शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें100 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे व्रणों (घावों) के लिए हितकर है (व्रण धोने के लिए भी पथ्यादि क्वाथ उपयुक्त है)। भग्न (टूटी हड्डी) को (पिलाने और सेचन पथ्यारोहितकक्वाथं यवक्षारकणायुतम्।। 119।। करने से) जोड़ता है, योनि के विकारों को हरता है, दाह, पिबेत् प्रातर्यकृत्प्लीहगुल्मोदरनिवृत्तये। मेदोवृद्धि, प्रमेह तथा विष को नष्ट करता है। बड़ी हरड़ तथा रोहीतक (रोहिड़ा) का काढ़ा जौखार वक्तव्य-उक्त गण सभी प्रकार से प्रयोग में लाया जा तथा पीपल का चूर्ण मिलाकर प्रातः (प्रतिदिन) पीने से सकता है। यह उक्त गुणों के अतिरिक्त गर्भस्थापक भी है और यकृत्-विकार (जिगर का बढ़ना आदि), प्लीहा रोग गुल्म गर्भाधानकारक भी। स्त्रियों को इसका कुछ महीनों तक सेवन (वायुगोला) तथा उदर रोग नष्ट होते हैं। कराना चाहिये। पुनर्नवादि क्वाथ बिल्वादि क्वाथ पुनर्नवा दारुनिशा निशा शुण्ठी हरीतकी।। 120।। बिल्वोऽग्निमन्थः स्योनाकः काश्मरी पाटला तथा।। 115।। गुडूची चित्रको भार्गी देवदारु च तैः शृतः। क्वाथ एषां जयेन्मेदोदोषं क्षौद्रेण संयुतः। पाणिपादोदरमुखप्राप्तं शोफं निवारयेत्।। 121।। बेल की गुद्दी, अरणी, सोनापाठा, गम्भार और पाढल की पुनर्नवा, दारुहल्दी, हल्दी, सोंठ, बड़ी हरड़, गिलोय, छाल का क्वाथ मधु मिलाकर पीने से मेदोदोष (मेदोवृद्धि चित्रक (चीता को जड़), भारंगी और देवदारु का बनाया तथा मेदा के विकारों) को जीतता है। हुआ काढ़ा हाथ, पाँव, उदर तथा मुख पर उत्पन्न शोथ को दूर त्रिफला क्वाथ कर देता है। क्षौद्रेण त्रिफलाक्वाथः पीतो मेदोहरः स्मृतः।। 116।। फलत्रिक क्वाथ शीतीभूतं तथोष्णाम्बु मेदोहृत् क्षौद्रसंयुतम्। फलत्रिकोद्भवं क्वाथं गोमूत्रेणैव पाययेत्। त्रिफला का काढ़ा मधु मिलाकर पीने से बढ़े हुये मेदा वातश्लेष्मकृतं हन्ति शोथं वृषणसम्भवम्।। 122।। को घटाता है। और जल को पहले उष्ण (गर्म) कर और त्रिफला का बनाया हुआ क्वाथ गोमूत्र मिलाकर पिलायें फिर ठण्डा करके मधु मिलाकर पीने से मेदा घट जाती है। तो वह अण्डकोष पर उत्पन्न हुये वात तथा कफ के सूजन को वक्तव्य-उक्त दोनों योगों का चिरकाल तक सेवन करने नष्ट करता है। से स्थूलता का नाश होता है। रास्नादि क्वाथ चव्यादि क्वाथ रास्नामृताबलायष्टीगोकण्टैरण्डजैः शृतः। चव्यचित्रकविश्वैर्नां साधितो देवदारुणा।। 117।। एरण्डतैलसंयुक्तो वृद्धिमान्त्रभवां जयेत्।। 123।। क्वाथस्त्रिवृच्चूर्णयुतो गोमूत्रेणोदराञ्जयेत्। रास्ना, गिलोय, बरियारा, मुलेठी, गोखरू तथा एरण्ड चव्य, चित्ता, सोंठ तथा देवदारु का सिद्ध किया हुआ की जड़ के क्वाथ में एरण्ड का तैल मिलाकर पीने से अन्त्रवृद्धि क्वाथ निशोत तथा गोमूत्र मिलाकर पीने के सभी प्रकार के (आँत उतरना) को जीतता है। उदर रोगों को जीतता है। वक्तव्य-अन्त्रवृद्धि-नाशक इस क्वाथ को महीनों तक वक्तव्य-उक्त क्वाथ के सेवन से रेचन होता है। इसमें सेवन कराना चाहिये। गोमूत्र 4-8 तोला तक आवश्यकतानुसार मिलाना चाहिये। काञ्चनार क्वाथ पुनर्नवादि क्वाथ काञ्चनारत्वचः क्वाथः शुण्ठीचूर्णेन नाशयेत्। पुनर्नवामृतादारुपथ्यानागरसाधितः ।। 118।। गण्डमालां तथा क्वाथः क्षौद्रेण वरुणत्वचः।। 124।। गोमूत्रगुग्गुलुयुतः क्वाथः शोथोदरापहः। कचनार की छाल का क्वाथ सोंठ का चूर्ण मिलाकर पुनर्नवा, गिलोय, देवदारु, बड़ी हरड़, तथा सोंठ का अथवा वरुण की छाल का क्वाथ मधु मिलाकर पीने से क्वाथ गोमूत्र तथा शुद्ध गुगुल मिलाकर पीने से शोथ (सूजन) गण्डमाला को नष्ट करता है। तथा उदर रोग को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त क्वाथ को 'काञ्चनारगुग्गुलु' (शा० म०