शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः] क्वथादिकल्पना 97 शहद और मिश्री मिलाकर पीने से भीषण रक्तपित्त रोग, श्वास तथा कास को नष्ट करता है। केवल अडूसा की पत्ती का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, क्षय, खाँसी और कफपित्तज्वर को नष्ट करता है। वासादि तथा क्षुद्रा क्वाथ वासाक्षुद्रामृताक्वाथः क्षौद्रेण ज्वरकासहा। कासघ्नः पिप्पलीचूर्णयुक्तः क्षुद्राशृतस्तथा।।80।। अडूसा की पत्ती, भटकटैया तथा गिलोय का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से ज्वर और कास को हरता है। केवल भटकटैया का काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से कास को नष्ट करता है। क्षुद्रादि क्वाथ क्षुद्राकुलित्थवासाभिर्नागरेण च साधितः। क्वाथः पुष्करचूर्णाढ्यः श्वासकासौ निवारयेत् ।। 81।। भटकटैया, कुलथी, अडूसा की पत्ती तथा सोंठ का काढ़ा पोहकरमूल के चूर्ण से युक्त पीने से श्वास तथा कास को रोकता है। रेणुकादि क्वाथ रेणुकापिप्पलीक्वाथो हिङ्गुकल्केन संयुतः । पानादेव हि पञ्चापि हिक्का नाशयति क्षणात् ।। 82 ।। सम्भालू के बीज तथा छोटी पीपल का काढ़ा हींग के कल्क के साथ पीने से पाँच प्रकार की हिचकी को क्षण भर में नष्ट करता है। बिल्वत्वक् क्वाथ बिल्वत्वचो गुडूच्या वा क्वाथः क्षौद्रेण संयुतः । जयेत् त्रिदोषजां छर्दिं पर्पटः पित्तजां तथा।। 83 ।। बेल वृक्ष की छाल अथवा गिलोय का क्वाथ शहद मिलाकर पीने से तीनों दोषों से उत्पन्न हुई कै को जीतता है और पित्तपापड़ा का क्वाथ पित्त की कै को हरता है। ये भिन्न-भिन्न द्रव्यों के तीन योग हैं। गृध्रसीनाशक क्वाथ हिङ्गुपुष्करचूर्णाढ्यं दशमूलशृतं जयेत्। गृध्रसीं केवलः क्वाथः शेफालीपत्रजस्तथा।। 84।। दशमूल का काढ़ा, हींग (घी में भुनी हुई) तथा पोहकरमूल का चूर्ण डालकर पीने से अथवा सम्भालू के पत्तों का काढ़ा हींग और पोहकरमूल का चूर्ण डालकर पीने से 'गृध्रसी' (रिंगण) नामक वातरोग को जीतता है। रास्नापञ्चक क्वाथ रास्नामृतामहादारुनागरैरण्डजैः शृतम्। सप्तधातुगते वाते सामे सर्वाङ्गजे पिबेत् ।।85।। रास्ना, गिलोय, देवदारु, सोंठ और एरण्ड की जड़ का काढ़ा रस, रक्त आदि सातों धातुओं में प्रविष्ट हुये वात तथा आम से युक्त वायु (आमवात या गठिया) में पीना चाहिये। रास्नासप्तक क्वाथ रास्ना गोक्षुरकैरण्डदेवदारु पुनर्नवा। गुडूच्यारग्वधैश्चैव क्वाथमेषां विपाचयेत् ।।86 ।। शुण्ठीचूर्णेन संयुक्तं पिबेज्जङ्घाकटिग्रहे। पार्श्वपृष्ठोरुपीडायामामवाते सुदुस्तरे ।। 87 ।। रास्ना, गोखरू, एरण्ड की जड़, देवदारु, पुनर्नवा (गदहपुन्ना), गिलोय और अमलतास की गुद्दी का यथाविधि काढ़ा पकाये और सोंठ का चूर्ण मिलाकर निम्नलिखित रोगों में सेवन करायें-जंघा (टाँग) और कमर की जकड़न में, पसली, पीठ तथा ऊरु (रान) की पीड़ा में तथा कष्टसाध्य आमवात (गठिया) में। महारास्नादि क्वाथ रास्ना द्विगुणभागा स्यादेकभागास्ततः परे। धन्वयासबलैरण्डदेवदारुशठीवचाः ।। 88 ।। वासको नागरं पथ्या चव्या मुस्ता पुनर्नवा। गुडूची वृद्धदारुश्च शतपुष्पा च गोक्षुरः ।। 89 ।। अश्वगन्धा प्रतिविषा कृतमालः शतावरी। कृष्णा सहचरश्चैव धान्यकं बृहतीद्वयम् ।। 90 ।। एभिः कृतं पिबेत् क्वाथं शुण्ठीचूर्णेन संयुतम्। कृष्णाचूर्णेन वा योगराजगुग्गुलुनाथ वा ।। 91 ।। अजमोदादिना वापि तैलेनैरण्डजेन वा। सर्वाङ्गकम्पे कुब्जत्वे पक्षाघातेऽपबाहुके ।। 92 ।। गृध्रस्यामामवाते च श्लीपदे चापतानके। अन्त्रवृद्धौ तथाध्माने जङ्घाजानुगतेऽर्दिते ।। 93 ।। शुक्लामये मेढ्ररोगे वन्ध्यायोनामयेषु च। महारास्नादिराख्यातो ब्रह्मणा गर्भकारणम् ।। 94 ।। रास्ना दो भाग और निम्नलिखित प्रत्येक द्रव्य एक भाग-धमासा, वरियारा, एरण्ड की जड़, देवदारु, कचूर, वच, अडूसा की पत्ती, सोंठ, बड़ी हरड़, चव्य, नागरमोथा, पुनर्नवा, गिलोय, विधारा, सौंफ (सोया भी डाला जाता है), गोखरू, असगन्ध, अतीस, अमलतास की गुद्दी, शतावर, पीपल, कटसरैया (पीयावांसा), धनियाँ, बनभण्टा तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA