शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 83 [बायाँ स्तम्भ] वक्तव्य-जब वमन, विरेचन, स्नेहन तथा स्वेदन आदि किये जाते हैं, तो वैद्य परिचारक एवं रोगी की असावधानी से कुछ भूलें हो जाती हैं। यथा-वमन आदि का कम होना, ठीक-ठीक न होना तथा अधिक हो जाना। इन्हीं को क्रमशः हीनयोग, मिथ्यायोग तथा अतियोग कहा जाता है। इनसे मनुष्य को पूर्वोक्त रोगों में से ही कोई न कोई रोग हो जाता है। शीत आदि उपद्रव शीतोपद्रव एकः स्यादेकश्चोष्णोद्भवो मतः ।। 195 ।। शल्योपद्रव एकश्च क्षाराच्चैकः स्मृतस्तथा। शीत का उपद्रव (अत्यंत शीत लगने से होने वाला रोग) एक, उष्ण (गर्मी=लू) लगने से होने वाला रोग) एक, शल्य (बाण, बरछी आदि का उपद्रव) एक तथा क्षार (चूना) आदि से होने वाला उपद्रव एक होता है। वक्तव्य-शीत लगने से स्तम्भ (जकड़न), वेपथु (कँपकँपी) आदि, लू लगने से ज्वर, दाह, प्रलाप तथा रक्तनेत्रता (आँखों का लाल हो जाना) आदि, शल्य लगने से व्रण आदि तथा क्षार लगने से छत आदि लक्षण होते हैं। विष-विवेचन स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं च त्रिधा विषम् ।। 196 ।। तेषां च कालकूटाद्यैर्नवधा स्थावरं विषम्। विष तीन प्रकार का होता है-1. स्थावर (वृक्ष जाति का), 2. जंगम (प्राणी जाति का) तथा 3. कृत्रिम (बनावटी)। इनमें स्थावर विष नौ प्रकार का होता है-1. कालकूट, 2. वत्सनाभ (वच्छनाग), 3. शृङ्गिक, 4. प्रतीपक, 5. हालाहल, 6. ब्रह्मपुत्र, 7. हारिद्र, 8. सक्तुक तथा 9. सौराष्ट्रिक। देखें-शा० म० खं० अ० 12। जङ्गमविष-भेद जङ्गमं बहुधा प्रोक्तं तत्र लूता भुजङ्गमाः ।। 197 ।। वृश्चिका मूषिकाः कीटाः प्रत्येकं ते चतुर्विधाः । दंष्ट्राविषं नखविषं बालशृङ्गास्थिभिस्तथा ।। 198 ।। मूत्रात् पुरीषाच्छुक्राच्च दृष्टेर्निश्वसतस्तथा। लालायाः स्पर्शतस्तद्वत् तथा शङ्काविषं मतम् ।। 199 ।। जङ्गम विष अनेक प्रकार का होता है, यथा-अनेक प्रकार की लूताएँ, साँप, बिच्छू, चूहे तथा अन्य कीट (कीड़े)। ये सभी प्रत्येक जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेद से [दायाँ स्तम्भ] अथवा वात, पित्त, कफ तथा सन्निपात की प्रकृति के भेद से, चार-चार प्रकार के होते हैं। इनमें भी किसी के दाँत में विष होता है, किसी के नाखून में, किसी के बाल में, शृंग में, हड्डी में, मूत्र में, पुरीष में, शुक्र में, दृष्टि में, साँस में, लार में तथा स्पर्श (छूने) में विष होता है और एक 'शंकाविष' भी होता है, जिसमें केवल संदेह होने पर विष के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। देखें-सु० क०। कृत्रिम-विष कृत्रिमं द्विविधं प्रोक्तं गरदूषीविभेदतः । सप्तधातुविषं ज्ञेयं तथा सप्तोपधातुजम् ।। 200 ।। तथैवोपविषेभ्यश्च जातं सप्तविधं मतम्। दुष्टनीरविषं चैकं तथैकं दिग्ग्धजं विषम् ।। 201 ।। कृत्रिम विष दो प्रकार का होता है-1. गर तथा 2. दूषीविष। धातुविष (स्वर्ण आदि धातुएँ) सात, उपधातु विष (हरिताल आदि) सात, उपविष (आक, धतूरा आदि) सात, दूषित जल रूपी विष एक तथा दिग्ग्ध विष (विषैले द्रव्यों में बुझाये हुये बाण, तलवार आदि दिग्ग्ध कहे जाते हैं), इनके लगने से शरीर में विष का प्रवेश हो जाता है, यह भी एक ही प्रकार का होता है। वक्तव्य-"विषाणां चाल्पवीर्याणां योगो 'गर' इति स्मृतः" (अ० हृ० उ० अ० 35)। अर्थात् अल्प शक्ति वाले विषों का मिश्रण 'गर' कहा जाता है और जो विष मारता नहीं, किन्तु धातुओं को दूषित करता है, उसे 'दूषीविष' कहा जाता है। अन्य उपद्रव कपिकच्छूभवा कण्डूद्दुष्टनीरभवा तथा। तथा सूरणकण्डूश्च शोथो भल्लातजस्तथा ।। 202 ।। पकी किवाँच की फली के छूने से, दूषित जल के सम्पर्क से तथा सूरण (जिमीकन्द) का रस लगने से खुजली और भिलावा का रस या भाप लगने से शोथ हो जाता है। मद-विचार मदश्चतुर्विधश्चान्यः पूगभङ्गाक्षकोद्रवैः । चतुर्विधोऽन्यो द्रव्याणां फलत्वङ्मूलपत्रजः ।। 203 ।। मद चार प्रकार का होता है-1. पूग (सुपारी), 2. भाँग, 3. बहेड़ा की मींगी तथा 4. कोदों के चावलों को खाने तथा फल (धतूरा आदि), छाल (खदिर, बबूल आदि) के