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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

76 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे [ वाम स्तम्भः ] दन्तहर्षः करालश्च दन्तचालश्च शर्करा ।। 130 ।। अधिदन्तः श्यावदन्तो दन्तभेदः कपालिका। दन्तरोग दस होते हैं-1. दालन (दाँत-दुखना), 2. कृमिदन्तक (दाँत में कीड़ा लगना 'दन्तादा:'-सु० उ० अ० 54), 3. दन्तहर्ष (शीत एवं अम्ल आदि के स्पर्श को न सहना), 4. कराल (दाँतों का आगे-पीछे हो जाना), 5. दन्तचाल (दाँतों का हिलना), 6. शर्करा (दाँतों पर से बालू जैसे कण गिरना), 7. अधिदन्त (दाँत के आगे-पीछे अधिक दाँत निकलना), 8. श्यावदन्त (दाँत का नीला या काला हो जाना), 9. दन्तभेद (दाँत का टूटना) तथा 10. कपालिका (दाँत पर से पपड़ी उतरना)। दन्तमूलगत रोग-गणना तथा त्रयोदशमिता दन्तमूलामयाः स्मृताः ।। 131 ।। शीतादोपकुशौ द्वौ तु दन्तविद्रधिपुप्पुटौ। अधिमांसो विदर्भश्च महासौषिरसौषिरौ ।। 132 ।। तेष्वेव गतयः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि। सन्निपाताद् गतिश्चान्या रक्तनाडी च पञ्चमी ।। 133 ।। दन्तमूल या मसूड़ों के रोग तेरह होते हैं-1. शीताद (खून जाना, दाँत की जड़ का पक जाना), 2. उपकुश (मसूड़े में दाह, पाक एवं दाँत का हिलना), 3. दन्तविद्रधि (फुड़िया निकलना), 4. पुप्पुट (मसूड़ा फूलना), 5. अधिमांस (पिछली दाढ़ का जड़ में सूजन होना), 6. विदर्भ (मसूड़ों पर रगड़ लगने से सूजन होना), 7. महासौषिर (दाँतों का हिलना एवं तालु का फटना), 8. सौषिर (मसूड़ों में पीड़ा तथा सूजन होना) तथा मसूड़ों में पाँच प्रकार के नासूर होना, यथा-1. वात, 2. पित्त, 3. कफ, 4. सन्निपात तथा 5. रक्त से। जिह्वागत रोग-गणना तथा जिह्वामयाः षट् स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा। अलसश्च चतुर्थः स्यादधिजिह्वश्च पञ्चमः ।। 134 ।। षष्ठश्चैवोपजिह्वः स्यात्- जिह्वा (जीभ) के छः रोग होते हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन, अलस चौथा, अधिजिह्वा पाँचवीं और उपजिह्वा छठीं। तालुगत रोग-गणना -तथाष्टौ तालुजा गदाः। अर्बुदं तालुपिडका कच्छपी तालुसंहतिः ।। 135 ।। [ दक्षिण स्तम्भः ] गलशुण्डी तालुशोषस्तालुपाकश्च पुप्पुटः। तालु रोग आठ होते हैं-1. अर्बुद, 2. तालुपिड़का, 3. कच्छपी, 4. तालुसंहति, 5. गलशुण्डी, 6. तालुशोष, 7. तालुपाक तथा 8. तालुपुप्पुट। कण्ठगत रोग-गणना गलरोगास्तथाख्याता अष्टादशमिता बुधैः ।। 136 ।। वातरोहिणिका पूर्वं द्वितीया पित्तरोहिणी। कफरोहिणिका प्रोक्ता त्रिदोषैरपि रोहिणी ।। 137 ।। मेदोरोहिणिका वृन्दो गलौघो गलविद्रधिः। स्वरहा तुण्डिकेरी च शतघ्नी शालुकोऽर्बुदम् ।। 138 ।। गलायुर्वलयश्चापि वाताद् गण्डः कफात् तथा। मेदोगण्डस्तथैव स्यादित्यष्टादश कण्ठजाः ।। 139 ।। विद्वानों ने गले के अठारह रोग माने हैं-1. वातरोहिणिका, 2. पित्तरोहिणी, 3. कफरोहिणी, 4. सन्निपातरोहिणी, 5. मेदोरोहिणी, 6. वृन्द, 7. गलौघ, 8. गलविद्रधि, 9. स्वरहा (स्वरयन्त्र का नाश), 10. तुण्डिकेरी, 11. शतघ्नी, 12. शालूक, 13. अर्बुद, 14. गलायु, 15. वलय, 16. वातगण्ड, 17. कफगण्ड तथा 18 मेदोगण्ड। मुखगत रोग-गणना मुखान्तःसम्भवा रोगा अष्टौ ख्याता महर्षिभिः। मुखपाको भवेद् वातात्पित्तात् तद्वत् कफादपि ।। 140 ।। रक्ताच्च सन्निपाताच्च पूत्यास्योर्ध्वगदावपि। अर्बुदं चेति मुखजाश्चतुःसप्ततिरामयाः ।। 141 ।। महर्षियों ने मुख की भीतरी दीवार के आठ रोग कहे हैं। पाँच प्रकार का 'मुखपाक' यथा-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से तथा, 6. पूत्यास्य (मुख से दुर्गन्ध आना), 7. ऊर्ध्वगद (तालु का लाल हो जाना) और 8. अर्बुद। इस प्रकार कुल मिलाकर 'चौहत्तर' रोग मुख के कहे गये हैं। कर्णगत रोग-गणना कर्णरोगाः समाख्याता अष्टादशमिता बुधैः। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपाताच्च विद्रधिः ।। 142 ।। शोथोऽर्बुदं पूतिकर्णः कर्णार्शः कर्णहल्लिका। बाधिर्यं तन्त्रिका कण्डूः शष्कुली कृमिकर्णकः ।। 143 ।। कर्णनादः प्रतीनाह इत्यष्टादश कर्णजाः।

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 77

विद्वानों ने कर्ण (कान) के अठारह रोग कहे हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से, 6. विद्रधि (कान के भीतर जो फुन्सी हो जाती है), 7. कर्णशोथ, 8. अर्बुद, 9. पूतिकर्ण (कान में दुर्गन्धि युक्त पीब बहना), 10. कर्णार्श (कान में मांसांकुर होना), 11. कर्णहल्लिका (कान में पतंगा या सलाई आदि का चला जाना), 12. बाधिर्य (बहरा होना), 13. तन्त्रिका (सितार की-सी ध्वनि सुनायी पड़ना), 14. कण्डू (खुजली), 15. शष्कुली (कान में से 'कर्णगूथ' का निकलना), 16. कृमिकर्णक (कान में कीड़े पड़ना-सु० उ० अ० 54 श्लोक 14), 17. कर्णनाद (अनेक प्रकार के शब्द सुनायी पड़ना) तथा 18. प्रतिनाह, यह कर्णगूथ का ही अवस्थान्तर है। इसमें 'आधासीसी' नामक शिरोरोग भी हो जाता है। वक्तव्य-उक्त रोग कान के भीतरी अवयवों में होते हैं।

कर्णपालीगत रोग-गणना कर्णपालीसमुद्भूता रोगाः सप्त इहोदिताः ।। 144 ।। उत्पातः पालिशोषश्च विदारी दुःखवर्धनः । परिपोटश्च लेही च पिप्पली चेति संस्मृताः ।। 145 ।। कर्णपाली (बाह्यकर्ण या कर्णशष्कुली) के रोग सात कहे जाते हैं-1. उत्पात, 2. पालिशोष, 3. विदारी, 4. दुःखवर्धन, 5. परिपोट, 6. परिलेही तथा 7. पिप्पली। वक्तव्य-उक्त रोग कान के बाहरी अवयव के हैं। विशेष जानने के लिए सु० उ० अ० 20 देखें।

कर्णमूलगत रोग-गणना कर्णमूलामयाः पञ्च वातात्पित्तात्कफादपि । सन्निपाताच्च रक्ताच्च- कर्णमूलगत रोग पाँच होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से तथा 5. रक्त से। वक्तव्य-कान के मूल में शोथ प्रायः सन्निपातज ज्वरों के अन्त में होता है।

नासारोग-गणना -तथा नासाभवा गदाः ।। 146 ।। अष्टादशैव सङ्ख्याताः प्रतिश्यायास्तु तेष्वपि। वातात्पित्तात्कफाद्रक्तात् सन्निपातेन पञ्चमः ।। 147 ।।


अपीनसः पूतिनासो नासार्शो भ्रंशथुः क्षवः । नासानाहः पूतिरक्तमर्बुदः दुष्टपीनसम् ।। 148 ।। नासाशोषो घ्राणपाकः पूयस्रावश्च दीप्तकः । नासा में होने वाले रोग अठारह कहे जाते हैं। इनमें पाँच 'प्रतिश्याय' होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3 कफ से, 4 रक्त से तथा 5. सन्निपात से, 6. अपीनस (जुकाम), 7. पूतिनास (नाक से दुर्गन्ध आना), 8. नासार्श (नाक में अर्श होना), 9. भ्रंशथु (नाक से बहुत अधिक मैल जाना), 10. क्षव (छींक), 11. नासानाह (नाक का बन्द हो जाना), 12 पूतिरक्त (दुर्गन्धियुक्त रक्त का जाना), 13 अर्बुद, 14. दुष्टपीनस (जुकाम बिगड़ना), 15. नासाशोष, 16. घ्राणपाक, 17. पूयस्राव (पीब जाना) तथा 18. दीप्तक (दाह या जलन होना)।

शिरोरोग-गणना तथा दश शिरोरोगा वातेनार्धावभेदकः ।। 149 ।। शिरस्तापश्च वातेन पित्तपीडा तृतीयका । चतुर्थी कफजा पीडा रक्तजा सन्निपातजा ।। 150 ।। सूर्यावर्त्ताच्छिरःकम्पात् कृमिभिः शङ्खकेन च । शिरोरोग दस कहे जाते हैं-1. वात से अर्द्धावभेदक या आधासीसी, 2. शिरस्ताप-वात से सिर दुखना, 3. पित्त से सिर दुखना, 4. कफ से सिर दुखना, 5. रक्त तथा 6. सन्निपात से सिर दुखना, 7. सूर्यावर्त्त (प्रातःकाल से दोपहर तक बढ़ता है, सायंकाल तक घटता है और रात्रि में शान्त रहता है), 8. शिरःकम्पः (इसको 'अनन्तवात' कहना उचित होगा-'गण्डस्य पार्श्वे तु करोति कम्पं' सु० उ० अ० 25), 9. कृमिज शिरोरोग (सिर में कृमि पड़ने से होने वाला) तथा 10 शंखक (यह बहुत भयंकर सिर-दर्द है)।

शिरःकपालगत रोग-गणना तथा कपालरोगाः स्युर्नव तेषूपशीर्षकम् ।। 151 ।। अरुषिका विद्रधिश्च दारुणं पिडकाऽर्बुदम् । इन्द्रलुप्तं च खलितं पलितं चेति ते नव ।। 152 ।। शिरःकपाल के नौ रोग होते हैं-1. उपशीर्षक (शिर का बड़ा हो जाना-'कपाले पवने दुष्टे गर्भस्थस्यापि जायते । सवर्णो नीरुजः शोफस्तं विद्यात् उपशीर्षकम् ।।', 2. अरुषिका (इसमें अनन्त फुन्सियाँ निकल कर उनमें से पीला पंछा निकलता है,

जो वहीं जम जाता है), 3. विद्रधि, 4. दारुण, (रूसी), 5. पिडका, 6. अर्बुद, 7. इन्द्रलुप्त. (शिर-पर से बालों का उखड़ना), 8. खलिति (जो सदा के लिए चाँद के बाल उखड़ जाते हैं) तथा 9. पलित (अकाल में बालों का सफेद होना)। वक्तव्य—ये शिर के बाहरी भाग के रोग हैं। नेत्ररोग-गणना तथा नेत्रभवाः ख्याताश्चतुर्नवतिरामयाः। नेत्र में होने वाले रोग 'चौरानवे' होते हैं। नेत्रवर्त्म रोग तेषु वर्त्मगदाः प्रोक्ताश्चतुर्विंशतिसंज्ञकाः ।। 153 ।। कृच्छ्रोन्मीलः पक्ष्मपातः कफोत्क्लिष्टश्च लोहितः। अरुङ्निमेषः कथितो रक्तोत्क्लिष्टः कुकूणकः ।। 154 ।। पक्ष्मार्शः पक्ष्मरोधश्च पित्तोत्क्लिष्टश्च पोथकी। क्लिष्टवर्त्मा च बहलः पक्ष्मोत्सर्गस्तथार्बुदम् ।। 155 ।। कुम्भिका सिकतावत्र्म लगणोऽञ्जननामिका। कर्दमः श्याववत्र्मा च बिसवर्त्मा तथाऽलजी ।। 156 ।। उत्क्लिष्टवर्मेति गदाः प्रोक्ता वर्त्मसमुद्भवाः। उनमें वर्त्म या बरौनी के रोग 'चौबीस' होते हैं-1. कृच्छ्रोन्मील (आँख खोलने में कष्ट होना), 2. पक्ष्मपात (बरौनियों का उखड़ना), 3. कफोत्क्लिष्ट (कीचड़ आना), 4. लोहित (बरौनी लाल होना), 5 अरुङ्निमेष (बार-बार आँख फड़कना), 6. रक्तोत्क्लिष्ट (शोणितार्श), 7. कुकूणक, 8. पक्ष्मार्श (बालों की जड़ में मांसांकुर का होना), 9. पक्ष्मरोध (शोथ के कारण बरौनी को चला न सकना), 10. पित्तोत्क्लिष्ट (पित्तवृद्धि से होने वाला), 11. पोथकी (बरौनी में कण्डूयुक्त अनेक फुन्सियाँ होना), 12. क्लिष्टवर्त्मा (लाल होना), 13. बहलवर्त्म (बरौनी पर अनेक फुन्सियाँ निकलना), 14. पक्ष्मोत्सर्ग (बिलनी), 15. अर्बुद (रसौली), 16 कुम्भिका (एक प्रकार का फुन्सी), 17. सिकतावत्र्म (वर्त्म शर्करा), 18. लगण (बरौनी में एक प्रकार का गाँठ), 19. अञ्जननामिका (लाल फुन्सी), 20. कर्दम (बरौनी का सड़ना), 21. श्याववर्त्म (बरौनियों का काला या नीला हो जाना), 22. बिसवर्त्मा (पानी जाना), 23. अलजी तथा 24. उत्क्लिष्ट- वर्त्म (निमेषोन्मेष का न होना)।

