भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 356 में से

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72 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

[ बायाँ स्तम्भ / Left Column ] शूकरोग-गणना -मेढ़े शूकामयास्तथा। चतुर्विंशतिराख्याता लिङ्गार्शो ग्रथितं तथा।। 83 ।। निवृत्तमवमन्थश्च मृदितं शतपोनकः। अष्ठीलिका सर्षपिका त्वक्पाकश्चावपाटिका।। 84 ।। मांसपाकः स्पर्शहानिर्निरुद्धमणिरुत्तमा। मांसार्बुदं पुष्करिका सम्मूढपिडिकालजी।। 85 ।। रक्तार्बुदं विद्रधिश्च कुम्भिका तिलकालकः। निरुद्धप्रकशः प्रोक्तस्तथैव परिवर्त्तिका।। 86 ।। लिङ्ग पर होने वाले 'शूक रोग' चौबीस कहे जाते हैं-1. लिङ्गार्श, 2. ग्रथित, 3. निवृत्त, 4. अवमन्थ, 5. मृदित, 6. शतपोनक, 7. अष्ठीलिका, 8. सर्षपिका, 9. त्वक्पाक, 10. अवपाटिका, 11. मांसपाक, 12. स्पर्शहानि, 13. निरुद्धमणि, 14. उत्तमा, 15. मांसार्बुद, 16. पुष्करिका 17. सम्मूढपिडिका, 18. अलजी, 19. रक्तार्बुद, 20. विद्रधि, 21. कुम्भिका, 22. तिलकालक, 23. निरुद्धप्रकश तथा 24. परिवर्त्तिका। वक्तव्य- लिङ्गवृद्धिकर उपायों का नाम 'शूक' है, जिसे 'तिला' भी कहते हैं। उक्त रोग प्रायः 'शूक' के प्रयोगों से हो जाया करते हैं। अतएव इन्हें 'शूकोमय' या 'शूकरोग' कहते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी रोग हैं, जो करमर्दन या हस्तमैथुन आदि कारणों से भी हो जाते हैं। कुष्ठरोग-गणना कुष्ठान्यष्टादशोक्तानि वातात्कपालिकं भवेत्। पित्तेनोदुम्बरं प्रोक्तं कफान्मण्डलचर्चिके।। 87 ।। मरुत्पित्तादृक्षजिह्वं श्लेष्मवाताद्विपादिका। तथा सिध्मैककुष्ठं च किटिभं चालसं तथा।। 88 ।। कफपित्तात् पुनर्दर्दः पामा विस्फोटकं तथा। महाकुष्ठं चर्मदलं पुण्डरीकं शतारुकम्।। 89 ।। त्रिदोषैः काकणं ज्ञेयं तथान्यच्छ्वित्रसंज्ञितम्। तथा वातेन पित्तेन श्लेष्मणा च त्रिधा भवेत्।। 90 ।। कुष्ठरोग अठारह कहे गये हैं-1. कापालिक वायु से, 2. औदुम्बर पित्त से, 3. मण्डल एवं 4. विचर्चिका कफ से, 5. ऋष्यजिह्व वातपित्त से, 6. विपादिका, 7. सिध्म, 8. एककुष्ठ, 9. किटिभ एवं 10. अलस भी कफवात से और 11. दद्रु (दाद), 12. पामा (खुजली), 13. विस्फोट, 14. महाकुष्ठ, 15.

[ दायाँ स्तम्भ / Right Column ] चर्मदल (चम्मल), 16. पुण्डरीक, 17. शतारुक, ये कफपित्त से एवं 18. काकण सन्निपात् से। तथा 'श्वित्र' या फुलबहरी नामक एक दूसरा रोग होता है, जो तीन प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त से तथा 3. कफ से। वक्तव्य- कुष्ठ 'कोढ़' नाम से प्रसिद्ध है। इसे आयुर्वेद में पापरोग भी कहा गया है। क्षुद्ररोग-गणना क्षुद्ररोगाः षष्टिसङ्ख्यास्तेष्वादौ शर्कराम्बुदम्। इन्द्रवृद्धा पनसिका विवृतान्थालजी तथा।। 91 ।। वराहदंष्ट्री वल्मीकं कच्छपी तिलकालकः। गर्दभी रकसा चैव यवप्रख्या विदारिका।। 92 ।। कदरं मषकश्चैव नीलिका जालगर्दभः। इरिवेल्ली जतुमणिर्गदभ्रंशोऽग्निरोहिणी।। 93 ।। सन्निरुद्धगुदः कोठः कुनखोऽनुशयी तथा। पद्मिनीकण्टकश्चिप्यमलसो मुखदूषिका।। 94 ।। कक्षा वृषणकच्छूश्च गन्धः पाषाणगर्दभः। राजिका च तथा व्यङ्गश्चतुर्था परिकीर्तितः।। 95 ।। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादित्युक्तं व्यङ्गलक्षणम्। विस्फोटाः क्षुद्ररोगेषु तेऽष्टधा परिकीर्तिताः।। 96 ।। पृथग्दोषैस्त्रयो द्वन्द्वैस्त्रिविधः सप्तमोऽसृजः। अष्टमः सन्निपातेन क्षुद्ररुक्षु मसूरिका।। 97 ।। चतुर्दशप्रकारेण त्रिभिर्दोषैस्त्रिधा च सा। द्वन्द्वजा त्रिविधा प्रोक्ता सन्निपातेन सप्तमी।। 98 ।। अष्टमी त्वग्गता ज्ञेया नवमी रक्तजा स्मृता। दशमी मांसजा ख्याता चतस्रोऽन्याश्च दुस्तराः।। 99 ।। मेदोऽस्थिमज्जाशुक्रस्थाः क्षुद्ररोगा इतीरिताः। क्षुद्ररोग साठ होते हैं-1. शर्करार्बुद, 2. इन्द्रवृद्धा, 3. पनसिका, 4. विवृता, 5. अन्थालजी, 6. वराहदंष्ट्र, 7. वल्मीक, 8. कच्छपी, 9. तिलकालक, 10. गर्दभी, 11. रकसा, 12. यवप्रख्या, 13. विदारिका, 14. कदर, 15. मसक, 16. नीलिका (झाँई), 17. जालगर्दभ, 18. इरिवेल्ली, 19. जतुमणि, 20. गुदभ्रंश (काँच निकलना), 21. अग्निरोहिणी, 22. सन्निरुद्धगुद, 23. कोठ (धप्पड़ या चकत्ता), 24. कुनख, 25. अनुशयी, 26. पद्मिनीकण्टक, 27. चिप्प, 28. अलस, 29. मुखदूषिका (मुँहासे), 30. कक्षा, 31. वृषणकच्छू