकू आदि का घाव), 2. बिलम्बित (अंग का कटकर लटकने लगना), 3. छिन्न (अंग का सर्वथा अलग हो जाना), 4. भिन्न (आमाशय तथा वस्ति आदि आशय का फटना), 5. प्रचलित (ऊपर की त्वचा का निचली त्वचा पर से हटना), 6. घृष्ट (रगड़ लगना), 7. विद्ध (बिंध जाना) और 8. निपातित (जड़ से उखड़ना, जिसमें केवल गड्ढा रह जाये)। वक्तव्य-ध्यान दें, ये भिन्न-भिन्न प्रकार के घाव हैं। व्रण का अर्थ है-उस स्थान का विचूर्णित हो जाना। देखें-'व्रण विचूर्णने' धातु। कोष्ठभेद-गणना कोष्ठभेदो द्विधा प्रोक्तश्छिन्नान्त्रो निःसृतान्त्रकः । कोष्ठ या उदर का भेद या फटना दो प्रकार का होता है-1. छिन्नान्त्र (आँतड़ी का फटना) तथा 2. निःसृतान्त्रक (उदर की दीवार फटकर आँतों का बाहर निकलना)। अस्थिभंग-गणना अस्थिभङ्गोऽष्टधा प्रोक्तो भग्नपृष्ठविदारितौ ।। 77 ।। विवर्तितश्च विश्लिष्टस्तिर्यक्क्षिप्तस्त्वधोगतः । ऊर्ध्वगः सन्धिभग्नश्च- अस्थिभग्न आठ प्रकार का कहा गया है-1. भग्न (टूटना), 2. पृष्ठविदारित (अस्थि की पीठ का फटना या दरार पड़ना), 4. विवर्तित (ऐंठ जाना या मरोड़ खा जाना), 4. विश्लिष्ट (सन्धि का सरकना), 5. तिर्यक्क्षिप्त (सन्धि- स्थान का टेढ़ा होना), 6. अधोगत (सामने वाली हड्डी के नीचे आ जाना), 7. ऊर्ध्वग (ऊपर वाली हड्डी के ऊपर चढ़ जाना) और 8. सन्धि भग्न (सन्धिस्थान का टूट जाना)। वक्तव्य-उक्त भग्न दो प्रकार का भी माना जाता है, यथा-1. काण्डभग्न (अस्थि का टूटना) तथा 2. सन्धिभग्न (सन्धि या जोड़ का खिसकना)। इनमें पहले दो अस्थिभग्न तथा शेष छः सन्धिभग्न कहे जाते हैं। अग्निदग्ध-गणना
- वह्निदग्धश्चतुर्विधः ।। 78 ।। प्लुष्टो विदग्धो दुर्द्दग्धः सम्यग्दग्धः प्रकीर्तितः । वह्निदग्ध (आग से जलना) चार प्रकार का होता है-1. प्लुष्ट (झुलसना), 2. विदग्ध (फफोला पड़ना), 3. दुर्द्दग्ध (त्वचा का जल जाना) तथा 4. सम्यग्दग्ध या अतिदग्ध (मांस आदि का जल जाना)। नाड़ीव्रण-गणना नाड्यः पञ्च समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 79 ।। त्रिदोषैरपि शल्येन- नाड़ीव्रण पाँच प्रकार के कहे गये हैं-वात, पित्त और कफ से तीन, त्रिदोष से एक तथा शल्य (तीर, भाला आदि) से एक। वक्तव्य-नाड़ीव्रण को ही 'नासूर' कहते हैं। भगन्दर-गणना -तथाऽष्टौ स्युर्भगन्दराः । शतपोनस्तु पवनादुष्ट्रग्रीवश्च पित्ततः ।। 80 ।। परिस्रावी कफाज्ज्ञेय ऋजुर्वातकफोद्भवः । परिक्षेपी मरुत्पित्तादशोर्जः कफपित्ततः ।। 81 ।। आगन्तुजातश्चोन्मार्गी शङ्खावर्त्तस्त्रिदोषजः । भगन्दर नामक व्रण आठ होते हैं-1. शतपोनक (चलनी या छलनी के समान बहुत से छिद्रों वाला) वायु से, 2. उष्ट्रग्रीव (ऊँट की गर्दन के आकार का) पित्त से, 3. परिस्रावी कफ से, 4. ऋजु (सीधा) वात-पित्त से, 5. परिक्षेपी (पीब को जोर से निकालने वाला) वातपित्त से, 6. अर्शोज (अर्श के कारण होने वाला) कफपित्त से, 7. उन्मार्गी (उलटे मार्ग वाला), आगन्तुज अर्थात् शल्य आदि के लगने से होने वाला तथा 8. शंखावर्त्त (शंख की भाँति आवर्तों वाला) त्रिदोष से। वक्तव्य-गुद-द्वार के आस-पास होने वाला नासूर ही 'भगन्दर' कहा जाता है। उपदंश-गणना मेढ्रे पञ्चोपदंशाः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 82 ।। सन्निपातेन रक्ताच्च- मूत्रमार्ग पर पाँच 'उपदंश' होते हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, सन्निपात से चौथा एवं रक्त से पाँचवाँ। वक्तव्य-उपदंश स्त्री एवं पुरुष दोनों का होता है। यह प्रायः संसर्ग या संपर्क से होता है। इसका विवेचन सु० नि० अ० 12 में तथा च० चि० अ० 30 में देखें। चरक ने इसे 'ध्वजभङ्ग' कहा है।