नेत्रसन्धिगत रोग-गणना नेत्रसन्धिसमुद्भूता नव रोगाः प्रकीर्तिताः ।। 157 ।। जलस्रावः कफस्रावो रक्तस्रावश्च पर्वणी। पूयस्रावः कृमिग्रन्थिरुपनाहस्तथाऽलजी ।। 158 ।। पूयालस इति प्रोक्ता रोगा नयनसन्धिजाः। नेत्रसन्धि (बरौनी तथा नेत्रबुद्बुद की सन्धि) के नौ रोग कहे गये हैं-1. जलस्राव, 2. कफस्राव, 3 रक्तस्राव, 4. पर्वणी (शुक्ल तथा कृष्णमण्डल की सन्धि में), 5. पूयस्राव, 6. कृमिग्रन्थि, 7. उपनाह, 8. अलजी तथा 9. पूयालस। वक्तव्य-आँख में छः सन्धियाँ होती हैं। यथा-1. पक्ष्म (बाल) तथा वर्त्म (बरौनी) की, 2. वर्त्म तथा शुक्लमण्डल की, 3. शुक्लमण्डल तथा कृष्णमण्डल की, 4. कृष्णमण्डल तथा दृष्टिमण्डल की, 5. कनीनिका (आँख का अवयव जो नाक की ओर होता है) तथा 6. अपाङ्ग (जो पुटीपुटी की ओर होता है) का सन्धि। देखें-सु० उ० अ० 1। नेत्रशुक्ल-भागगत रोग-गणना तथा शुक्लगतो रोगा बुधैः प्रोक्तास्त्रयोदश ।। 159 ।। सिरोत्पातः सिराहर्षः सिराजालं च शुक्तिका। शुक्लार्म चाधिमांसार्म प्रस्तार्यर्म च पिष्टकः ।। 160 ।। शिराजपिडका चैव कफग्रन्थितकोऽर्जुनः। स्नाय्वर्म शोणितार्मं स्यादिति शुक्लगतो गदाः ।। 161 ।। विद्वानों ने नेत्र-शुक्लभाग के तेरह रोग कहे हैं-1. सिरोत्पात, 2. सिराहर्ष, 3. सिराजाल, 4. शुक्तिका, 5. शुक्लार्म, 6. अधिमांसार्म, 7. प्रस्तार्यर्म, 8. पिष्टक, 9. शिराजपिडका, 10. कफग्रन्थितक (कफग्रन्थि), 11. अर्जुन, 12. स्नायु-मर्म तथा 13. शोणितार्म (रक्तार्म)। नेत्रकृष्ण-भागगत रोग-गणना तथा कृष्णसमुद्भूताः पञ्च रोगाः प्रकीर्तिताः। शुद्धशुक्रं शिराशुक्रं क्षतशुक्रं तथाऽजका ।। 162 ।। शिरासङ्गश्च सर्वेऽपि प्रोक्ताः कृष्णगता गदाः। नेत्र-कृष्णमण्डल के पाँच रोग हैं-1. शुद्धशुक्र, 2. शिराशुक्र, 3. क्षतशुक्र, 4. अजका तथा 5. सिरासंग। काचरोग-गणना काचं तु षड्विधं ज्ञेयं वातात्पित्तात्मकफादपि ।। 163 ।। सन्निपाताच्च रक्ताच्च षष्ठं संसर्गसम्भवम्।

सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 79 [ बायाँ स्तम्भ ] काच (मोतिया) छः प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त से, तथा 6. संसर्ग से (परिम्लयी)। वक्तव्य- मोतियाबिन्द के उक्त छः भेद वर्ण (रंग) के कारण होते हैं। देखें-सु० उ० अ० 7। तिमिररोग-गणना तिमिराणि षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 164 ।। संसर्गेण च रक्तेन षष्ठं स्यात् सन्निपाततः। तिमिर (धुन्ध) छः प्रकार के होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. संसर्ग से, 5. रक्त से एवं, 6. सन्निपात से। वक्तव्य- तिमिर को 'धुन्ध' भी कहा जाता है। लिङ्गनाश रोग-गणना लिङ्गनाशः सप्तधा स्याद्वातात्पित्तात्कफेन च ।। 165 ।। त्रिदोषै रुपसर्गेण संसर्गेणासृजा तथा। लिङ्गनाश (दृष्टिनाश) सात होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. त्रिदोष से, 5. उपसर्ग से, 6. संसर्ग से तथा 7. रक्त से। वक्तव्य- इस रोग से दृष्टि या दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है। (उक्त 5वाँ तथा 6ठा लिंगनाश निमित्तज तथा अनिमित्तज नाम से प्रसिद्ध है)। दृष्टिगत रोग-गणना अष्टधा दृष्टिरोगाः स्युस्तेषु पित्तविदग्धकम् ।। 166 ।। अम्लपित्तविदग्धं च तथैवोष्णविदग्धकम्। नकुलाख्यं धूसरान्ध्यं रात्र्यान्ध्यं ह्रस्वदृष्टिकः ।। 167 ।। गम्भीरदृष्टिरित्येते रोगा दृष्टिगता मताः। दृष्टि के रोग आठ होते हैं-1. पित्तविदग्धक (दिवान्ध्य), 2. अम्लपित्तविदग्ध (अम्लपित्त से होने वाला दृष्टिदोष), 3. उष्णविदग्ध (धूप में तथा आग के सामने बैठने से होने वाला), 4. नकुलांध्य (नेवले की-सी आँखें होकर कम दिखलायी देना), 5. धूसरांध्य (साफ-साफ न दिखलायी देना) 6. रात्र्यांध्य (कफविदग्धक या रतौंधी), 7. ह्रस्वदृष्टिक (बारीक वस्तुएँ न दिखलायी देना) और 8. गम्भीरदृष्टि (दृष्टिमण्डल का संकुचित होना या सिकुड़ जाना)। [ दायाँ स्तम्भ ] वक्तव्य- उक्त रोगों में दृष्टि विकृत हो जाती है, नष्ट नहीं होती। अम्लपित्त के रोगी की दृष्टि मन्द हो जाती है। अधिमन्थ रोग-गणना (चत्वारश्चाधिमन्थाः स्युर्वातपित्तकफास्रतः ।। 168 ।।) अधिमंथ नामक रोग चार होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से तथा 4. रक्त से। वक्तव्य- अभिष्यन्द रोग के बिगड़ जाने से 'अधिमन्थ' रोग हो जाता है। अभिष्यन्द रोग-गणना अभिष्यन्दाश्च चत्वारो रक्ताद्दोषैस्त्रिभिस्त्रिधा। अभिष्यन्द चार होते हैं-रक्त से एक तथा वात आदि तीनों दोषों से तीन। वक्तव्य- अभिष्यन्द को ही 'आँख दुखना' या 'आँख आना' कहते हैं। सर्वनेत्ररोग-गणना सर्वाक्षिरोगाश्चाष्टौ स्युस्तेषु वातविपर्ययः ।। 169 ।। अल्पशोफोऽन्यतोवातस्तथा पाकात्ययः स्मृतः। शुष्काक्षिपाकश्च तथा शोफोऽध्युषित एव च ।। 170 ।। हताधिमन्थ इत्येते रोगाः सर्वाक्षिसम्भवाः। सम्पूर्ण आँख के आठ रोग होते हैं-1. वातविपर्यय, 2. अल्पशोफ, 3. अन्यतोवात, 4. पाकात्यय, (नेत्रबुद्बुद का पक जाना, इसमें अन्त में आँख बैठ जाती है), 5. शुष्काक्षिपाक (इसमें बुद्बुद छोटा हो जाता है), 6. शोफ, 7. अध्युषित (अम्लाध्युषित खटाई खाने या आँख में पड़ने से होता है) एवं 8. हताधिमन्थ (अधिमन्थ से आँख का नष्ट हो जाना)। वक्तव्य- उक्त रोगों का प्रभाव आँख के सम्पूर्ण भागों पर पड़ता है। पुंस्त्वरोग-गणना पुंस्त्वदोषास्तु पञ्चैव प्रोक्तास्तत्रेर्ष्याकः स्मृतः ।। 171 ।। आसेक्यश्चैव कुम्भीकः सुगन्धिः षण्डसंज्ञकः। पुंस्त्व (पुरुषत्व या मर्दानगी) के पाँच दोष होते हैं। जिनसे पाँच प्रकार के पुरुष पाये जाते हैं-1. ईर्ष्यक, 2. आसेक्य, 3 कुम्भीक, 4. सुगन्धि तथा 5. षण्ड नामक। वक्तव्य- उक्त प्रकार के मनुष्य पूर्ण पुरुष नहीं होते अर्थात्

