भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 356 में से

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सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 75 39. पीतमण्डल दर्शन (आकाश में पीले मण्डल दिखलायी पड़ना) तथा 40. पित्तनिःसरत्व (पित्त निकलना) -ये चालीस पित्त के रोग कहे गये हैं। वक्तव्य-उक्त रोग पित्तप्रकोप के बिना हो ही नहीं सकते, अतः इन्हें 'पित्तरोग' कहते हैं। कफज रोग-गणना कफस्य विंशतिः प्रोक्ता रोगास्तन्द्रातिनिद्रता। गौरवं मुखमाधुर्यं मुखलेपः प्रसेकता।। 122।। श्वेतावलोकनं श्वेतविट्कत्वं श्वेतमूत्रता। श्वेताङ्गवर्णता शैत्यमुष्णेच्छा तिक्तकामिता।। 123।। मलाधिक्यं च शुक्रस्य बाहुल्यं बहुमूत्रता। आलस्यं मन्दबुद्धित्वं तृप्तिर्घर्घरवाक्यता।। 124।। अचैतन्यं च गदिता विंशतिः श्लेष्मजा गदाः। कफ के बीस रोग कहे जाते हैं-1. तन्द्रा (उंघाई), 2. अतिनिद्रता (अधिक नींद आना), 3. गौरव (शरीर में भारीपन), 4 मुखमाधुर्य (मुख का मीठा होना), 5. मुखलेप (मुख में चिपचिपाहट), 6 प्रसेकता (मुख आदि से पानी जाना), 7. श्वेतावलोकन (सभी वस्तुएँ सफेद दिखलायी देना), 8. श्वेतविट्कत्व (सफेद पुरीष होना), 9. श्वेतमूत्रता (सफेद मूत्र होना), 10. श्वेताङ्गवर्णता (शरीर के वर्ण का सफेद होना), 11. शैत्य (शीत लगना), 12. उष्णेच्छा (गर्म की अभिलाषा), 13. तिक्तकामिता (कडुये पदार्थों की इच्छा), 14. मलाधिक्य (मलों की अधिकता), 15. शुक्रबाहुल्य (शुक्र की अधिकता), 16. बहुमूत्रता (मूत्र का अधिक होना), 17. आलस्य, 18. मन्दबुद्धित्व (बुद्धि का मन्द होना), 19. तृप्ति (भूख न लगना), 20. घर्घर-वाक्यता (बोलने में घरघराहट), एवं 21. अचैतन्य (जड़ता) -ये बीस कफज रोग होते हैं। वक्तव्य-उक्त रोग कफ-प्रकोप के बिना हो ही नहीं सकते, अतः इन्हें 'कफ रोग' कहते हैं। उक्त रोग बीस कहकर इक्कीस गिनाये गये हैं। रक्तज रोग-गणना रक्तस्य च दश प्रोक्ता व्याधयस्तेषु गौरवम्।। 125।। रक्तमण्डलता रक्तनेत्रत्वं रक्तमूत्रता। रक्तष्ठीनवता रक्तपिडकानां च दर्शनम्।। 126।। औष्ण्यं च पूतिगन्धत्वं पीडा पाकश्च जायते। रक्त के दस रोग कहे जाते हैं-1. गौरव (भारीपन), 2. रक्तमण्डलता (लाल चकत्ते निकलना), 3. रक्तनेत्रत्व (आँखों में सुर्खी), 4. रक्तमूत्रता (मूत्र में सुर्खी), 5. रक्तष्ठीवन (थूक में खून आना), 6. रक्तपिडका-दर्शन (लाल फुन्सियाँ निकलना), 7. औष्ण्य (गर्मी), 8. पूतिगन्धत्व (दुर्गन्ध आना), 9. पीड़ा (छूने पर भी कष्ट होना) तथा 10. पाक (पक जाना)। वक्तव्य-उक्त सभी रोग रक्त की विकृति से होते हैं। वात, पित्त, कफ तथा रक्त के रोगों का भली-भाँति परिचय प्राप्त कर लेने पर निदान करने में बहुत सहायता मिलती है। मुखरोग-गणना चतुःसप्ततिसङ्ख्याका मुखरोगास्तथोदिताः।। 127।। मुखरोग चौहत्तर कहे गये हैं। वक्तव्य-ओष्ठ, दन्त, दन्तमूल या दन्तवेष्ट, जिह्वा, तालु तथा गले के रोग 'मुखरोग' कहे जाते हैं। स्मरण रहे कि यहाँ पर 'मुख' का अर्थ है-मुखगुहा अर्थात् ओठों से गले तक का स्थान। ओष्ठरोग-गणना तेष्वोष्ठरोगा गणिता एकादशमिता बुधैः। वातपित्तकफैस्त्रेधा त्रिदोषैरसृजा तथा।। 128।। क्षतं मांसाबुर्दं चैव खण्डौष्ठं च जलार्बुदम्। मेदोऽर्बुदं चार्बुदं च रोगा एकादशौष्ठजाः।। 129।। विद्वानों ने मुखरोगों में ग्यारह 'ओष्ठरोग' माने हैं। यथा- वात, पित्त एवं कफ से तीन, सन्निपात से एक, रक्त से एक, क्षत (अभिघात) से एक, मांसाबुर्द (मांस दोष से) एक, खण्डौष्ठ (ओठ फटना) एक, जलार्बुद एक, मेदोर्बुद (मेदा से) एक तथा अर्बुद (रसौली) एक-इस प्रकार ओठों के ग्यारह रोग होते हैं। वक्तव्य-अर्बुद एक ऐसा व्यापक रोग है, जो शरीर के किसी अवयव में उत्पन्न हो सकता है। इस विवेचन पर ध्यान दें। दन्तरोग-गणना दन्तरोगो दशाख्यातो दालनः कृमिदन्तकः।