भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 81 योनिकन्द-गणना चतुर्विधं योनिकन्दं वातपित्तकफाँस्त्रिधा। चतुर्थं सन्निपातेन- योनिकन्द चार प्रकार का होता है-1. वातज, 2. पित्तज, 3. कफज तथा 4. सन्निपातज। वक्तव्य-योनि में लकुच (बड़हर) के फल के समान उभारदार जो गाँठें उत्पन्न हो जाती हैं, उन्हें योनिकन्द कहा जाता है। गर्भरोग-गणना -तथाष्टौ गर्भजा गदाः ।। 180 ।। उपविष्टकगर्भः स्यात् तथा नागोदरः स्मृतः। मक्कल्लो मूढगर्भश्च विष्कम्भो मूढगर्भकः ।। 181 ।। जरायुदोषो गर्भस्य पातश्चाष्टमकः स्मृतः। गर्भ-सम्बन्धी आठ रोग होते हैं-1. उपविष्टक (किन्हीं कारणों से गर्भपोषक पदार्थों के योनिमार्ग द्वारा निकल जाने के कारण जो गर्भ पुष्ट नहीं हो पाता), 2. नागोदर (माता के उपवास आदि करने के कारण पोषक पदार्थ नहीं मिलने से जो गर्भ सूख जाता है), उक्त दोनों प्रकार के गर्भ अनेक वर्षों तक गर्भाशय में पड़े रह जाते हैं (च० शा० अ० 8); 3. मक्कल्लक, 4. मूढ़गर्भ अनेक प्रकार का होता है, उचित प्रकार से जन्म न होना 5. विष्कम्भ (गर्भ का मार्ग में अड़ जाना), 6. मूढ़गर्भ (गर्भाशय में लीन हो जाना), 7. जरायु दोष (जरायु के न फटने के कारण शिशु का न निकल पाना) तथा 8. गर्भपात (गर्भ का गिर जाना)। स्तनगत रोग-गणना पञ्चैव स्तनरोगाः स्युर्वातात्पित्तात्कफादपि ।। 182 ।। सन्निपातात् क्षताच्चैव- स्तन रोग पाँच होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से तथा 5. क्षत (घाव) से। वक्तव्य-इसे प्रायः 'थनैला' कहा जाता है। स्तनविकार-गणना -तथा स्तन्योद्भवा गदाः। बालरोगेषु कथिताः- स्तन या दुग्ध से होने वाले रोग 'बालरोगों' में कहे जायेंगे। वक्तव्य-क्योंकि दूषित दूध का बुरा प्रभाव बच्चे पर ही पड़ता है। स्त्रीदोष-गणना -स्त्रीदोषाश्च त्रयः स्मृताः ।। 183 ।। अदक्षपुरुषोत्पन्नः सपत्नीविहितस्तथा। दैवाज्जातस्तृतीयस्तु - स्त्री-दोष तीन होते हैं-1. अदक्ष (मूढ़) पुरुष (पति) से उत्पन्न होने वाला, 2. सपत्नी (सौतिन) के कारण होने वाला तथा 3. प्रारब्ध के कारण होने वाला। वक्तव्य-तीन कारणों से स्त्रियाँ दूषित या खराब हो जाती हैं-1. कामकला-विहीन या व्यवहारानभिज्ञ या मूर्ख पति मिलने से; 2. पति के दूसरी स्त्री में आसक्त होने पर ईर्ष्यावश स्त्रियाँ कुमार्गगामिनी हो जाती हैं; 3. स्वभाव से ही व्यभिचारिणी होती हैं। उक्त कारणों से ही स्त्रियाँ झगड़ालू तथा कटु स्वभाव की हो जाती हैं। प्रसूताविकार-गणना -तथा ये सूतिका गदाः ।। 184 ।। ज्वरादयश्चिकित्स्यास्ते यथादोषं यथाबलम्। प्रसूता स्त्रियों के ज्वरादि रोग 'सूतिका रोग' कहे जाते हैं। दोषों के अनुसार या रोग तथा रोगिणी के बल के अनुसार उनकी चिकित्सा करनी चाहिये। वक्तव्य-बच्चा जनने के बाद पैंतालीस दिन तक स्त्री की 'प्रसूता' संज्ञा होती है। इस अवधि के भीतर जो भी रोग हो जाता है, उसे 'सूतिका रोग' कहते हैं। बालरोग-गणना द्वाविंशतिर्बालरोगास्तेषु क्षीरभवास्त्रयः ।। 185 ।। वातात्पित्तात्कफाच्चैव दन्तोद्भेदश्चतुर्थकः। दन्तघातो दन्तशब्दोऽकालदन्तोऽहिपूतनम् ।। 186 ।। मुखपाको मुखस्रावो गुदपाकोपशीर्षकौ। पार्श्वाणुंस्तालुकण्टो विच्छन्नं पारिगर्भिकः ।। 187 ।। दौर्बल्यं गात्रशोषश्च शय्यामूत्रं कुकूणकः। रोदनं चाजगल्ली स्यादिति द्वाविंशतिः स्मृताः ।। 188 ।। बालरोग बाईस होते हैं-इनमें वात, पित्त तथा कफ से 'क्षीरालस' (दूषित दूध पीने से होने वाला) नामक तीन रोग होते हैं। चार दन्तोद्भेद (दाँत निकलते समय इसके कारण