80 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे उनमें स्वतः मैथुन-शक्ति नहीं होती, अतः वे स्वयं मैथुन नहीं कर सकते। 1. ईर्घ्यक-जो ईर्ष्या से अर्थात् दूसरों को मैथुन करते देखकर मैथुन में समर्थ हो सकते हैं। 2. आसेक्य-जो शुक्र अर्थात् दूसरों के शुक्र जैसे शिववीर्य पारद या मकरध्वज आदि तथा शुक्रवर्धक औषधियाँ तथा बकरे, मुर्गे आदि का शुक्र खाकर ('शुक्रं शुक्रेण' च० शा० अ० 6) मैथुन में समर्थ हो सकते हैं ('आसेक्यः शुक्रासेचनयोग्यः' 'अर्थात् येषां शरीरे शुक्रस्य आसेचनस्य आवश्यकता भवति' इति)। 3. कुम्भीक-ये लोग अपने गुद में मैथुन कराने के अभिलाषी होते हैं। 4. सुगन्धि-ये लोग लिंग अथवा योनि की गन्ध सूँघकर मैथुन-कर्म करने में समर्थ हो सकते हैं। जैसे-साँड़ आदि। 5. षण्ढ-जो सर्वथा मैथुन के अयोग्य होते हैं, इन्हें हिजड़ा या तृतीया-प्रकृति कहा जाता है। इस सम्बन्ध में सु० शा० अ० 2 तथा च० शा० अ० 2 देखें। शुक्रधातु रोग-गणना शुक्रदोषास्तथाष्टौ स्युर्वातपित्तात्कफेन च ।। 172 ।। कुणपं श्लेष्मवाताभ्यां पूयाभं श्लेष्मपित्ततः। क्षीणं च वातपित्ताभ्यां ग्रन्थिलं श्लेष्मवाततः ।। 173 ।। मलाभं सन्निपाताच्च शुक्रदोषा इतीरिताः। शुक्रधातु के दोष आठ होते हैं-1. वात (वायु के वर्ण के सदृश एवं वेदना) से, 2. पित्त (पित्त के वर्ण एवं वेदना) से, 3. कफ (कफ के वर्ण एवं वेदना) से, 4. कुणप (मुरदे की-सी गन्ध से युक्त) रक्तपित्त से, 5. मलाभ (पीब जैसा कफपित्त) से, 6. क्षीण (जिसका शुक्र क्षय हो गया हो) वातपित्त से, 7. ग्रन्थिल (गाँठों वाले कफवायु से) एवं 8. पूयाभ (मूत्र तथा पुरीष की-सी गन्ध वाला) सन्निपात से। वक्तव्य-ये शुक्र की विकृतियाँ हैं, जो शुक्र में पायी जाती हैं। स्त्रीरोग-गणना अथ स्त्रीरोगनामानि प्रोच्यन्ते पूर्वशास्त्रतः ।। 174 ।। अष्टावार्तवदोषाः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा। पूयाभं कुणपं ग्रन्थि क्षीणं मलसमं तथा ।। 175 ।। अब प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार स्त्री-रोगों (जो केवल स्त्रियों को ही होते हैं) के नाम कहे जाते हैं। आर्तव के दोष या विकार आठ होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. पूयाभ, 5. कुणप, 6. ग्रन्थिल, 7. क्षीण एवं 8. मलसम। वक्तव्य-उक्त दोष रज में होते हैं। इनके लक्षण शुक्र दोषों के समान ही होते हैं। रक्तप्रदर-गणना तथा च रक्तप्रदरं चतुर्विधमुदाहृतम्। वातपित्तकफैस्त्रेधा चतुर्थं सन्निपाततः ।। 176 ।। रक्तप्रदर चार प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से तथा 4. सन्निपात से। वक्तव्य-उचित मासिकस्राव से अधिक स्राव होना 'प्रदर' कहलाता है। योनिरोग-गणना विंशतियौनिरोगाः स्युर्वातात्पित्तात्कफादपि। सन्निपाताच्च रक्ताच्च लोहितक्षयतस्तथा ।। 177 ।। शुष्का च वामिनी चैव षण्डितान्तर्मुखी तथा। सूचीमुखी विलुप्ता च जातघ्नी च परिप्लुता ।। 178 ।। उपप्लुता प्राक्चरणा महायोनिश्च कर्णिनी। स्यान्नन्दा चातिचरणा योनिरोगा इतीरिताः ।। 179 ।। योनि (भग एवं गर्भाशय) के रोग बीस होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त के क्षय से, 7. शुष्का (जो सूखी रहती है), 8. वामिनी (रजयुक्त वीर्य को उगल देती है), 9. षण्डिता, 10. अन्तर्मुखी (बाहर से बन्द; इसमें ऑपरेशन से सफलता मिल जाती है), 11. सूचीमुखी (इसमें गर्भधान तो हो जाता है, परन्तु शिशु को ऑपरेशन करके निकालना पड़ता है), 12. विलुप्ता (इसमें सर्वदा पीड़ा होती रहती है), 13. जातघ्नी (पुत्रघ्नी, इसी को मृतवत्सा दोष कहा जाता है अथवा जिससे गर्भपात होते रहते हैं), 14. परिप्लुता (मैथुन में पीड़ा होती है), 15. उपप्लुता (इसमें कष्ट से रज निकलता है), 16. प्राक्चरणा (छोटी उम्र में मैथुन करने से जो पीठ, कमर, टाँग एवं कूलहों में पीड़ा होती है), 17. महायोनि (योनि का शिथिल हो जाना), 18. कर्णिनी (योनि में गाँठ हो जाना), 19. नंदा (मैथुन से संतुष्ट न होने वाली; इसी से स्त्रियाँ व्यभिचारिणी हो जाती हैं) तथा 20. अतिचरणा (अति मैथुन से योनि में सूजन, शून्यता एवं पीड़ा का हो जाना)-इस प्रकार योनि के 20 रोग कहे गये हैं। वक्तव्य-इसे विशेष रूप से जानने के लिए च० चि० अ० 30 देखें।

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 81 योनिकन्द-गणना चतुर्विधं योनिकन्दं वातपित्तकफाँस्त्रिधा। चतुर्थं सन्निपातेन- योनिकन्द चार प्रकार का होता है-1. वातज, 2. पित्तज, 3. कफज तथा 4. सन्निपातज। वक्तव्य-योनि में लकुच (बड़हर) के फल के समान उभारदार जो गाँठें उत्पन्न हो जाती हैं, उन्हें योनिकन्द कहा जाता है। गर्भरोग-गणना -तथाष्टौ गर्भजा गदाः ।। 180 ।। उपविष्टकगर्भः स्यात् तथा नागोदरः स्मृतः। मक्कल्लो मूढगर्भश्च विष्कम्भो मूढगर्भकः ।। 181 ।। जरायुदोषो गर्भस्य पातश्चाष्टमकः स्मृतः। गर्भ-सम्बन्धी आठ रोग होते हैं-1. उपविष्टक (किन्हीं कारणों से गर्भपोषक पदार्थों के योनिमार्ग द्वारा निकल जाने के कारण जो गर्भ पुष्ट नहीं हो पाता), 2. नागोदर (माता के उपवास आदि करने के कारण पोषक पदार्थ नहीं मिलने से जो गर्भ सूख जाता है), उक्त दोनों प्रकार के गर्भ अनेक वर्षों तक गर्भाशय में पड़े रह जाते हैं (च० शा० अ० 8); 3. मक्कल्लक, 4. मूढ़गर्भ अनेक प्रकार का होता है, उचित प्रकार से जन्म न होना 5. विष्कम्भ (गर्भ का मार्ग में अड़ जाना), 6. मूढ़गर्भ (गर्भाशय में लीन हो जाना), 7. जरायु दोष (जरायु के न फटने के कारण शिशु का न निकल पाना) तथा 8. गर्भपात (गर्भ का गिर जाना)। स्तनगत रोग-गणना पञ्चैव स्तनरोगाः स्युर्वातात्पित्तात्कफादपि ।। 182 ।। सन्निपातात् क्षताच्चैव- स्तन रोग पाँच होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से तथा 5. क्षत (घाव) से। वक्तव्य-इसे प्रायः 'थनैला' कहा जाता है। स्तनविकार-गणना -तथा स्तन्योद्भवा गदाः। बालरोगेषु कथिताः- स्तन या दुग्ध से होने वाले रोग 'बालरोगों' में कहे जायेंगे। वक्तव्य-क्योंकि दूषित दूध का बुरा प्रभाव बच्चे पर ही पड़ता है। स्त्रीदोष-गणना -स्त्रीदोषाश्च त्रयः स्मृताः ।। 183 ।। अदक्षपुरुषोत्पन्नः सपत्नीविहितस्तथा। दैवाज्जातस्तृतीयस्तु - स्त्री-दोष तीन होते हैं-1. अदक्ष (मूढ़) पुरुष (पति) से उत्पन्न होने वाला, 2. सपत्नी (सौतिन) के कारण होने वाला तथा 3. प्रारब्ध के कारण होने वाला। वक्तव्य-तीन कारणों से स्त्रियाँ दूषित या खराब हो जाती हैं-1. कामकला-विहीन या व्यवहारानभिज्ञ या मूर्ख पति मिलने से; 2. पति के दूसरी स्त्री में आसक्त होने पर ईर्ष्यावश स्त्रियाँ कुमार्गगामिनी हो जाती हैं; 3. स्वभाव से ही व्यभिचारिणी होती हैं। उक्त कारणों से ही स्त्रियाँ झगड़ालू तथा कटु स्वभाव की हो जाती हैं। प्रसूताविकार-गणना -तथा ये सूतिका गदाः ।। 184 ।। ज्वरादयश्चिकित्स्यास्ते यथादोषं यथाबलम्। प्रसूता स्त्रियों के ज्वरादि रोग 'सूतिका रोग' कहे जाते हैं। दोषों के अनुसार या रोग तथा रोगिणी के बल के अनुसार उनकी चिकित्सा करनी चाहिये। वक्तव्य-बच्चा जनने के बाद पैंतालीस दिन तक स्त्री की 'प्रसूता' संज्ञा होती है। इस अवधि के भीतर जो भी रोग हो जाता है, उसे 'सूतिका रोग' कहते हैं। बालरोग-गणना द्वाविंशतिर्बालरोगास्तेषु क्षीरभवास्त्रयः ।। 185 ।। वातात्पित्तात्कफाच्चैव दन्तोद्भेदश्चतुर्थकः। दन्तघातो दन्तशब्दोऽकालदन्तोऽहिपूतनम् ।। 186 ।। मुखपाको मुखस्रावो गुदपाकोपशीर्षकौ। पार्श्वाणुंस्तालुकण्टो विच्छन्नं पारिगर्भिकः ।। 187 ।। दौर्बल्यं गात्रशोषश्च शय्यामूत्रं कुकूणकः। रोदनं चाजगल्ली स्यादिति द्वाविंशतिः स्मृताः ।। 188 ।। बालरोग बाईस होते हैं-इनमें वात, पित्त तथा कफ से 'क्षीरालस' (दूषित दूध पीने से होने वाला) नामक तीन रोग होते हैं। चार दन्तोद्भेद (दाँत निकलते समय इसके कारण

82 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे होने वाले प्रायः ज्वर, अतिसार, कास, कै या शिरोरोग आदि), 5. दन्तघात (दुबारा दाँत टूटना), 6. दन्तशब्द (सोते समय दाँत किटकिटाना), 7. अकालदन्त (असमय में दाँत निकलना, कुछ बच्चे दाँत सहित ही पैदा होते हैं और कुछ को दो-दो वर्ष की आयु तक दाँत नहीं निकलते), 8. अहिपूतन (स्वच्छता के अभाव से चूतड़ों पर फुड़िया या फुड़ियों का निकलना), 9. मुखपाक, 10. मुखस्राव (अधिक लार आना), 11. गुदपाक (गुद-प्रदेश का लाल हो जाना), 12. उपशीर्षक (सिर का फूल जाना या सिर के पिछले भाग में एक फुड़िया होती है, जो चिरस्थायी होती है), 13. पार्श्वारुण (पद्म नामक पसली पर जो लाल चौड़ा दाग हो जाता है, जो कि प्रायः मारक होता है), 14. तालुकण्टक (कौवा बढ़ना), 15. विच्छिन्न (तालु दबाना), 16. पारिगर्भिक (परिभव नामक रोग-इसमें बच्चा पीला पड़ जाता है, पेट बढ़ जाता है। यह रोग गर्भिणी माता का दूध पीने से हो जाता है), 17. दौर्बल्य (दुर्बलता), 18. गात्रशोष (कृशता या सुखण्डी), 19. शय्यामूत्र (सोते में मूतना), 20. कुकूणक, 21. रोदन (अत्यन्त रोना) तथा 22. अजगल्ली (एक प्रकार की माता)। वक्तव्य-उक्त रोगों का प्रभाव 16 वर्ष की अवस्था तक ही होता है। अतएव इनका नाम 'बालरोग' है। 'ऊनषोडशवर्षा बालाः' (सु० सू० अ० 35)। बालग्रह-गणना तथा बालग्रहाः ख्याता द्वादशैव मुनीश्वरैः। स्कन्दग्रहो विशाखः स्ताच्छ्वग्रहश्च पितृग्रहः॥189॥ नैगमेयग्रहस्तद्वच्छकुनिः शीतपूतना। मुखमण्डितिका तद्वत् पूतना चान्धपूतना॥190॥ रेवती चैव सङ्ख्याता तथा स्याच्छुष्करेवती। महर्षियों ने 'बालग्रह' बारह कहे हैं-1. स्कन्दग्रह, 2. विशाख, 3. श्वग्रह (स्कन्दापस्मार, जो 'मिरगी' जैसा होता है), 4. पितृग्रह, 5. नैगमेयग्रह, 6. शकुनिग्रह, 7. शीतपूतना, 8. मुखमण्डितिका, 9. पूतना, 10. अन्धपूतना, 11. रेवती एवं 12. शुष्करेवती। वक्तव्य-ये अलौकिक आत्माएँ हैं, जो बालकों में आवेश करती हैं। गन्दे घरों के बालकों पर अधिकतर इनका प्रभाव होता है। इनमें औषधियों के साथ-साथ बलि, मंगल आदि क्रियाएँ करने पर आरोग्य की प्राप्ति हो जाती है। पादरोग-गणना तथा चरणभेदास्तु वातरक्तादिकाश्च ये।। 191 ।। द्विचत्वारिंशदुक्तास्ते रोगेष्वेव मुनीश्वरैः । विद्वान् चिकित्सकों ने वातरक्त (पैरों में झुनझुनी या सूनापन चढ़ना) आदि चरणों के बयालीस रोग कहे हैं और वे पूर्व कहे गये रोगों में ही बतला दिये गये हैं। दोष-भेद द्विषष्टिर्दोषभेदाः स्युः सन्निपातादिकाश्च ये ।। 192 ।। तेऽपि रोगेषु गणिताः पृथक्प्रोक्ता न ते क्वचित् । वातादि दोषों के जो रोग सन्निपात और संसर्ग आदि बासठ प्रकार के होते हैं, वे पूर्वोक्त रोगों में ही आ जाते हैं, उनका पृथक् उल्लेख कहीं भी नहीं किया गया है। वक्तव्य-'न रोगोऽप्येकदोषजः' अर्थात् कोई भी रोग केवल एक दोष से उत्पन्न नहीं होता, अपितु प्रत्येक रोगों में तीनों ही दोषों की न्यूनाधिक विकृति होती ही है। दोषों की यह न्यूनाधिकता अर्थात् ह्रास तथा वृद्धि बासठ प्रकार की होती है। धातु तथा मलों के साथ दोषों का मिश्रण होने पर असंख्य प्रकार की हो जाती है। प्रत्येक रोग में कौन दोष कितना बढ़ा है और कौन दोष कितना घटा है, इसको विचारना अत्यन्त आवश्यक है। देखें-सु० उ० तं० अ० 66 तथा अ० हृ० सू० अ० 12। पञ्चकर्म-व्यापद् हीनमिथ्यातियोगानां भेदैः पञ्चदशोदिताः ।। 193 ।। पञ्चकर्मभवा रोगा रोगेष्वेव प्रकीर्तिताः । पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, नस्य, निरूहणवस्ति तथा अनुवासनवस्ति) के हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग से पन्द्रह भेद होते हैं। उनसे उत्पन्न होने वाले रोग यथास्थान कह दिये गये हैं। स्नेहादि व्यापद् स्नेहस्वेदौ तथा धूमो गण्डूषोऽञ्जनतर्पणे ।। 194 ।। पीडा अष्टादशैतज्जास्ताश्च रोगेषु लक्षिताः । स्नेहन, स्वेदन, धूमपान, गण्डूष, अञ्जन तथा तर्पण के हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग से अठारह भेद होते हैं। इनसे होने वाले रोग भी पूर्वोक्त रोगों में कह दिये गये हैं।

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 83 [बायाँ स्तम्भ] वक्तव्य-जब वमन, विरेचन, स्नेहन तथा स्वेदन आदि किये जाते हैं, तो वैद्य परिचारक एवं रोगी की असावधानी से कुछ भूलें हो जाती हैं। यथा-वमन आदि का कम होना, ठीक-ठीक न होना तथा अधिक हो जाना। इन्हीं को क्रमशः हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग कहा जाता है। इनसे मनुष्य को पूर्वोक्त रोगों में से ही कोई न कोई रोग हो जाता है। शीत आदि उपद्रव शीतोपद्रव एकः स्यादेकश्चोष्णोद्भवो मतः ।। 195 ।। शल्योपद्रव एकश्च क्षाराच्चैकः स्मृतस्तथा। शीत का उपद्रव (अत्यंत शीत लगने से होने वाला रोग) एक, उष्ण (गर्मी=लू) लगने से होने वाला रोग) एक, शल्य (बाण, बरछी आदि का उपद्रव) एक तथा क्षार (चूना) आदि से होने वाला उपद्रव एक होता है। वक्तव्य-शीत लगने से स्तम्भ (जकड़न), वेपथु (कँपकँपी) आदि, लू लगने से ज्वर, दाह, प्रलाप तथा रक्तनेत्रता (आँखों का लाल हो जाना) आदि, शल्य लगने से व्रण आदि तथा क्षार लगने से छत आदि लक्षण होते हैं। विष-विवेचन स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं च त्रिधा विषम् ।। 196 ।। तेषां च कालकूटाद्यैर्नवधा स्थावरं विषम्। विष तीन प्रकार का होता है-1. स्थावर (वृक्ष जाति का), 2. जंगम (प्राणी जाति का) तथा 3. कृत्रिम (बनावटी)। इनमें स्थावर विष नौ प्रकार का होता है-1. कालकूट, 2. वत्सनाभ (वच्छनाग), 3. शृङ्गिक, 4. प्रतीपक, 5. हालाहल, 6. ब्रह्मपुत्र, 7. हारिद्र, 8. सक्तुक तथा 9. सौराष्ट्रिक। देखें-शा० म० खं० अ० 12। जङ्गमविष-भेद जङ्गमं बहुधा प्रोक्तं तत्र लूता भुजङ्गमाः ।। 197 ।। वृश्चिका मूषिकाः कीटाः प्रत्येकं ते चतुर्विधाः । दंष्ट्राविषं नखविषं बालशृङ्गास्थिभिस्तथा ।। 198 ।। मूत्रात् पुरीषाच्छुक्राच्च दृष्टेर्निश्वसतस्तथा। लालायाः स्पर्शतस्तद्वत् तथा शङ्काविषं मतम् ।। 199 ।। जङ्गम विष अनेक प्रकार का होता है, यथा-अनेक प्रकार की लूताएँ, साँप, बिच्छू, चूहे तथा अन्य कीट (कीड़े)। ये सभी प्रत्येक जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेद से [दायाँ स्तम्भ] अथवा वात, पित्त, कफ तथा सन्निपात की प्रकृति के भेद से, चार-चार प्रकार के होते हैं। इनमें भी किसी के दाँत में विष होता है, किसी के नाखून में, किसी के बाल में, शृंग में, हड्डी में, मूत्र में, पुरीष में, शुक्र में, दृष्टि में, साँस में, लार में तथा स्पर्श (छूने) में विष होता है और एक 'शंकाविष' भी होता है, जिसमें केवल संदेह होने पर विष के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। देखें-सु० क०। कृत्रिम-विष कृत्रिमं द्विविधं प्रोक्तं गरदूषीविभेदतः । सप्तधातुविषं ज्ञेयं तथा सप्तोपधातुजम् ।। 200 ।। तथैवोपविषेभ्यश्च जातं सप्तविधं मतम्। दुष्टनीरविषं चैकं तथैकं दिग्ग्धजं विषम् ।। 201 ।। कृत्रिम विष दो प्रकार का होता है-1. गर तथा 2. दूषीविष। धातुविष (स्वर्ण आदि धातुएँ) सात, उपधातु विष (हरिताल आदि) सात, उपविष (आक, धतूरा आदि) सात, दूषित जल रूपी विष एक तथा दिग्ग्ध विष (विषैले द्रव्यों में बुझाये हुये बाण, तलवार आदि दिग्ग्ध कहे जाते हैं), इनके लगने से शरीर में विष का प्रवेश हो जाता है, यह भी एक ही प्रकार का होता है। वक्तव्य-"विषाणां चाल्पवीर्याणां योगो 'गर' इति स्मृतः" (अ० हृ० उ० अ० 35)। अर्थात् अल्प शक्ति वाले विषों का मिश्रण 'गर' कहा जाता है और जो विष मारता नहीं, किन्तु धातुओं को दूषित करता है, उसे 'दूषीविष' कहा जाता है। अन्य उपद्रव कपिकच्छूभवा कण्डूद्दुष्टनीरभवा तथा। तथा सूरणकण्डूश्च शोथो भल्लातजस्तथा ।। 202 ।। पकी किवाँच की फली के छूने से, दूषित जल के सम्पर्क से तथा सूरण (जिमीकन्द) का रस लगने से खुजली और भिलावा का रस या भाप लगने से शोथ हो जाता है। मद-विचार मदश्चतुर्विधश्चान्यः पूगभङ्गाक्षकोद्रवैः । चतुर्विधोऽन्यो द्रव्याणां फलत्वङ्मूलपत्रजः ।। 203 ।। मद चार प्रकार का होता है-1. पूग (सुपारी), 2. भाँग, 3. बहेड़ा की मींगी तथा 4. कोदों के चावलों को खाने तथा फल (धतूरा आदि), छाल (खदिर, बबूल आदि) के

84 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे

मूल, झाड़ी आदि एवं पत्तों के भाग आदि के सेवन से मद संसार में जो रोग प्रसिद्ध होते हैं, उनकी इस प्रकार चार प्रकार का और भी होता है। गणना की गयी है तथा धातु मूल एवं जीवादि से उत्पन्न होने अध्यायोपसंहार वाले अन्यान्य रोग तो असंख्य होते हैं। इति प्रसिद्धा गणिता ये किलोपद्रवा भुवि। वक्तव्य-सम्पूर्ण सृष्टि दो भागों में विभक्त है-1. चेतन असङ्ख्याश्चापरे धातुमूलजीवादिसम्भवाः॥ २०४॥ या सजीव और 2. जड़ या निर्जीव। इनमें चेतन को जंगम इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां और जड़ को स्थावर कहते हैं। इन्हीं से प्राणीमात्र पोषण भी शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे रोगगणना नाम पाते हैं और इन्हीं से रोग भी उत्पन्न होते हैं। सप्तमोऽध्यायः॥7॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का सातवाँ अध्याय समाप्त।।7।। पूर्वखण्ड समाप्त।

  • CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

मध्यमखण्डे

मध्यमखण्डे प्रथमोऽध्यायः स्वरसादिकल्पना


पञ्च-कषाय अथातः स्वरसः कल्कः क्वाथश्च हिमफाण्टकौ। ज्ञेयाः कषायाः पञ्चैते लघवः स्युर्यथोत्तरम्।।1।। पूर्वखण्ड की समाप्ति होने के पश्चात् 'अथ' शब्द रूपी मंगलाचरण करके अब यहाँ से 1. स्वरस, 2. कल्क, 3. क्वाथ, 4. हिम तथा 5. फाण्ट-ये पाँच कषाय कहे जा रहे हैं। ये उत्तरोत्तर लघु होते हैं। वक्तव्य-परिभाषोक्त क्रम छोड़कर उपर्युक्त श्लोक में जो क्रम दिया गया है, वह स्वरस की अपेक्षा कल्क, कल्क की अपेक्षा क्वाथ, क्वाथ की अपेक्षा हिम, हिम की अपेक्षा फाण्ट, लघु या हल्का होता है। यह क्रम इनकी उत्तरोत्तर लघुता का उल्लेख करने के लिए दिया गया है।

स्वरस-निर्माण-विधि अहतात् तत्क्षणात्कृष्टाद् द्रव्यात्क्षुण्णात्समुद्धरेत्। वस्त्रनिष्पीडितो यः स रसः स्वरस उच्यते।।2।। अहत (शीत, आतप तथा कृमि आदि से जो खराब नहीं हो गया हो, वह अदूषित) है तथा तत्काल उखाड़े अथवा काटे हुये (अर्थात् ताजे या हरे) और कूटे-पीसे हुये द्रव्य को कपड़े में निचोड़ने से जो रस निकाला जाता है, वह स्वरस कहा जाता है। वक्तव्य-ताजे गिलोय आदि द्रव्य को पीसकर जो रस निकाला जाता है, वही स्वरस कहा जाता है। पाठभेद 'आहतात्' के अनुसार 'टुकड़े किये गये' यह अर्थ होता है, जो 'क्षुण्णात्' पद से प्राप्त हो जाता है। पाठक ध्यान दें।


स्वरस की दूसरी विधि कुडवं चूर्णितं द्रव्यं क्षिप्तं च द्विगुणे जले। अहोरात्रं स्थितं तस्माद् भवेद् वा रस उत्तमः।।3।। एक कुडव (4 पल=16 कर्ष) भर द्रव्य को कूटकर दुगुने जल में डालकर आठ पहर रखा रहने दें और फिर कपड़े से छान ले। यह भी उत्तम रस होता है। वक्तव्य-यह रस निकालने का दूसरा प्रकार है। 'आठपहरी अजवायन' आदि इसी विधि से बनाये जाते हैं। उक्त विधि में 'कुड़व' परिमाण उपलक्षण मात्र है। अतः आवश्यकतानुसार ही परिमाण की व्यवस्था कर लेनी चाहिये।

स्वरस की तीसरी विधि आदाय शुष्कद्रव्यं वा स्वरसानामसम्भवे। जलेऽष्टगुणिते साध्यं पादशिष्टं च गृह्यते।।4।। यदि उक्त रीतियों से स्वरस बनाना सम्भव न हो तो सूखे द्रव्य लेकर कूटकर आठ गुने जल में डालकर पकाये और चौथाई जल शेष रहने पर छानकर ग्रहण करे। वक्तव्य-यह 'स्वरस' का तीसरा प्रकार है। हरे द्रव्य न मिलने पर उक्त विधि से 'स्वरस' बना लिया जाता है।

स्वरस-पान की मात्रा स्वरसस्य गुरुत्वाच्च पलमर्धं प्रयोजयेत्। निशोषितं चाग्निसिद्धं पलमात्रं रसं पिबेत्।।5।। पहली विधि से बनाया हुआ स्वरस गुरु होता है, अतः आधा पल (दो कर्ष) सेवन करना चाहिये और निशा उषित

86 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे (आठ पहरी) तथा अग्नि द्वारा पकाया हुआ रस एक पल (4 जामुन, आम तथा आँवले के कोमल पत्तों का स्वरस कर्ष) पीना चाहिये। मधु, घी तथा दूध मिलाकर पीने से भीषण अतिसार का नाश प्रक्षेप द्रव्यों का मान होता है। मधु श्वेता गुडं क्षाराञ्जीरकं लवणं तथा। बब्बूलादि स्वरस घृतं तैलं च चूर्णादीन् कोलमात्रान् रसे क्षिपेत्॥6॥ स्थूलबब्बूलिकापत्ररसः पानाद् व्यपोहति। शहद, चीनी, खाँड, गुड़, जौखार आदि तथा खार, जीरा, सर्वातिसारान् स्योनाककुटजत्वग्रसोऽथवा॥12॥ नमक, घी, तेल एवं चूर्ण आदि यदि रस या स्वरस में डालने जंगली बबूल के पत्तों का स्वरस अथवा टेंटू तथा कुरैया हों तो एक कोल (आधा कर्ष) डालने चाहिये। की छाल का स्वरस पीने से यह सभी अतिसारों को नष्ट वक्तव्य-स्वरस में मधु आदि डालने का परिमाण उक्त करता है। श्लोक द्वारा बतलाया गया है। आर्द्रक-स्वरस अमृता-स्वरस आर्द्रकस्वरसः क्षौद्रयुक्तो वृषणवातनुत्। अमृताया रसः क्षौद्रयुक्तः सर्वप्रमेहजित्। श्वासकासारुचीर्हन्ति प्रतिश्यायं व्यपोहति॥13॥ हरिद्राचूर्णयुक्तो वा रसो धात्र्याः समाक्षिकः॥7॥ अदरक का स्वरस मधु मिलाकर पीने से अण्डकोषों की गिलोय का स्वरस मधु मिलाकर अथवा आँवले का रस वायु को, श्वास, कास, अरुचि तथा प्रतिश्याय को नष्ट करता है। हल्दी का चूर्ण तथा मधु मिलाकर पिया जाये तो सब प्रमेहों बीजपूर-स्वरस को नष्ट करता है। बीजपूररसः पानान्मधुक्षारयुतो जयेत्। वासक-स्वरस पार्श्वहृद्वस्तिशूलानि कोष्ठवातं च दारुणम्॥14॥ वासकस्वरसः पेयो मधुना रक्तपित्तजित्। बिजौरा नींबू का रस मधु तथा क्षार (जौखार आदि कोई ज्वरकासक्षयहरः कामलाश्लेष्मपित्तहा॥8॥ भी क्षार) मिलाकर पीने से यह पसली, हृदय तथा मूत्राशय अडूसे का रस मधु मिलाकर पीना चाहिये। इससे रक्तपित्त, के शूल को तथा उदर की भीषण वायु को जीतता है। ज्वर, कास, क्षय, कामला, कफ तथा पित्त नष्ट होते हैं। वक्तव्य-इस योग में बिजौरा आदि किसी भी नींबू के त्रिफलादि का स्वरस रस का प्रयोग किया जा सकता है। नींबू के रस में क्षार डालते त्रिफलाया रसः क्षौद्रयुक्तो दार्वीरसोऽथवा। ही गैस उत्पन्न होने लगती है, इस गैस के साथ उसे पी जाना निम्बस्य वा गुडूच्या वा पीतो जयति कामलाम्॥9॥ चाहिये। इसका स्वाद 'मीठा सोडा' जैसा होता है। हमारा त्रिफला का रस अथवा दारुहल्दी का रस अथवा नीम विचार है कि आजकल जो 'सोडावाटर' बन रहा है, वह का रस अथवा गिलोय का रस मधु मिलाकर पीने से कामला उक्त योग का ही सुधरा हुआ रूप है। देखें-सु० उ० अ० को जीतता है। 5.22। तुलसी आदि का स्वरस शतावरी आदि का स्वरस पीतो मरिचचूर्णेन तुलसीपत्रजो रसः। शतावर्याश्च मधुना पित्तशूलहरो रसः। द्रोणपुष्पीरसो वापि निहन्ति विषमज्वरान्॥10॥ निशाचूर्णयुतः कन्यारसः प्लीहापचीहरः॥15॥ तुलसी के पत्तों का रस अथवा गूमा का रस मरिच के शतावर का रस शहद मिलाकर पीने से यह पित्त के शूल चूर्ण को मिलाकर पीने से विषमज्वरों (मलेरिया आदि) को को हरता है और घीकुआर का रस हल्दी के चूर्ण के साथ नष्ट करता है। पीने से प्लीहावृद्धि तथा गण्डमाला का नाश होता है। जम्ब्वादि पत्र-स्वरस अलम्बुषादि स्वरस जम्ब्वाम्रामलकीनां च पल्लवोत्थो रसो जयेत्। अलम्बुषायाः स्वरसः पीतो द्विपलमात्रया। मध्वाज्यक्षीरसंयुक्तो रक्तातीसारमुल्बणम्॥11॥ अपचीगण्डमालानां कामलायाश्च नाशनः॥16॥

प्रथमोऽध्यायः ] स्वरसादिकल्पना 87

प्रथमोऽध्यायः ] स्वरसादिकल्पना 87 गोरखमुंडी का रस 2 पल (8 तोला) भर पीने से अपची, गण्डमाला तथा कामला को नष्ट करता है। मुण्डी-स्वरस रसो मुण्ड्याः स कोष्णो वा मरीचैरवधूलितः। जयेत् सप्तदिनाभ्यासात् सूर्य्यावर्त्तार्धभेदकौ ।। 17 ।। गोरखमुंडी का कुछ गर्म किया हुआ मरिच के चूर्ण से मिश्रित स्वरस सात दिन पीने से सूर्यावर्त्त तथा अर्द्धावभेदक (आधाशीशी) नामक शिरोरोगों को नष्ट करता है। ब्राह्मी आदि का स्वरस ब्राह्मीकूष्माण्डषड्ग्रन्थाशङ्खिनीस्वरसाः पृथक्। मधुकुष्ठयुताः पीताः सर्वोन्मादापहारिणः।। 18 ।। पृथक्-पृथक् ब्राह्मी, कोहड़ा (पेठा), वच तथा शङ्खपुष्पी (शंखाहुली) के स्वरस शहद तथा कूठ का चूर्ण मिलाकर पीने से सभी प्रकार के उन्माद रोग नष्ट होते हैं। सोमरोग-चिकित्सा (कदलीनां फलं पक्वं धात्री-फल-रसं तथा। शर्करासहितं खादेत् सोमधारणमुत्तमम् ।। 19 ।।) केले का पका फल और आँवले का स्वरस चीनी मिलाकर खाने से 'सोमरोग' दूर हो जाता है। उदर्द-चिकित्सा (गैरिकं कोलमात्रं च सप्तभिर्मरिचैर्युतम्। मधुना कर्षमात्रेण पयः पीतमुदर्दनुत् ।। 20 ।।) गेरू आधा तोला, कालीमिर्च सात दाना, मधु एक तोला, जल आधा पाव पीने से 'उदर्द' अर्थात् जुलपित्ती या रक्तपित्ती दूर होती है। उष्णोपद्रव-चिकित्सा (रसः पलाण्डोः पानार्थं स्विन्न आम्ररसस्तथा। प्रदेयो लवणोपेतः उष्णोपद्रवशान्तये ।। 21 ।। अम्लिकाद्यम्लद्रव्याणां रसो वै सितया युतः। पेयो मद्यःशरीरे च प्रलापोष्मज्वरे हितम् ।। 22 ।।) उष्णोपद्रव (अत्यन्त गर्म वायु, लू या धूप के लगने) से उत्पन्न होने वाले उपद्रवों की शान्ति के लिए रोगी को पीने के लिए प्याज का रस तथा अग्नि में भूने हुये कच्चे आम का रस (पन्ना) उचित मात्रा में नमक मिलाकर देना चाहिये और इमली आदि खट्टे द्रव्यों का रस चीनी मिलाकर पीने को दें तथा शरीर पर मले। इससे भी प्रलाप, दाह तथा ज्वर शान्त हो जाते हैं। वक्तव्य-विशेष जानने के लिए सु० सू० अ० 12.38 देखें। कूष्माण्ड-स्वरस कूष्माण्डकस्य स्वरसो गुडेन सह योजितः। दुष्टकोद्रवसञ्जातमदं पानाद् व्यपोहति ।। 23 ।। कोहड़े का स्वरस गुड़ मिलाकर पीने से कोदों के मद (नशा) को नष्ट करता है। गाङ्गेरुकी-स्वरस खड्गादिच्छिन्नगात्रस्य तत्काल पूरितो व्रणः। गाङ्गेरुकीमूलरसैर्जायते गतवेदनः ।। 24 ।। तलवार आदि के लगने से उत्पन्न शरीर के घाव में तत्काल गांगेरेन की जड़ के रस को भरने पर वह पीड़ा रहित हो जाता है। वक्तव्य-यहाँ तक स्वरसों के कुछ उदाहरण दिये गये हैं और अन्तिम पाठ से यह भी बतला दिया कि स्वरसों का प्रयोग केवल पीने के लिए ही नहीं होता, अपितु वे लगाए भी जाते हैं। पुटपाक-विधि पुटपाकस्य कल्कस्य स्वरसो गृह्यते यतः। अतस्तु पुटपाकानां युक्तिरत्रोच्यते मया।। 25 ।। पुटपाकस्य मात्रेयं लेपस्याङ्गारवर्णता। लेपं च द्व्यङ्गुलं स्थूलं कुर्याद्वाङ्गुष्ठमात्रकम् ।। 26 ।। काश्मरीवटजम्ब्वादिपत्रैर्वेष्टनमुत्तमम् । पलमात्रं रसो ग्राह्यः कर्षमात्रं मधु क्षिपेत् ।। 27 ।। कल्कचूर्णद्रवाद्यास्तु देयाः स्वरसवद् बुधैः। पुट (सम्पूट) में पकाये हुये कल्क (चटनी के समान पीसे हुये द्रव्य) का भी स्वरस ही ग्रहण किया जाता है। इसलिये इस अध्याय में पुटपाकों की भी विधि लिखी जाती है। उपयोगी द्रव्य का कल्क बनाकर गंभार, बरगद तथा जामुन आदि के पत्तों से भली प्रकार लपेट कर और ऊपर से सनी हुई चिकनी मिट्टी का दो या डेढ़ अंगुल मोटा लेप चढ़ाकर सुखा लें, फिर गोहरी की आग में पकाये। जब लेप का वर्ण लाल हो जाये तो निकाल लेना चाहिये। कुछ ठंडा होने पर संभाल कर लेप और पत्ते हटाकर कल्क निकाल कर उसे निचोड़ कर रस निकाल लेना चाहिये और कल्क, चूर्ण तथा द्रव (दूध तथा गोमूत्र आदि) आदि पदार्थ स्वरस के समान (इसी अध्याय का श्लोक 8 देखें) डालने चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

88 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे

88 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे कुटज पुटपाक तत्कालाकृष्टकुटजत्वचं तण्डुलवारिणा ।। २८ ।। पिष्टां चतुष्पलमितां जम्बूपल्लववेष्टिताम्। सूत्रेण बद्धां गोधूमपिष्टेन परिवेष्टिताम् ।। २९ ।। लिप्तां च घनपङ्केन गोमयैर्वह्निना दहेत्। अङ्गारवर्णां च मृदं दृष्ट्वा वह्नेः समुद्धरेत् ।। ३० ।। ततो रसं गृहीत्वा च शीतं क्षौद्रयुतं पिबेत्। जयेत् सर्वानतीसारान् दुस्तरान् सुचिरोत्थितान् ।। ३१ ।। तत्काल उतारी हुई कुरैया की सोलह तोला छाल को चावलों के धोवन से पीसकर, जामुन के पत्तों से लपेट कर, तागों से बाँधकर, गेहूँ के गूँथे आटे से लेप करके उस पर चिकनी मिट्टी का लेप चढ़ा दें और गोहरी (कण्डे) की आग में पकायें, ऊपर के लेप को लाल वर्ण का देखकर निकाल लें। तदनन्तर कुछ शीत होने पर औषध को निकाल कर उससे रस निचोड़ लें। यह रस जब सर्वथा शीत हो जाये तो मधु मिलाकर पीना चाहिये। यह पुराने भयंकर अतिसारों को जीतता है। चावल का धोवन बनाने की विधि कण्डितं तण्डुलपलं जलेऽष्टगुणिते क्षिपेत्। भावयित्वा जलं ग्राह्यं देयं सर्वत्र कर्मसु ।। ३२ ।। कण्डित (छड़े हुये या तुष उतारे हुये) चार तोला चावलों को आठ गुने जल में डाल दें, कुछ समय (एक-दो घण्टा) के पश्चात् जल निकाल कर आवश्यक कार्यों में प्रयुक्त करें। वक्तव्य- इसी को 'चावलों का पानी' कहा जाता है। अरलूत्वक् पुटपाक अरलूत्वक्कृतश्चैव पुटपाकोऽग्निदीपनः। मधुमोचरसाभ्यां च युक्तः सर्वातिसारजित् ।। ३३ ।। टैंटू की छाल का उक्त रीति से बनाया हुआ पुटपाक रस अग्नि को दीप्त करता है और मधु तथा मोचरस से युक्त सभी अतिसारों को जीतता है। तित्तिर पुटपाक न्यग्रोधादेश्च कल्केन पूरयेद् गौरतित्तिरेः। निरन्त्रमुदरं सम्यक्पुटपाकेन तत्पचेत् ।। ३४ ।। तत्कल्कस्य रसः क्षौद्रयुक्तः सर्वातिसारनुत्। तीतर का पेट चीर कर अँतड़ियाँ निकाल दें और न्यग्रोधादिगण (शा० म० खं० अ० २) के कल्क से उसके (पेट) को भरकर पुटपाक-विधि से उसे पकायें। तत्पश्चात् उस कल्क का रस मधु मिलाकर पीने के लिए दें। यह सभी अतिसारों को नष्ट करता है। दाड़िम पुटपाक पुटपाकेन विपचेत् सुपक्वं दाडिमीफलम् ।। ३५ ।। तद्रसो मधुसंयुक्तः सर्वातीसारनाशनः। अनार के फल को पुटपाक-विधि से पका कर इसका रस शहद मिलाकर देने से यह सभी अतिसारों को नष्ट करता है। बीजपूरादि पुटपाक बीजपूराम्रजम्बूनां पल्लवानि जटाः पृथक् ।। ३६ ।। विपचेत् पुटपाकेन क्षौद्रयुक्तश्च तद्रसः। छर्दि निवारयेद्घोराम् सर्वदोषसमुद्भवाम् ।। ३७ ।। बिजौरानीबू, आम एवं जामुन के कोमल पत्तों अथवा जड़ों की छाल को पुटपाक के विधान से पकाये। मधु से युक्त इनका रस सन्निपात से उत्पन्न भीषण कै (उलटी) को रोक देता है। वासा पुटपाक पिष्टानां वृषपत्राणां पुटपाकरसो हिमः। मधुयुक्तो जयेद् रक्तपित्तकासज्वरक्षयान् ।। ३८ ।। अडूसा के पत्तों को पीसकर पुटपाक की विधि से निकाला हुआ रस शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, खाँसी, ज्वर एवं क्षय को जीतता है। कण्टकारी पुटपाक पचेत् क्षुद्रां सपञ्चाङ्गां पुटपाकेन तद्रसः। पिपलीचूर्णसंयुक्तः कासश्वासकफापहः ।। ३९ ।। भटकटैया (कण्टकारी) के पञ्चाङ्ग अर्थात् जड़, फूल, पत्ते, फल एवं छाल को लेकर पुटपाक की विधि से पकाये। इसका रस पीपल के चूर्ण से युक्त पीने से खाँसी, दमा एवं कफ को नष्ट करता है। बिभीतक पुटपाक बिभीतकफलं किञ्चिद् घृतेनाभ्यज्य लेपयेत्। गोधूमपिष्टेनाङ्गारैर्विपचेत् पुटपाकवत् ।। ४० ।। ततः पक्वं समुद्धृत्य त्वचं तस्य मुखे क्षिपेत्। कासश्वासप्रतिश्यायस्वरभङ्गाञ्जयेत् ततः ।। ४१ ।। बहेड़ा के फल पर थोड़ा घी चुपड़ कर गेहूँ के गूँथे आटे का लेप कर दें और पुटपाक के समान अंगारों में पकाये। जब आटा पक जाये तो उसके छिलके को मुख में डालकर चूसे तो

