भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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76 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे [ वाम स्तम्भः ] दन्तहर्षः करालश्च दन्तचालश्च शर्करा ।। 130 ।। अधिदन्तः श्यावदन्तो दन्तभेदः कपालिका। दन्तरोग दस होते हैं-1. दालन (दाँत-दुखना), 2. कृमिदन्तक (दाँत में कीड़ा लगना 'दन्तादा:'-सु० उ० अ० 54), 3. दन्तहर्ष (शीत एवं अम्ल आदि के स्पर्श को न सहना), 4. कराल (दाँतों का आगे-पीछे हो जाना), 5. दन्तचाल (दाँतों का हिलना), 6. शर्करा (दाँतों पर से बालू जैसे कण गिरना), 7. अधिदन्त (दाँत के आगे-पीछे अधिक दाँत निकलना), 8. श्यावदन्त (दाँत का नीला या काला हो जाना), 9. दन्तभेद (दाँत का टूटना) तथा 10. कपालिका (दाँत पर से पपड़ी उतरना)। दन्तमूलगत रोग-गणना तथा त्रयोदशमिता दन्तमूलामयाः स्मृताः ।। 131 ।। शीतादोपकुशौ द्वौ तु दन्तविद्रधिपुप्पुटौ। अधिमांसो विदर्भश्च महासौषिरसौषिरौ ।। 132 ।। तेष्वेव गतयः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि। सन्निपाताद् गतिश्चान्या रक्तनाडी च पञ्चमी ।। 133 ।। दन्तमूल या मसूड़ों के रोग तेरह होते हैं-1. शीताद (खून जाना, दाँत की जड़ का पक जाना), 2. उपकुश (मसूड़े में दाह, पाक एवं दाँत का हिलना), 3. दन्तविद्रधि (फुड़िया निकलना), 4. पुप्पुट (मसूड़ा फूलना), 5. अधिमांस (पिछली दाढ़ का जड़ में सूजन होना), 6. विदर्भ (मसूड़ों पर रगड़ लगने से सूजन होना), 7. महासौषिर (दाँतों का हिलना एवं तालु का फटना), 8. सौषिर (मसूड़ों में पीड़ा तथा सूजन होना) तथा मसूड़ों में पाँच प्रकार के नासूर होना, यथा-1. वात, 2. पित्त, 3. कफ, 4. सन्निपात तथा 5. रक्त से। जिह्वागत रोग-गणना तथा जिह्वामयाः षट् स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा। अलसश्च चतुर्थः स्यादधिजिह्वश्च पञ्चमः ।। 134 ।। षष्ठश्चैवोपजिह्वः स्यात्- जिह्वा (जीभ) के छः रोग होते हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, अलस चौथा, अधिजिह्वा पाँचवीं और उपजिह्वा छठीं। तालुगत रोग-गणना -तथाष्टौ तालुजा गदाः। अर्बुदं तालुपिडका कच्छपी तालुसंहतिः ।। 135 ।। [ दक्षिण स्तम्भः ] गलशुण्डी तालुशोषस्तालुपाकश्च पुप्पुटः। तालु रोग आठ होते हैं-1. अर्बुद, 2. तालुपिड़का, 3. कच्छपी, 4. तालुसंहति, 5. गलशुण्डी, 6. तालुशोष, 7. तालुपाक तथा 8. तालुपुप्पुट। कण्ठगत रोग-गणना गलरोगास्तथाख्याता अष्टादशमिता बुधैः ।। 136 ।। वातरोहिणिका पूर्वं द्वितीया पित्तरोहिणी। कफरोहिणिका प्रोक्ता त्रिदोषैरपि रोहिणी ।। 137 ।। मेदोरोहिणिका वृन्दो गलौघो गलविद्रधिः। स्वरहा तुण्डिकेरी च शतघ्नी शालुकोऽर्बुदम् ।। 138 ।। गलायुर्वलयश्चापि वाताद् गण्डः कफात् तथा। मेदोगण्डस्तथैव स्यादित्यष्टादश कण्ठजाः ।। 139 ।। विद्वानों ने गले के अठारह रोग माने हैं-1. वातरोहिणिका, 2. पित्तरोहिणी, 3. कफरोहिणी, 4. सन्निपातरोहिणी, 5. मेदोरोहिणी, 6. वृन्द, 7. गलौघ, 8. गलविद्रधि, 9. स्वरहा (स्वरयन्त्र का नाश), 10. तुण्डिकेरी, 11. शतघ्नी, 12. शालूक, 13. अर्बुद, 14. गलायु, 15. वलय, 16. वातगण्ड, 17. कफगण्ड तथा 18 मेदोगण्ड। मुखगत रोग-गणना मुखान्तःसम्भवा रोगा अष्टौ ख्याता महर्षिभिः। मुखपाको भवेद् वातात्पित्तात् तद्वत् कफादपि ।। 140 ।। रक्ताच्च सन्निपाताच्च पूत्यास्योर्ध्वगदावपि। अर्बुदं चेति मुखजाश्चतुःसप्ततिरामयाः ।। 141 ।। महर्षियों ने मुख की भीतरी दीवार के आठ रोग कहे हैं। पाँच प्रकार का 'मुखपाक' यथा-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से तथा, 6. पूत्यास्य (मुख से दुर्गन्ध आना), 7. ऊर्ध्वगद (तालु का लाल हो जाना) और 8. अर्बुद। इस प्रकार कुल मिलाकर 'चौहत्तर' रोग मुख के कहे गये हैं। कर्णगत रोग-गणना कर्णरोगाः समाख्याता अष्टादशमिता बुधैः। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपाताच्च विद्रधिः ।। 142 ।। शोथोऽर्बुदं पूतिकर्णः कर्णार्शः कर्णहल्लिका। बाधिर्यं तन्त्रिका कण्डूः शष्कुली कृमिकर्णकः ।। 143 ।। कर्णनादः प्रतीनाह इत्यष्टादश कर्णजाः।