भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 77

विद्वानों ने कर्ण (कान) के अठारह रोग कहे हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से, 6. विद्रधि (कान के भीतर जो फुन्सी हो जाती है), 7. कर्णशोथ, 8. अर्बुद, 9. पूतिकर्ण (कान में दुर्गन्धि युक्त पीब बहना), 10. कर्णार्श (कान में मांसांकुर होना), 11. कर्णहल्लिका (कान में पतंगा या सलाई आदि का चला जाना), 12. बाधिर्य (बहरा होना), 13. तन्त्रिका (सितार की-सी ध्वनि सुनायी पड़ना), 14. कण्डू (खुजली), 15. शष्कुली (कान में से 'कर्णगूथ' का निकलना), 16. कृमिकर्णक (कान में कीड़े पड़ना-सु० उ० अ० 54 श्लोक 14), 17. कर्णनाद (अनेक प्रकार के शब्द सुनायी पड़ना) तथा 18. प्रतिनाह, यह कर्णगूथ का ही अवस्थान्तर है। इसमें 'आधासीसी' नामक शिरोरोग भी हो जाता है। वक्तव्य-उक्त रोग कान के भीतरी अवयवों में होते हैं।

कर्णपालीगत रोग-गणना कर्णपालीसमुद्भूता रोगाः सप्त इहोदिताः ।। 144 ।। उत्पातः पालिशोषश्च विदारी दुःखवर्धनः । परिपोटश्च लेही च पिप्पली चेति संस्मृताः ।। 145 ।। कर्णपाली (बाह्यकर्ण या कर्णशष्कुली) के रोग सात कहे जाते हैं-1. उत्पात, 2. पालिशोष, 3. विदारी, 4. दुःखवर्धन, 5. परिपोट, 6. परिलेही तथा 7. पिप्पली। वक्तव्य-उक्त रोग कान के बाहरी अवयव के हैं। विशेष जानने के लिए सु० उ० अ० 20 देखें।

कर्णमूलगत रोग-गणना कर्णमूलामयाः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि । सन्निपाताच्च रक्ताच्च- कर्णमूलगत रोग पाँच होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से तथा 5. रक्त से। वक्तव्य-कान के मूल में शोथ प्रायः सन्निपातज ज्वरों के अन्त में होता है।

नासारोग-गणना -तथा नासाभवा गदाः ।। 146 ।। अष्टादशैव सङ्ख्याताः प्रतिश्यायास्तु तेष्वपि। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपातेन पञ्चमः ।। 147 ।।


अपीनसः पूतिनासो नासार्शो भ्रंशथुः क्षवः । नासानाहः पूतिरक्तमर्बुदः दुष्टपीनसम् ।। 148 ।। नासाशोषो घ्राणपाकः पूयस्रावश्च दीप्तकः । नासा में होने वाले रोग अठारह कहे जाते हैं। इनमें पाँच 'प्रतिश्याय' होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3 कफ से, 4 रक्त से तथा 5. सन्निपात से, 6. अपीनस (जुकाम), 7. पूतिनास (नाक से दुर्गन्ध आना), 8. नासार्श (नाक में अर्श होना), 9. भ्रंशथु (नाक से बहुत अधिक मैल जाना), 10. क्षव (छींक), 11. नासानाह (नाक का बन्द हो जाना), 12 पूतिरक्त (दुर्गन्धियुक्त रक्त का जाना), 13 अर्बुद, 14. दुष्टपीनस (जुकाम बिगड़ना), 15. नासाशोष, 16. घ्राणपाक, 17. पूयस्राव (पीब जाना) तथा 18. दीप्तक (दाह या जलन होना)।

शिरोरोग-गणना तथा दश शिरोरोगा वातेनार्धावभेदकः ।। 149 ।। शिरस्तापश्च वातेन पित्तपीडा तृतीयका । चतुर्थी कफजा पीडा रक्तजा सन्निपातजा ।। 150 ।। सूर्यावर्त्ताच्छिरःकम्पात् कृमिभिः शङ्खकेन च । शिरोरोग दस कहे जाते हैं-1. वात से अर्द्धावभेदक या आधासीसी, 2. शिरस्ताप-वात से सिर दुखना, 3. पित्त से सिर दुखना, 4. कफ से सिर दुखना, 5. रक्त तथा 6. सन्निपात से सिर दुखना, 7. सूर्यावर्त्त (प्रातःकाल से दोपहर तक बढ़ता है, सायंकाल तक घटता है और रात्रि में शान्त रहता है), 8. शिरःकम्पः (इसको 'अनन्तवात' कहना उचित होगा-'गण्डस्य पार्श्वे तु करोति कम्पं' सु० उ० अ० 25), 9. कृमिज शिरोरोग (सिर में कृमि पड़ने से होने वाला) तथा 10 शंखक (यह बहुत भयंकर सिर-दर्द है)।

शिरःकपालगत रोग-गणना तथा कपालरोगाः स्युर्नव तेषूपशीर्षकम् ।। 151 ।। अरुषिका विद्रधिश्च दारुणं पिडकाऽर्बुदम् । इन्द्रलुप्तं च खलितं पलितं चेति ते नव ।। 152 ।। शिरःकपाल के नौ रोग होते हैं-1. उपशीर्षक (शिर का बड़ा हो जाना-'कपाले पवने दुष्टे गर्भस्थस्यापि जायते । सवर्णो नीरुजः शोफस्तं विद्यात् उपशीर्षकम् ।।', 2. अरुषिका (इसमें अनन्त फुन्सियाँ निकल कर उनमें से पीला पंछा निकलता है,