भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 356 में से

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80 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे उनमें स्वतः मैथुन-शक्ति नहीं होती, अतः वे स्वयं मैथुन नहीं कर सकते। 1. ईर्घ्यक-जो ईर्ष्या से अर्थात् दूसरों को मैथुन करते देखकर मैथुन में समर्थ हो सकते हैं। 2. आसेक्य-जो शुक्र अर्थात् दूसरों के शुक्र जैसे शिववीर्य पारद या मकरध्वज आदि तथा शुक्रवर्धक औषधियाँ तथा बकरे, मुर्गे आदि का शुक्र खाकर ('शुक्रं शुक्रेण' च० शा० अ० 6) मैथुन में समर्थ हो सकते हैं ('आसेक्यः शुक्रासेचनयोग्यः' 'अर्थात् येषां शरीरे शुक्रस्य आसेचनस्य आवश्यकता भवति' इति)। 3. कुम्भीक-ये लोग अपने गुद में मैथुन कराने के अभिलाषी होते हैं। 4. सुगन्धि-ये लोग लिंग अथवा योनि की गन्ध सूँघकर मैथुन-कर्म करने में समर्थ हो सकते हैं। जैसे-साँड़ आदि। 5. षण्ढ-जो सर्वथा मैथुन के अयोग्य होते हैं, इन्हें हिजड़ा या तृतीया-प्रकृति कहा जाता है। इस सम्बन्ध में सु० शा० अ० 2 तथा च० शा० अ० 2 देखें। शुक्रधातु रोग-गणना शुक्रदोषास्तथाष्टौ स्युर्वातपित्तात्कफेन च ।। 172 ।। कुणपं श्लेष्मवाताभ्यां पूयाभं श्लेष्मपित्ततः। क्षीणं च वातपित्ताभ्यां ग्रन्थिलं श्लेष्मवाततः ।। 173 ।। मलाभं सन्निपाताच्च शुक्रदोषा इतीरिताः। शुक्रधातु के दोष आठ होते हैं-1. वात (वायु के वर्ण के सदृश एवं वेदना) से, 2. पित्त (पित्त के वर्ण एवं वेदना) से, 3. कफ (कफ के वर्ण एवं वेदना) से, 4. कुणप (मुरदे की-सी गन्ध से युक्त) रक्तपित्त से, 5. मलाभ (पीब जैसा कफपित्त) से, 6. क्षीण (जिसका शुक्र क्षय हो गया हो) वातपित्त से, 7. ग्रन्थिल (गाँठों वाले कफवायु से) एवं 8. पूयाभ (मूत्र तथा पुरीष की-सी गन्ध वाला) सन्निपात से। वक्तव्य-ये शुक्र की विकृतियाँ हैं, जो शुक्र में पायी जाती हैं। स्त्रीरोग-गणना अथ स्त्रीरोगनामानि प्रोच्यन्ते पूर्वशास्त्रतः ।। 174 ।। अष्टावार्तवदोषाः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा। पूयाभं कुणपं ग्रन्थि क्षीणं मलसमं तथा ।। 175 ।। अब प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार स्त्री-रोगों (जो केवल स्त्रियों को ही होते हैं) के नाम कहे जाते हैं। आर्तव के दोष या विकार आठ होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. पूयाभ, 5. कुणप, 6. ग्रन्थिल, 7. क्षीण एवं 8. मलसम। वक्तव्य-उक्त दोष रज में होते हैं। इनके लक्षण शुक्र दोषों के समान ही होते हैं। रक्तप्रदर-गणना तथा च रक्तप्रदरं चतुर्विधमुदाहृतम्। वातपित्तकफैस्त्रेधा चतुर्थं सन्निपाततः ।। 176 ।। रक्तप्रदर चार प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से तथा 4. सन्निपात से। वक्तव्य-उचित मासिकस्राव से अधिक स्राव होना 'प्रदर' कहलाता है। योनिरोग-गणना विंशतियौनिरोगाः स्युर्वातात्पित्तात्कफादपि। सन्निपाताच्च रक्ताच्च लोहितक्षयतस्तथा ।। 177 ।। शुष्का च वामिनी चैव षण्डितान्तर्मुखी तथा। सूचीमुखी विलुप्ता च जातघ्नी च परिप्लुता ।। 178 ।। उपप्लुता प्राक्चरणा महायोनिश्च कर्णिनी। स्यान्नन्दा चातिचरणा योनिरोगा इतीरिताः ।। 179 ।। योनि (भग एवं गर्भाशय) के रोग बीस होते हैं-1. वात से, 2. पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. रक्त के क्षय से, 7. शुष्का (जो सूखी रहती है), 8. वामिनी (रजयुक्त वीर्य को उगल देती है), 9. षण्डिता, 10. अन्तर्मुखी (बाहर से बन्द; इसमें ऑपरेशन से सफलता मिल जाती है), 11. सूचीमुखी (इसमें गर्भधान तो हो जाता है, परन्तु शिशु को ऑपरेशन करके निकालना पड़ता है), 12. विलुप्ता (इसमें सर्वदा पीड़ा होती रहती है), 13. जातघ्नी (पुत्रघ्नी, इसी को मृतवत्सा दोष कहा जाता है अथवा जिससे गर्भपात होते रहते हैं), 14. परिप्लुता (मैथुन में पीड़ा होती है), 15. उपप्लुता (इसमें कष्ट से रज निकलता है), 16. प्राक्चरणा (छोटी उम्र में मैथुन करने से जो पीठ, कमर, टाँग एवं कूलहों में पीड़ा होती है), 17. महायोनि (योनि का शिथिल हो जाना), 18. कर्णिनी (योनि में गाँठ हो जाना), 19. नंदा (मैथुन से संतुष्ट न होने वाली; इसी से स्त्रियाँ व्यभिचारिणी हो जाती हैं) तथा 20. अतिचरणा (अति मैथुन से योनि में सूजन, शून्यता एवं पीड़ा का हो जाना)-इस प्रकार योनि के 20 रोग कहे गये हैं। वक्तव्य-इसे विशेष रूप से जानने के लिए च० चि० अ० 30 देखें।