भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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98 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे कण्टकारी-इनका क्वाथ सोंठ अथवा पीपल का चूर्ण मिलाकर 'योगराजगुगुल' (शा० म० खं० अ० 7) अथवा 'अजमोदादि चूर्ण' (शा० म० खं० अ० 6) के साथ अथवा एरण्ड का तैल (2 से 4 तोला तक) मिलाकर निम्नलिखित रोगों में पीना चाहिये-सम्पूर्ण शरीर की कम्पवायु में, कुब्जवात (कुबड़ापन) में, पक्षाघात (अर्द्धांग) में, अपबाहुक (बाँह की जकड़न) में, गृध्रसी (रिंगण वात) में, आमवात (गठिया) में, श्लीपद (फीलपाँव) में, अपतानक (हिस्टीरिया) में, अन्त्रवृद्धि (आँत उतरने) तथा अण्डवृद्धि में, आध्मान (अफरा) में, जंघा (टाँग) और जानु (घुटना) की पीड़ा में, लकवा में, शुक्र के विकारों में, लिंग-रोगों (उपदंश आदि तथा नपुंसकता या नस की दुर्बलता) में, बन्ध्या आदि योनि या गर्भाशय के रोगों में। यह क्वाथ 'महारास्नादि' नाम से प्रसिद्ध है। इसे ब्रह्मा ने गर्भ का कारण बतलाया है। वक्तव्य-उक्त महारास्नादि क्वाथ की औषधियों के मान के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत देखे जाते हैं-1. रास्ना दो भाग (दो तोला) और सब द्रव्य मिलाकर एक भाग (एक तोला) तथा 2. रास्ना दो भाग (दो तोला) और सब द्रव्य एक-एक भाग (एक-एक तोला)। इनमें दूसरा मत ही अधिक प्रचलित है। 'ब्रह्मणा गर्भकारणम्' कहने से प्रतीत होता है कि यह योग सम्प्रति अनुपलब्ध 'ब्रह्मसंहिता' का है। सौभाग्य की बात है कि यह परमोत्तम योग आज हमें उपलब्ध है, जिसका हम प्रयोग कराकर जनता को लाभान्वित कर रहे हैं। एरण्डादि क्वाथ एरण्डो बीजपूरश्च गोक्षुरो बृहतीद्वयम्। अश्मभेदस्तथा बिल्व एतन्मूलैः कृतः शृतः॥ ९५॥ एरण्डतैलहिङ्ग्वाढ्यः सयवक्षारसैन्धवः। स्तनस्कन्धकटीमेढ्रहृदयोत्थां व्यथां जयेत्॥ ९६॥ एरण्ड की जड़, बिजौरा नींबू की जड़, गोखरू, बनभण्टा, पाषाणभेद और बेल, इनकी जड़ों का काढ़ा, एरण्ड का तैल, हींग (घी में भुनी हुई) और जौखार तथा सेंधा नमक मिलाकर पीने से यह क्वाथ स्तन, कन्धे, कमर, लिङ्ग तथा हृदय की पीड़ा को जीतता है। नागरादि क्वाथ नागरैरण्डजः क्वाथः क्वाथ इन्द्रयवस्य च। हिङ्गुसौवर्चलोपेतो वातशूलनिवारणः॥ ९७॥ सोंठ तथा एरण्ड की जड़ क्वाथ चीनी और शहद मिलाकर पीने से रक्त-पित्त को हरता है और दाह तथा पित्तशूल (पित्त-जनित उदरशूल) को हटाता है। त्रिफलादि क्वाथ त्रिफलाऽऽरग्वधक्वाथः शर्कराक्षौद्रसंयुतः। रक्तपित्तहरो दाहपित्तशूलनिवारणः॥ ९८॥ त्रिफला एवं अमलतास के क्वाथ में चीनी और मधु मिलाकर पीने से रक्तपित्त रोग का विनाश करता है। यह दाह तथा पित्तजनित उदरशूल को भी दूर करता है। एरण्ड क्वाथ एरण्डमूलं द्विपलं जलेऽष्टगुणिते पचेत्। तत्क्वाथो यावशूकाढ्यः पार्श्वहृत् कफशूलहा॥ ९९॥ एरण्ड की जड़ दो पल (8 तोला) लेकर (जौकुट कर) आठ गुने पानी में पकाये (चतुर्थांश शेष रहने पर उतार ले)। यह काढ़ा जौखार मिलाकर पीने से पसली तथा हृदय के शूल को तथा कफजनित शूल को नष्ट करता है। दशमूल क्वाथ दशमूलकृतः क्वाथः सयवक्षारसैन्धवः। हृद्रोगगुल्मशूलानि कासं श्वासं च नाशयेत्॥ १००॥ दशमूल का काढ़ा जौखार तथा सेंधा नमक मिलाकर पीने से हृदयरोग, गुल्म (वायुगोला), शूल, कास और श्वास को नष्ट करता है। हरीतक्यादि क्वाथ हरीतकीदुरालभाकृतमालकगोक्षुरैः । पाषाणभेदसहितैः क्वाथो माक्षिकसंयुतः॥ १०१॥ विबन्धे मूत्रकृच्छ्रे च सदाहे सरुजे हितः। बड़ी हरड़, धमासा, अमलतास, गोखरू तथा पाषाणभेद- इन सबका क्वाथ शहद मिलाकर विबन्ध (मल तथा मूत्र की रुकावट), दाह तथा पीड़ा से युक्त मूत्रकृच्छ्र में पीना चाहिये। वीरतर्वादि क्वाथ वीरतरुर्वृक्षवन्दा काशः सहचरत्रयम्॥ १०२॥ कुशद्वयं नलो गुन्द्रा बकपुष्पोऽग्निमन्थकः। मूर्वा पाषाणभेदश्च स्योनाको गोक्षुरस्तथा॥ १०३॥ अपामार्गश्च कमलं ब्राह्मी चेति गणो वरः। वीरतर्वादिरित्युक्तः शर्कराश्मरिकृच्छ्रहा॥ १०४॥ मूत्राघातं रुजं तीव्रां वाधुरोगाञ्नाशयेन्निखिलानपि।