प्रथमोऽध्यायः] स्वरसादिकल्पना 89

प्रथमोऽध्यायः] स्वरसादिकल्पना 89 यह खाँसी, दमा, प्रतिश्याय एवं स्वरभेद (गला बैठना) को जीतता है। वक्तव्य-इस पर पत्ते लपेटने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसा कि अन्य पुटपाकों में कहा गया है। शुण्ठी पुटपाक चूर्णं किञ्चिद् घृताभ्यक्तं शुण्ठ्या एरण्डजैर्दलैः। वेष्टितं पुटपाकेन विपचेन्मन्दवह्निना ।। 42 ।। तत उद्धृत्य तच्चूर्णं ग्राह्यं प्रातः सितान्वितम्। तेन यान्ति शमं पीडा आमातीसारसम्भवाः ।। 43 ।। सोंठ के चूर्ण को थोड़े घी में मिलाकर और एरण्ड के पत्तों से लपेट कर पुटपाक की विधि से अत्यन्त मन्द आग में पकाये, तदनन्तर उसे निकाल कर तथा समभाग चीनी मिलाकर प्रातःकाल सेवन करे, इससे आमातिसार की पीड़ा शान्त हो जाती है। वक्तव्य-द्रव्य के सूखा होने के कारण तथा उसमें भी घी जैसी ज्वलनशील वस्तु होने के कारण 'मन्दाग्नि' में देने की सम्मति दी गयी है। दूसरा शुण्ठी पुटपाक शुण्ठीकल्कं विनिक्षिप्य रसैरेरण्डमूलजैः। विपचेत् पुटपाकेन तद्रसः क्षौद्रसंयुतः ।। 44 ।। आमवातसमुद्भूतां पीडां जयति दुस्तराम्। एरण्ड की जड़ के रस से सोंठ का कल्क (चटनी) बनाकर और एरण्ड के ही पत्तों में डालकर (लपेट) पुटपाक की विधि से पकाये। इसका रस शहद मिलाकर पीने से दुःसाध्य आमवात अर्थात् गठिये की पीड़ा को जीतता है। सूरण पुटपाक सौरणं कन्दमादाय पुटपाकेन पाचयेत् ।। 45 ।। सतैललवणस्तस्य रसश्चार्शोविकारनुत्। सूरण (जिमीकन्द) के कन्द को लेकर पुटपाक की विधि से पकाये। फिर उसके रस को निकाल कर तिल-तैल तथा नमक मिलाकर पीये। यह बवासीर को नष्ट करता है। मृगशृंग पुटपाक शरावसम्पुटे दग्धं शृङ्गं हरिणजं पिबेत् ।। 46 ।। गव्येन सर्पिषा युक्तं हृच्छूलं नाशयेद् ध्रुवम्। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे स्वरसादिकल्पना नाम प्रथमोऽध्यायः ।। 1 ।। हरिण के सींग को टुकड़े कर दो सिकोरों में बन्द करके जला दें, फिर गाय के घी के साथ मिलाकर खायें, तो इससे हृदय का शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। वक्तव्य-आजकल प्रायः बारहसिंगा का सींग उपयोग में लाया जाता है और इसे 'शृंगराज' कहा जाता है। इसकी भस्म एक पुट में ही उत्तम नहीं बनती, अतः कई पुटें दी जाती हैं। जब तक सफेद न हो जाये तब तक घीकुआर के रस अथवा आक के दूध में पीसकर पुटें दी जाती हैं। इस प्रकार यह और भी उत्तम हो जाता है। यह भस्म कास, श्वास, ज्वर, आमवात आदि रोगों में बहुत लाभ करती है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।

क्वाथादिकल्पना

यहाँ पृष्ठ पर दी गई सामग्री का अक्षरशः लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

द्वितीयोऽध्यायः क्वाथादिकल्पना


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

क्वाथ बनाने की विधि पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत्। मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ॥१॥ तज्जलं पाययेद्धीमान् कोष्णं मृद्वग्निसधितम्। श्रुतः क्वाथः कषायश्च निर्यूहः स निगद्यते ॥२॥ जौकुट किये (कुछ-कुछ कुटे या दर्दरा चूर्ण किये) हुये एक पल (4 तोला) द्रव्य (औषधि) में सोलह गुना पानी डालकर मन्द-मन्द अग्नि से काढ़ा करें, आठवाँ भाग अवशिष्ट (शेष) रहने पर उतार लें, तत्पश्चात् बुद्धिमान् चिकित्सक इसे छानकर कुछ-कुछ उष्ण क्वाथ को पिलाये। इस परिपक्व जल का नाम श्रुत, क्वाथ, कषाय एवं निर्यूह है। वक्तव्य—'धीमान्' शब्द का प्रयोग करके आचार्य शार्ङ्गधर ने सूचित किया है कि औषध एवं जल के परिमाण की व्यवस्था विद्वान् चिकित्सक स्वयं करे। क्वाथ्य द्रव्य जितने जल में भली प्रकार कोमल या मृदु हो सकें उतना जल देना चाहिये। क्वाथ करने से औषधियों के घुलनशील अंश जल में घुल जाते हैं, जिससे काढ़ा कुछ गाढ़ा हो जाता है और क्वाथ को छानते समय भली प्रकार मलकर छान लेना चाहिये, जिससे उसका सार भाग पूर्ण रूप से जल में घुलकर आ सके।

क्वाथ-पान की विधि आहाररसपाके च सञ्जाते द्विपलोन्मितम्। वृद्धवैद्योपदेशेन पिबेत् क्वाथं सुपाचितम् ॥३॥ आहार के रस का भली प्रकार पाक हो जाने पर अनुभवी वैद्य की सम्मति के अनुसार यथाविधि पकाया हुआ दो पल (8 तोला) क्वाथ पीना चाहिये। **वक्तव्य—**यहाँ भी 'वृद्धवैद्य' को ही उत्तरदायी ठहराया गया है, अर्थात् कब और कितना क्वाथ किसको पिलाना उचित है, इसका तात्कालिक निर्णय वैद्य स्वयं करें।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

क्वाथ में मधु आदि का परिमाण क्वाथे क्षिपेत् सितामंशैश्चतुर्थाष्टमषोडशैः। वातपित्तकफातङ्के विपरीतं मधुस्मृतम् ॥४॥ काढ़े में शर्करा (खाँड़) वातरोग में चौथाई भाग, पित्तरोग में आठवाँ भाग तथा कफरोग में सोलहवाँ भाग डालना चाहिये और मधु (शहद) इसके विपरीत अर्थात् वातरोग में सोलहवाँ भाग, पित्त में आठवाँ भाग और कफ में चौथाई भाग डालना चाहिये।

क्वाथ में जीरा आदि का परिमाण जीरकं गुग्गुलं क्षारं लवणं च शिलाजतु। हिङ्गु त्रिकटुकं चैव क्वाथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ॥५॥ काढ़े में जीरा, गुगुल, क्षार, नमक, शिलाजीत, हींग एवं त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) एक-एक शाण (4-4 आना भर) डालना चाहिये। **वक्तव्य—**जीरा और हींग को थोड़े घी में भूनकर तथा चूर्ण बनाकर, गुगुल तथा शिलाजीत को शुद्ध कर एवं क्षार, नमक तथा त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) को चूर्ण बनाकर क्वाथ पीते समय डालना चाहिये।

क्वाथ में दूध आदि का परिमाण क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद् द्रवं तथा। कल्कं चूर्णादिकं क्वाथे निक्षिपेत् कर्षसम्मितम् ॥६॥ क्वाथ में दूध, घी, गुड़, तैल, मूत्र (गोमूत्र आदि) अन्यान्य द्रव (नीबू आदि का रस), कल्क तथा चूर्ण आदि एक कर्ष (तोला) डालना चाहिये।

क्वाथ पकाने को विधि (अविधानमुखे पात्रे जलं दुर्जरतां व्रजेत्। तस्मादावरणं त्यक्त्वा क्वाथादींश्च विपाचयेत् ॥७॥) पात्र का मुँह ढँक देने से क्वाथ दुर्जर (दुःख से पचने...

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द्वितीयाऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 91 [बायाँ स्तम्भ] वाला) हो जाता है, इसलिये ढँकना न देकर ही क्वाथ को पकाना चाहिये। वक्तव्य- सुगन्धित औषधियों का क्वाथ तो ढँककर एवं उनकी गन्ध की रक्षा करते हुये थोड़ी ही देर पकाना चाहिये अथवा उक्त औषधों को प्रक्षेप के रूप में ही डालना चाहिये, अन्यथा उनका तैलांश उड़ जायेगा, जिसकी सत्ता बहुत आवश्यक है। अतएव सौंफ, अजवायन आदि के अर्क निकालते समय यन्त्र की पूर्ण रूप से रक्षा की जाती है। गुडूच्यादिगण क्वाथ गुडूचीधान्यकारिष्टरक्तचन्दनपद्मकैः । गुडूच्यादिगणक्वाथः सर्वज्वरहरः स्मृतः ॥ 8 ॥ दीपनो दाहहृल्लासतृष्णाच्छर्द्यरुचीर्जयेत्। गिलोय, धनियाँ, नीम की छाल, लालचन्दन एवं पद्माकाठ यह 'गुडूच्यादि गण' कहलाता है। इसका काढ़ा सभी ज्वरों को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, दाह, जी मिचलाना, प्यास, कै तथा अरुचि को नष्ट करता है। वक्तव्य- यह 'गुडूच्यादि गण' सु० सू० अ० 38 का है। यह शीतज्वर या मलेरिया की परमौषध है। नागरादि क्वाथ- सोंठ, देवदारु का चूर्ण, धनियाँ, बनभण्टा (बड़ी भटकटैया) तथा कण्टकारी का पाचक क्वाथ ज्वर रोगियों को पहले (आमज्वर में) देना चाहिये। यह ज्वरनाशक है। आमज्वरों में सामान्य क्वाथ देने का निषेध है, किन्तु 'पाचन' क्वाथ दिया जा सकता है। क्षुद्रादि क्वाथ- भटकटैया, चिरायता, सोंठ, गुरुच तथा पोहकरमूल का काढ़ा पीने से आठ प्रकार के ज्वरों की शान्ति होती है। उक्त दोनों क्वाथ ज्वरशामक हैं। गुडूच्यादि क्वाथ गुडूचीपिप्पलीमूलनागरैः पाचनं स्मृतम् ॥ 9 ॥ दद्याद् वातज्वरे पूर्णलिङ्गे सप्तमवासरे। गिलोय, पिप्पलामूल तथा सोंठ का काढ़ा भी 'पाचन' कहा जाता है। यह सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त वातज्वर में सातवें दिन देना चाहिये। शालपर्ण्यादि क्वाथ शालिपर्णी बला द्राक्षा गुडूची सारिवा तथा ।। 10 ।। आसां क्वाथं पिबेत् कोष्णं तीव्रवातज्वरच्छिदम्। शालपर्णी (सरिवन), बरियारा, मुनक्का, गिलोय तथा [दायाँ स्तम्भ] सारिवा-इनका काढ़ा कुछ गुनगुना पीना चाहिये। इससे भीषण वातज्वर नष्ट हो जाता है। काश्मर्यादि क्वाथ काश्मरीसारिवाद्वाक्षात्रायमाणाऽमृताभवः ।। 11 ।। कषायः सगुडः पीतो वातज्वरविनाशनः। गम्भार का फल अथवा छाल, सारिवा, मुनक्का, त्रायमाणा तथा गिलोय का काढ़ा गुड़ मिलाकर पीने से वातज्वर को नष्ट करता है। वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ वातज्वर शामक हैं। कट्फलादि क्वाथ कट्फलेन्द्रयवापाठातिक्तामुस्तैः शृतं जलम् ।। 12 ।। पाचनं दशमेऽह्नि स्यात् तीव्रे पित्तज्वरे नृणाम्। कायफल की छाल, इन्द्रजौ, पाठा, कुटकी तथा नागरमोथा का काढ़ा 'पाचन' कहलाता है। यह भयानक पित्तज्वर में दसवें दिन देना चाहिये। पर्पटादि क्वाथ पर्पटो वासकतिक्ता कैरातो धन्वयासकः ।। 13 ।। प्रियङ्गुश्च कृतः क्वाथ एषां शर्करया युतः। पिपासादाहपित्तास्रयुतं पित्तज्वरं जयेत् ।। 14 ।। पित्तपापड़ा, अडूसा के पत्ते, कुटकी, चिरायता, धमासा और फूलप्रियंगु, इनका काढ़ा खाँड़ या मिश्री मिलाकर पीने से प्यास, दाह तथा रक्तपित्त युक्त पित्तज्वर को जीतता है। द्राक्षादि क्वाथ द्राक्षा हरीतकी मुस्तं कटुकी कृतमालकः । पर्पटश्च कृतः क्वाथ एषां पित्तज्वरापहः ।। 15 ।। तृण्मूर्च्छादाहपित्तासृक्शमनो भेदनः स्मृतः । मुनक्का, बड़ी हरड़, नागरमोथा, कुटकी, अमलतास की गुदी तथा पित्तपापड़ा इनका काढ़ा पित्तज्वर को नष्ट करता है। प्यास, मूर्च्छा, दाह तथा रक्तपित्त को शान्त करता है और यह दस्तावर है। पर्पटादि क्वाथ (एकः पर्पटकः श्रेष्ठः पित्तज्वरविनाशनः ।। 16 ।। किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोशीरबालकैः ।) अकेले पित्तपापड़ा का काढ़ा ही पित्तज्वर को नष्ट कर देता है और यदि इसमें सफेद चन्दन, खस तथा नेत्रबाला मिला दिया जाये तो फिर क्या कहना, अर्थात् तब तो यह क्वाथ बहुत ही लाभ करता है।

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92 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे वक्तव्य- उक्त तीनों क्वाथ पित्तज्वरों का शमन करते हैं। बीजपूरादि क्वाथ बीजपूरशिफापथ्यानागरग्रन्थिकैः शृतम्।।17।। सक्षारं पाचनं श्लेष्मज्वरे द्वादशवासरे। बिजौरा नींबू की जड़, बड़ी हरड़, सोंठ तथा पिप्पलामूल काढ़ा, जौखार मिलाकर कफज्वर में बारहवें दिन पीना चाहिये। यह क्वाथ भी 'पाचन' है। वक्तव्य- प्रायः आम के दोष से ('दोषा हि आमाशयाश्रयाः बहिर्निरास्य कोष्ठाग्निं ज्वरदाः स्युः') ज्वर उत्पन्न होते हैं, अतः उनमें लंघन ('ज्वरादौ लङ्घनं प्रोक्तम्') किया जाता है। यद्यपि वह आवश्यकतानुसार (जब तक आम ज्वर के लक्षण विद्यमान रहें) किया जाता है, तथापि-‘वातिकः सप्तरात्रेण दशरात्रेण पैत्तिकः। श्लैष्मिको द्वादशाहेन ज्वरः पाकमुपैति हि।।'-के अनुसार वातज्वर में सातवें दिन, पित्तज्वर में दसवें दिन तथा कफज्वर में बारहवें दिन दोष पक जाने पर क्वाथ देने का विधान किया गया है। इस बीच प्रतिदिन वैद्य रोगी को शिक्षा दें कि तुम स्नान, स्नेहपान, दस्त की दवा, दिन में सोना, मैथुन, व्यायाम, शीतल जल, क्रोध, बाहरी हवा का सेवन मत करना तथा गर्म जल अथवा गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल पीना इत्यादि। औषध में मृत्युञ्जय आदि रस एवं स्वरस तथा षडङ्गपानीय आदि दे सकते हैं और पाचन क्वाथ देने के लिए जो दिन निश्चित किये हैं, यदि उक्त दिनों में भी दोष पूर्णरूप से पचे न हों तो पाचन क्वाथ देना चाहिये। यदि लंघनादि से ही दोषपाक हो जाये तो शमन अर्थात् ज्वरनाशक औषधि देनी चाहिये। भूनिम्बादि क्वाथ भूनिम्बनिम्बपिप्पल्यः शठी शुण्ठी शतावरी।।18।। गुडूची बृहती चेति क्वाथो हन्यात् कफज्वरम्। चिरायता, नीम की छाल, पीपल, कचूर, सोंठ, शतावर, गिलोय और बनभण्टा, इनका काढ़ा कफज्वर को नष्ट करता है। पटोलादि क्वाथ पटोलत्रिफलातिक्ताशठीवासामृताभवः ।।19।। क्वाथो मधुयुतः पीतो हन्यात् कफकृतं ज्वरम्। परवल की पत्ती, त्रिफला, कुटकी, कचूर, अडूसा की पत्ती तथा गिलोय का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से कफज्वर को नष्ट करता है। वक्तव्य- उक्त दोनों क्वाथ कफदोषशामक हैं। आमदोष को पकाने वाला काढ़ा 'पाचन' तथा ज्वरनाशक काढ़ा 'शमन' कहलाता है। पञ्चभद्र क्वाथ पर्पटाब्दामृताविश्वकैरातैः साधितं जलम्।।20।। पञ्चभद्रमिदं ज्ञेयं वातपित्तज्वरापहम्। पित्तपापड़ा, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ तथा चिरायता- इनका यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ 'पञ्चभद्र' नाम से प्रसिद्ध है। यह वातपित्त (द्वन्द्वज) ज्वर को नष्ट करता है। कण्टकार्यादि क्वाथ क्षुद्राशुण्ठीगुडूचीनां कषायः पौष्करस्य च।।21।। कफवाताधिके पेयो ज्वरे वापि त्रिदोषजे। कासश्वासारुचिकरे पार्श्वशूलविधायिनि।।22।। कण्टकारी, सोंठ, गिलोय तथा पोहकरमूल का काढ़ा कफ-वातज्वर तथा त्रिदोषज्वर में पीना चाहिये और यह काढ़ा कास, श्वास तथा अरुचि को हरता है तथा पसली की पीड़ा (निमोनिया) को नष्ट करता है। आरग्वधादि क्वाथ आरग्वधकणामूलमुस्तातिक्ताभयाकृतः । क्वाथः शमयति क्षिप्रं ज्वरं वातकफोद्भवम्।।23।। आमशूलप्रशमनो भेदी दीपनपाचनः। अमलतास की गुद्दी, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी तथा बड़ी हरड़ का काढ़ा वात-कफ-ज्वर को तथा आमशूल को शीघ्र ही शान्त करता है, यह दस्तावर भी है, अग्नि को बढ़ाता है आम दोष को पकाता है। अमृताष्टक क्वाथ अमृतारिष्टकटुकामुस्तेन्द्रयवनागरैः ।।24।। पटोलचन्दनाभ्यां च पिप्पलीचूर्णयुक् शृतम्। अमृताष्टकमेतच्च पित्तश्लेष्मज्वरापहम्।।25।। छर्द्यरोचकहल्लासदाहतृष्णाविनाशनम् । गिलोय, नीम की छाल, कुटकी, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ, परवल की पत्ती तथा लालचन्दन का काढ़ा पीपल का चूर्ण डालकर पीने से पित्त-कफ-ज्वर को नष्ट करता है, साथ ही कै, अरुचि, जी मिचलाना, दाह तथा प्यास का भी नाश होता है। इसका नाम 'अमृताष्टक' है। पटोलादिगण क्वाथ (पटोलं चन्दनं मूर्वात्तिक्तापांठामृतागणः।।26।। पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्द्दिदाहकण्डूविषापहः ।)

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 93


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### [बायाँ स्तम्भ]

परवल की पत्ती, लालचन्दन, मरोड़फली, कुटकी, पाठा तथा गिलोय का काढ़ा पित्तकफज्वर, कै, दाह, खुजली तथा विष को नष्ट करता है। इसका नाम 'पटोलादिगण' है।
**वक्तव्य**-विशेष देखें-सु० सू० अ० ३८।

#### कण्टकार्यादि क्वाथ
कण्टकारीद्वयं शुण्ठी धान्यकं सुरदारु च ॥ २७ ॥
एभिः शृतं पाचनं स्यात् सर्वज्वरविनाशनम्।
कण्टकारी, बनभंटा, सोंठ, धनियां तथा देवदारु का काढ़ा सभी ज्वरों को नष्ट करता है।

#### दशमूल क्वाथ
शालिपर्णीपृश्निपर्णीबृहतीद्वयगोक्षुरैः ॥ २८ ॥
बिल्वाग्निमन्थस्योनाककाश्मरीपाटलायुतैः ।
दशमूलमितिख्यातं क्वथितं तज्जलं पिबेत् ॥ २९ ॥
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं वातश्लेष्मज्वरापहम्।
सन्निपातज्वरहरं सूतिकादोषनाशनम् ॥ ३० ॥
शोषशैत्यभ्रमस्वेदकासश्वासविकारनुत् ।
हृत्कण्ठग्रहपार्श्वार्तितन्द्रामस्तकशूलहृत् ॥ ३१ ॥
शालपर्णी, पिठवन, कंटकारी, बनभण्टा, गोखरू, बेल का गूदी, अरणी की छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भार की छाल तथा पाढल की छाल-ये सब द्रव्य 'दशमूल' नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह वातकफज्वर, सन्निपातज्वर, प्रसूति रोग, मुखशोष (मुख का सूखना), शोथशैत्य (हाथ-पाँव या सम्पूर्ण शरीर का ठण्डा होना), भ्रम (चक्कर आना), स्वेद (ज्वर रहने पर भी अधिक पसीना आना), कास, श्वास आदि विकारों को नष्ट करता है और हृदय तथा कण्ठ की रुकावट (हृदय की गति अथवा साँस जब रुकने लगती है) में यह काढ़ा देना चाहिये और यह पसली की पीड़ा, तन्द्रा (उँघाई) तथा सिर की पीड़ा को नष्ट करता है।
**वक्तव्य**-सन्निपातज्वर में उक्त लक्षणों को देखकर ही इस क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये।

#### अभयादि क्वाथ
अभयामुस्तधान्याकरक्तचन्दनपद्मकैः ।
वासकेन्द्रयवोशीरगुडूचीकृतमालकैः ॥ ३२ ॥
पाठानागरतिक्ताभिः पिप्पलीचूर्णयुक्तशृतम्।
पिबेत् त्रिदोषज्वरजित् पिपासाकासदाहनुत् ॥ ३३ ॥
प्रलापश्वासतन्द्राघ्नं दीपनं पाचनं परम्।
विण्मूत्रानिलविष्टम्भवमिशोषारुचिं जयेत् ॥ ३४ ॥

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### [दायाँ स्तम्भ]

बड़ी हरड़ का छिलका, नागरमोथा, धनियां, लालचन्दन, पद्मकाठ, अडूसा की पत्ती, इन्द्रजौ, खस, गिलोय, अमलतास की गूदी, पाठा, सोंठ तथा कुटकी का काढ़ा, पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह सन्निपात ज्वर को जीतता है। प्यास, खाँसी और दाह को नष्ट करता है, प्रलाप (बड़बड़ाना), श्वास एवं तन्द्रा का नाशक है। अत्यन्त दीपन (अग्निवर्द्धक) तथा पाचन है और पुरीष, मूत्र तथा वायु की रुकावट को दूर करता है। कै, मुखशोष तथा अरुचि को जीतता है।
**वक्तव्य**-यह क्वाथ भी सन्निपातज्वर को शान्त करने के लिए उत्तम है।

