भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 356 में से

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82 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे होने वाले प्रायः ज्वर, अतिसार, कास, कै या शिरोरोग आदि), 5. दन्तघात (दुबारा दाँत टूटना), 6. दन्तशब्द (सोते समय दाँत किटकिटाना), 7. अकालदन्त (असमय में दाँत निकलना, कुछ बच्चे दाँत सहित ही पैदा होते हैं और कुछ को दो-दो वर्ष की आयु तक दाँत नहीं निकलते), 8. अहिपूतन (स्वच्छता के अभाव से चूतड़ों पर फुड़िया या फुड़ियों का निकलना), 9. मुखपाक, 10. मुखस्राव (अधिक लार आना), 11. गुदपाक (गुद-प्रदेश का लाल हो जाना), 12. उपशीर्षक (सिर का फूल जाना या सिर के पिछले भाग में एक फुड़िया होती है, जो चिरस्थायी होती है), 13. पार्श्वारुण (पद्म नामक पसली पर जो लाल चौड़ा दाग हो जाता है, जो कि प्रायः मारक होता है), 14. तालुकण्टक (कौवा बढ़ना), 15. विच्छिन्न (तालु दबाना), 16. पारिगर्भिक (परिभव नामक रोग-इसमें बच्चा पीला पड़ जाता है, पेट बढ़ जाता है। यह रोग गर्भिणी माता का दूध पीने से हो जाता है), 17. दौर्बल्य (दुर्बलता), 18. गात्रशोष (कृशता या सुखण्डी), 19. शय्यामूत्र (सोते में मूतना), 20. कुकूणक, 21. रोदन (अत्यन्त रोना) तथा 22. अजगल्ली (एक प्रकार की माता)। वक्तव्य-उक्त रोगों का प्रभाव 16 वर्ष की अवस्था तक ही होता है। अतएव इनका नाम 'बालरोग' है। 'ऊनषोडशवर्षा बालाः' (सु० सू० अ० 35)। बालग्रह-गणना तथा बालग्रहाः ख्याता द्वादशैव मुनीश्वरैः। स्कन्दग्रहो विशाखः स्ताच्छ्वग्रहश्च पितृग्रहः॥189॥ नैगमेयग्रहस्तद्वच्छकुनिः शीतपूतना। मुखमण्डितिका तद्वत् पूतना चान्धपूतना॥190॥ रेवती चैव सङ्ख्याता तथा स्याच्छुष्करेवती। महर्षियों ने 'बालग्रह' बारह कहे हैं-1. स्कन्दग्रह, 2. विशाख, 3. श्वग्रह (स्कन्दापस्मार, जो 'मिरगी' जैसा होता है), 4. पितृग्रह, 5. नैगमेयग्रह, 6. शकुनिग्रह, 7. शीतपूतना, 8. मुखमण्डितिका, 9. पूतना, 10. अन्धपूतना, 11. रेवती एवं 12. शुष्करेवती। वक्तव्य-ये अलौकिक आत्माएँ हैं, जो बालकों में आवेश करती हैं। गन्दे घरों के बालकों पर अधिकतर इनका प्रभाव होता है। इनमें औषधियों के साथ-साथ बलि, मंगल आदि क्रियाएँ करने पर आरोग्य की प्राप्ति हो जाती है। पादरोग-गणना तथा चरणभेदास्तु वातरक्तादिकाश्च ये।। 191 ।। द्विचत्वारिंशदुक्तास्ते रोगेष्वेव मुनीश्वरैः । विद्वान् चिकित्सकों ने वातरक्त (पैरों में झुनझुनी या सूनापन चढ़ना) आदि चरणों के बयालीस रोग कहे हैं और वे पूर्व कहे गये रोगों में ही बतला दिये गये हैं। दोष-भेद द्विषष्टिर्दोषभेदाः स्युः सन्निपातादिकाश्च ये ।। 192 ।। तेऽपि रोगेषु गणिताः पृथक्प्रोक्ता न ते क्वचित् । वातादि दोषों के जो रोग सन्निपात और संसर्ग आदि बासठ प्रकार के होते हैं, वे पूर्वोक्त रोगों में ही आ जाते हैं, उनका पृथक् उल्लेख कहीं भी नहीं किया गया है। वक्तव्य-'न रोगोऽप्येकदोषजः' अर्थात् कोई भी रोग केवल एक दोष से उत्पन्न नहीं होता, अपितु प्रत्येक रोगों में तीनों ही दोषों की न्यूनाधिक विकृति होती ही है। दोषों की यह न्यूनाधिकता अर्थात् ह्रास तथा वृद्धि बासठ प्रकार की होती है। धातु तथा मलों के साथ दोषों का मिश्रण होने पर असंख्य प्रकार की हो जाती है। प्रत्येक रोग में कौन दोष कितना बढ़ा है और कौन दोष कितना घटा है, इसको विचारना अत्यन्त आवश्यक है। देखें-सु० उ० तं० अ० 66 तथा अ० हृ० सू० अ० 12। पञ्चकर्म-व्यापद् हीनमिथ्यातियोगानां भेदैः पञ्चदशोदिताः ।। 193 ।। पञ्चकर्मभवा रोगा रोगेष्वेव प्रकीर्तिताः । पञ्चकर्म (वमन, विरेचन, नस्य, निरूहणवस्ति तथा अनुवासनवस्ति) के हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग से पन्द्रह भेद होते हैं। उनसे उत्पन्न होने वाले रोग यथास्थान कह दिये गये हैं। स्नेहादि व्यापद् स्नेहस्वेदौ तथा धूमो गण्डूषोऽञ्जनतर्पणे ।। 194 ।। पीडा अष्टादशैतज्जास्ताश्च रोगेषु लक्षिताः । स्नेहन, स्वेदन, धूमपान, गण्डूष, अञ्जन तथा तर्पण के हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग से अठारह भेद होते हैं। इनसे होने वाले रोग भी पूर्वोक्त रोगों में कह दिये गये हैं।