शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें96 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
पेयो मोचरसेनैव कुटजाष्टकसंज्ञकः ।।६६ ।। अतीसाराञ्जयेद् दाहरक्तशूलामदुस्तरान्। कुरैया की छाल, अतीस, पाठा, धाय के फूल, पठानी लोध, नागरमोथा, नेत्रबाला तथा अनार के फल का छिलका (नासपाल), इनका बनाया काढ़ा शहद और मोचरस का चूर्ण मिलाकर पीना चाहिये। इसका नाम 'कुटजाष्टक' है। यह क्वाथ दाह, रक्त, शूल तथा आँव के कारण कष्टसाध्य अतिसारों को जीतता है। ह्रीबेरादि क्वाथ ह्रीबेरधातकीलोध्रपाथालज्जालुवत्सकैः ।।६७।। धान्यकातिविषामुस्तागुडूचीबिल्वनागरैः । कृतः कषायः शमयेदतीसारं चिरोत्थितम् ।।६८ ।। अरोचकामशूलास्रज्वरघ्नः पाचनः स्मृतः। नेत्रबाला, धाय के फूल, लोध, पाठा, लज्जावन्ती, कुरैया का छाल, धनियाँ, अतीस, नागरमोथा, गिलोय, बेल की गिरी तथा गिलोय का काढ़ा पुराने अतिसार, अरुचि, आँव, शूल, रक्त तथा ज्वर को नष्ट करता है तथा यह पाचन है। धातक्यादि क्वाथ धातकीबिल्वरोध्राणि बालकं गजपिप्पली ।।६९ ।। एभिः कृतं शृतं शीतं शिशुभ्यः क्षौद्रसंयुतम्। प्रदद्यादवलेहं वा सर्वातीसारशान्तये ।।७० ।। धाय के फूल, बेल की गुद्दी, लोध, नेत्रबाला और गजपीपल का काढ़ा ठंडा करके शहद मिलाकर बच्चों को देना चाहिये। अथवा उक्त द्रव्यों का चूर्ण मधु मिलाकर चटनी- सा बनाकर बच्चों को दें। यह योग सब अतिसारों को शान्त करता है। शालपर्ण्यादि क्वाथ शालिपर्णीबलाबिल्वधान्यशुण्ठीकृतः शृतः। आध्मानशूलसहितां वातजां ग्रहणीं जयेत् ।।७१ ।। शालपर्णी, बरियारा, बेल की गिरी, धनियाँ और सोंठ का काढ़ा अफरा तथा शूल से युक्त वातज ग्रहणी रोग को जीतता है। गुडूच्यादि क्वाथ गुडूच्यतिविषाशुण्ठीमुस्तैः क्वाथः कृतो जयेत्। आमानुषक्तां ग्रहणीं ग्राही पाचनदीपनः ।।७२।। गिलोय, अतीस, सोंठ तथा नागरमोथा का बनाया हुआ काढ़ा आँव से युक्त ग्रहणी को जीतता है। यह ग्राही, पाचन और दीपन होता है। इन्द्रयवादि क्वाथ यवधान्यपटोलानां क्वाथः सक्षौद्रशर्करः। योज्यः सर्वातिसारेषु बिल्वाग्नास्थिभवस्तथा ।। ७३ ।। इन्द्रजौ, धनियाँ और परवल की पत्ती का काढ़ा मधु तथा चीनी मिलाकर सभी अतिसारों में देना चाहिये। बेल का गुद्दी तथा आम की गिरी का काढ़ा भी दिया जाता है। त्रिफलादि क्वाथ त्रिफला देवदारुश्च मुस्ता मूषककर्णिका। शिग्रूत्थै कृतः क्वाथः पिप्पलीचूर्णसंयुतः ।। ७४ ।। विडङ्गचूर्णयुक्तश्च कृमिघ्नः कृमिरोगहा। त्रिफला, देवदारु, नागरमोथा, मूषाकर्णी तथा सहिजन की छाल, इनका बनाया हुआ काढ़ा पीपल और वायविडंग के चूर्ण से युक्त पीने से कृमियों तथा कृमियों के विकारों को नष्ट करता है। फलत्रिकादि क्वाथ फलत्रिकामृतातिकानिम्बकैरातवासकैः ।।७५ ।। जयेन्मधुयुतः क्वाथः कामलां पाण्डुतां तथा। त्रिफला, गिलोय, कुटकी, नीम की छाल, चिरायता तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा मधु मिलाकर पीने से कामला तथा पाण्डुरोग को नष्ट करता है। पुनर्नवादि क्वाथ पुनर्नवाभयानिम्बदार्वीतिक्तापटोलकैः ।।७६ ।। गुडूचीनागरयुतैः क्वाथो गोमूत्रसंयुतः। पाण्डुकासोदरश्वासशूलसर्वाङ्गशोथहा ।। ७७ ।। पुनर्नवा (गदहपुन्ना), बड़ी हरड़, नीम की छाल, दारुहल्दी, कुटकी, परवल की पत्ती, गिलोय तथा सोंठ का काढ़ा, गोमूत्र मिलाकर पीने से पाण्डुरोग, कास, उदररोग, श्वास, शूल तथा सम्पूर्ण शरीर का सूजन को नष्ट करता है। वासादि क्वाथ वासाद्राक्षाभयाक्वाथः पीतः सक्षौद्रशर्करः। निहन्ति रक्तपित्तार्तिश्वासकासान् सुदारुणान् ।। ७८ ।। रक्तपित्तं क्षयं कासं श्लेष्मपित्तज्वर तथा। केवलो वासकक्वाथः पीतः क्षौद्रेण नाशयेत् ।।७९।। अडूसा का पत्ती, मुनक्का तथा बड़ी हरड़ का काढ़ा