#### पिप्पल्यादि क्वाथ
(पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।
वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः ॥ ३५ ॥
किराततिक्तकं मूर्वा सर्षपा मरिचानि च।
कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् ॥ ३६ ॥
अर्कमूलं बृहतिंही श्रेयसी सदुरालभा।
दीप्यकं चाजमोदा च शुकनासादिहिङ्गुभिः ॥ ३७ ॥
एतानि समभागानि गणोऽष्टविंशको मतः।
कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्वरापहम् ॥ ३८ ॥
हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रबलं कफम्।
प्रलापं चातिनिद्रां च रोमहर्षारुची तथा ॥ ३९ ॥
महावातेऽपतन्त्रे च सर्वगात्रे च शून्यताम्।
अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदश ॥ ४० ॥)
पीपल, पिप्पलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, बच, अतीस, सफेद जीरा, पाठा, कुरैया की छाल, पित्तपापड़ा, चिरायता, मरोड़फली, सरसों, मरिच, कुटकी, पोहकरमूल, भारंगी, वायविडंग, काकड़ासिंगी, आक की जड़, बनभण्टा, गजपीपल, धमासा, अजवायन, अजमोद, सोनापाठा तथा हींग इन सब द्रव्यों को समान भाग में लें। इसका नाम 'अष्टाविंशक गण' है, इसमें अट्ठाईस द्रव्य हैं। इनका क्वाथ बनाकर सेवन करें। यह वात, कफ, ज्वर को नष्ट करता है, वायु को, स्वेद (पसीना) के अधिक निकल जाने से उत्पन्न हुये शीत को, बढ़े हुये कफ को, प्रलाप को, अतिनिद्रा को, रोमाञ्च तथा अरुचि को नष्ट करता है और अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) नामक महावातव्याधि में तथा सम्पूर्ण शरीर की शून्यता (सुन्न हो जाने) में इसका प्रयोग करना चाहिये और यह काढ़ा सभी ज्वरों को तथा तेरह प्रकार के सन्निपातों को नष्ट करता है।

94 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे किरातादि क्वाथ कैरातकटुकीमुस्ताधान्येन्द्रयवनागरैः । दशमूलमहादारुगजपिप्पलिकायुतैः ॥ ४१ ॥ कृतः कषायः पार्श्वार्त्तिसन्निपातज्वरं जयेत्। कासश्वासवमीहिक्कातन्द्राहृद्ग्रहनाशनः ॥ ४२ ॥ चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनियाँ, इन्द्रजौ, सोंठ, दशमूल (प्रसिद्ध दस द्रव्य), देवदारु तथा गजपीपल, इनका काढ़ा पसली की पीड़ा प्रधान सन्निपात (निमोनिया) ज्वर को जीतता है। कास, श्वास, कै, हिचकी, तन्द्रा और हृद्ग्रह (हृदय की गति के रुकावट) को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त क्वाथ में अठारह द्रव्य हैं, अतः इसका नाम 'अष्टादशाङ्ग क्वाथ' भी है। कट्फलादि क्वाथ कट्फलाम्बुदभार्ङ्गीभिर्धान्यरोहिषपर्पटैः । वचाहरीतकीशृङ्गीदेवदारुमहौषधैः ॥ ४३ ॥ हिक्कां कासं ज्वरं हन्ति श्वासश्लेष्मगलग्रहान्। कायफल का छिलका, नागरमोथा, भारंगी, धनियाँ, रोहिषतृण, पित्तपापड़ा, वच, बड़ी हरड़, काकड़ासिंगी, देवदारु तथा सोंठ का काढ़ा, हिचकी, कास, ज्वर, श्वास, कफ एवं गलग्रह (गले की रुकावट) को नष्ट करता है। गुडूची क्वाथ क्वाथो जीर्णज्वरं हन्ति गुडूच्याः पिप्पलीयुतः ।। ४४ ।। तथा पर्पटजः क्वाथः पित्तज्वरहरः परः । किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनोदीच्यनागरैः ।। ४५ ।। गिलोय का काढ़ा पीपल के चूर्ण से युक्त पीने से जीर्ण (पुराने अथवा इक्कीस दिन के बाद भी रहने वाले) को नष्ट करता है। उसी प्रकार पित्तपापड़े का क्वाथ भी पित्तज्वरनाशक क्वाथों में उत्तम है। यदि उसमें सफेद चन्दन, नेत्रबाला और सोंठ मिला दी जाये तो यह और भी उत्तम हो जाता है। निदिग्धिकादि क्वाथ निदिग्धिकामृताशुण्ठीकषायं पाययेद् भिषक् । पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं श्वासकासार्दितापहम् ।। ४६ ।। पीनसारुचिवैस्वर्यशूलाजीर्णज्वरच्छिदम् । कण्टकारी, गिलोय और सोंठ का काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से श्वास, कास और अर्दित (लकवा) को नष्ट करता है। पीनस (जुकाम) अरुचि, स्वरभेद, शूल, अजीर्ण (अनपच) तथा ज्वर को नष्ट करता है। देवदार्वादि क्वाथ (देवदारु वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।। ४७ ।। कट्फलं मुस्तभूनिम्बतिक्तधान्य हरीतकी । गजकृष्णा च दुःस्पर्शा गोक्षुरूर्ध्वव्यासकम् ।। ४८ ।। बृहत्यतिविषा छिन्ना कर्कटं कृष्णजीरकम् । क्वाथमष्टावशेषं तु प्रसूतां पाययेत् स्त्रियम् ।। ४९ ।। शूलकासज्वरश्वासमूर्च्छाकम्पशिरोर्तिजित् ।) देवदारु, वच, कूट, पीपल, सोंठ, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनियाँ, बड़ी हरड़, गजपीपल, जवासा, गोखरू, धमासा, बनभण्टा, अतीस, गिलोय, काकड़ासिंगी तथा कालाजीरा का आठवाँ भाग शेष रहा हुआ क्वाथ प्रसूता स्त्री को पिलाना चाहिये। यह काढ़ा उसके शूल, कास, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, कम्प तथा सिर की पीड़ा को शान्त करता है। वक्तव्य-यह क्वाथ हिस्टीरिया में भी बहुत लाभप्रद प्रमाणित हुआ है। क्षुद्रादि क्वाथ क्षुद्राधान्यकशुण्ठीभिर्गुडूचीमुस्तपद्मकैः ।। ५० ।। रक्तचन्दनभूनिम्बपटोलवृषपौष्करैः । कटुकेन्द्रयवाऽरिष्टभार्ङ्गीपर्पटकैः समैः ।। ५१ ।। क्वाथं प्रातर्निषेवेत सर्वशीतज्वरच्छिदम् । कण्टकारी, धनियाँ, सोंठ, गिलोय, नागरमोथा, पद्माकाठ, लालचन्दन, परवल की पत्ती, अडूसा की पत्ती, पोहकरमूल, कुटकी, इन्द्रजौ, नीम की छाल, भारंगी तथा पित्तपापड़ा को समान भाग में लेकर काढ़ा बनाकर प्रातःकाल पीये। यह सभी शीतज्वरों (जड़ैया ज्वर या शीतपूर्वक विषम ज्वर) को नष्ट करता है। मुस्तादि क्वाथ मुस्तक्षुद्रामृताशुण्ठीधात्रीक्वाथः समाक्षिकः ।। ५२ ।। पिप्पलीचूर्णसंयुक्तो विषमज्वरनाशनः । नागरमोथा, भटकटैया, गिलोय, सोंठ और आँवला का काढ़ा शहद और पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से विषमज्वर को नष्ट करता है। पतोलादि क्वाथ पटोलेन्द्रयवादारुत्रिफलामुस्तगोस्तनैः ।। ५३ ।। मधुकामृतवासानां क्वाथं क्षौद्रयुतं पिबेत् । सन्तते सतते चैव द्वितीयकतृतीयके ।। ५४ ।। ऐकाहिके वा विषमे दाहपूर्वे नवज्वरे ।

द्वितीयोऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 95


[बायाँ स्तम्भ]

परवल की पत्ती, इन्द्रजौ, देवदारु, त्रिफला, नागरमोथा, मुनक्का, मुलेठी, गिलोय तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा शहद मिलाकर सन्तत (सात, दस अथवा बारह दिन तक निरन्तर रहने वाले), सतत (आठ पहर में दो बार होने वाले), द्वितीयक (दो दिन तक निरन्तर चढ़ा रहने वाला अर्थात् चातुर्थक का विपर्यय), तृतीयक (तिजारी) तथा ऐकाहिक (प्रतिदिन आने वाले) ज्वर में और दाहपूर्वक आने वाले विषमज्वर तथा नवज्वर में पीना चाहिये।

पटोलादि क्वाथ पटोलत्रिफलानिम्बद्राक्षाशम्याकवासकैः ॥ ५५॥ क्वाथः सितामधुयुतो जयेदैकाहिकं ज्वरम्। परवल की पत्ती, त्रिफला, नीम की छाल, मुनक्का, अमलतास तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा खाँड और मधु मिलाकर पीने से 'ऐकाहिक' (अन्येद्यु) ज्वर को जीतता है।

गुडूच्यादि क्वाथ गुडूचीधान्यमुस्ताभिश्चन्दनोशीरनागरैः ॥ ५६॥ कृतं क्वाथं पिबेत् क्षौद्रसितायुक्तं ज्वरातुरः। तृतीयज्वरनाशाय तृष्णादाहनिवारणम्॥ ५७॥ गिलोय, धनियां, नागरमोथा, लालचन्दन, खस और सोंठ के काढ़े को मधु तथा मिश्री मिलाकर ज्वर रोगी, तृतीयक ज्वर को नष्ट करने के लिए पीये। यह काढ़ा प्यास और दाह का निवारण करता है।

देवदार्वादि क्वाथ देवदारुशिवावासाशालिपर्णीमहौषधैः । धात्रीयुतं शतं शीतं दद्यान्मधुसितायुतम्॥ ५८॥ चातुर्थिकज्वरे श्वासे कासे मन्दानले तथा। देवदारु, बड़ी हरड़, अडूसा का पत्ती, शालपर्णी, सोंठ तथा आँवला का काढ़ा ठंडा किया हुआ, मिश्री तथा शहद मिलाकर चातुर्थक (चौथैया) ज्वर, श्वास, कास और मन्दाग्नि में पीना चाहिये।

बृहद्गुडूच्यादि क्वाथ गुडूचीधान्यकोशीरशुण्ठीबालकपर्पटैः ॥ ५९॥ बिल्वप्रतिविषापाठारक्तचन्दनवत्सकैः । किरातमुस्तेन्द्रयवैः क्वथितं शिशिरं पिबेत्॥ ६०॥ सक्षौद्रं रक्तपित्तघ्नं ज्वरातीसारनाशनम्। गिलोय, धनियां, खस, सोंठ, नेत्रबाला, पित्तपापड़ा, बेल की गुद्दी, अतीस, पाठा, लालचन्दन, कुरैया की छाल, चिरायता,


[दायाँ स्तम्भ]

नागरमोथा तथा इन्द्रजौ का काढ़ा ठंडा करके तथा मधु मिलाकर पीना चाहिये। यह काढ़ा रक्तपित्त तथा ज्वरातीसार को नष्ट करता है।

नागरादि क्वाथ नागरं कुटजो मुस्तममृतातिविषा तथा॥ ६१॥ एभिः कृतं पिबेत् क्वाथं ज्वरातीसारनाशनम्। सोंठ, कुरैया की छाल, नागरमोथा, गिलोय और अतीस का काढ़ा पीने से यह ज्वरातीसार को नष्ट करता है। वक्तव्य- ज्वरातिसार ज्वर तथा अतिसार का सम्मिलित रूप है। इसमें ज्वर के साथ अतिसार की प्रवृत्ति होती है। यही इस नाम की चरितार्थता है।

धान्यपञ्चक क्वाथ धान्यबालकबिल्वाब्दनागरैः साधितं जलम्॥ ६२॥ आमशूलहरं ग्राहि दीपनं पाचनं परम्। धनियां, नेत्रबाला, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा सोंठ का यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ आमशूल (पेचिस) को हरता है, मल को रोकता है। यह अत्यन्त दीपन तथा पाचन है।

धान्यनागर क्वाथ धान्यनागरजः क्वाथः पाचनो दीपनस्तथा॥ ६३॥ एरण्डमूलयुक्तश्च जयेदामानिलव्यथाम्। धनियां और सोंठ का काढ़ा पाचन तथा दीपन है और एरण्ड की जड़ से युक्त उक्त क्वाथ आमवात (गठिया) की पीड़ा को जीतता है।

वत्सकादि क्वाथ वत्सकातिविषाबिल्वमुस्तबालकजः शृतः॥ ६४॥ अतीसारं जयेत् सामं चिरजं रक्तशूलजित्। कुरैया की छाल, अतीस, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा नेत्रबाला का बनाया हुआ काढ़ा आँव से युक्त पुराने अतिसार को जीतता है और रक्तातिसार तथा शूल को नष्ट करता है। वक्तव्य- 'न तु सङ्ग्रहणं देयं पूर्वमामातिसारिणे' (च० चि० अ० 19)। अर्थात् आमातिसार में पहले ही रोकने वाली औषध का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इस अवस्था में दीपन- पाचन औषधियाँ देनी चाहिये। भुनी सौंफ का चूर्ण तथा इसबगोल के बीज या उसकी भूसी बहुत लाभदायक होती है।

कुटजाष्टक क्वाथ कुटजातिविषापाठाधातकीलोध्रमुस्तकैः ॥ ६५॥ ह्रीबेरदाड़िमयुतैः कृतः क्वाथः समाक्षिकः।