भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 356 में से

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पृष्ठ 137

[Header] द्वितीयोऽध्यायः] क्वथादिकल्पना 101

[Left Column] खं० अ० 7) के साथ दो-तीन मास तक निरन्तर पीने से गण्डमाला रोग समूल नष्ट हो जाता है। शाखोटक क्वाथ शाखोटवल्कलक्वाथं गोमूत्रेण युतं पिबेत्। श्लीपदानां विनाशाय मेदोदोषनिवृत्तये ।। 125 ।। शाखोट (सिहोरा) की छाल का क्वाथ गोमूत्र मिलाकर श्लीपद (फीलपाँव) का विनाश करने के लिए तथा मेदोदोष (मेदाविकार) की निवृत्ति के लिए पीना चाहिये। वक्तव्य-उक्त क्वाथ का सेवन भी बहुत दिनों तक करना चाहिये, तभी लाभ होता है। पुनर्नवादि क्वाथ पुनर्नवावरुणयोः क्वाथोऽन्तर्विद्रधीञ्जयेत्। तथा शिग्रुभवः क्वाथो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः ।। 126 ।। पुनर्नवा तथा वरुण (वरना) का काढ़ा अथवा सहिजन की छाल का काढ़ा भुनी हींग, सेंधा नमक मिलाकर पीने से अन्तर्विद्रधि (भीतरी फोड़ा) को जीतता है। वरुणादिगण में ऊषकादिगण का योग वरुणादिगणक्वाथमपक्वे मध्यविद्रधौ। ऊषकादिरजोयुक्तं पिबेच्छमनहेतवे ।। 127 ।। वरुणादिगण के द्रव्यों का क्वाथ बनाकर और उसमें ऊषकादिगण के द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर अपक्व (न पके हुये) मध्यकाय (मध्य शरीर या धड़) के भीतरी अवयवों (यकृत, वृक्क आदि) में होने वाले विद्रधि (फोड़ा) की शान्ति के लिए पीना चाहिये। वरुणादिगण क्वाथ वरुणो बकपुष्पश्च बिल्वापामार्गचित्रकाः । अग्निमन्थद्वयं शिग्रुद्वयं च बृहतीद्वयम् ।। 128 ।। सैरेयकत्रयं मूर्वा मेषशृङ्गी किरातकः । अजशृङ्गी च बिम्बी च करञ्जश्च शतावरी ।। 129 ।। वरुणादिगणक्वाथः कफमेदोहरः स्मृतः । हन्ति गुल्मं शिरःशूलं तथाभ्यन्तरविद्रधीन् ।। 130 ।। वरुण (वरना), वकपुष्प (अगस्त्यवृक्ष के फूल), बेल, अपामार्ग (चिरचिटा), चित्रक (चीता), अरणी छोटी, अरणी बड़ी, सहिजन मीठा, सहिजन कडुवा, बनभण्टा, कण्टकारी, तीन प्रकार की कटसरैया-1. पीले फूल की, 2. लाल फूल की और 3. नीले फूल की, मरोड़फली, मेढ़ासिंगी, चिरायता, काकड़ासिंगी, कुन्दरू, करञ्ज तथा शतावर यह 'वरुणादिगण'

[Right Column] है (देखें-सु० सू० अ० 38)। इसका काढ़ा कफ और मेदा को हरता है तथा गुल्म (वायुगोला), शिर की पीड़ा तथा भीतरी फोड़ों को नष्ट करता है। ऊषकादिगण-ऊषक (खारी मिट्टी से निकाला हुआ नमक), तूतिया, हींग, हरा तथा लाल कौसीस, सेंधा नमक तथा शिलाजीत। यह मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वायुगोला, मेदोदोष तथा कफ को हटाता है। इस ऊषकादिगण में तूतिया और लालकासीस ये दोनों द्रव्य वमनकारक हैं, अतः इसके सेवन से वमन हो तो चिन्ता न करें। देखें-सु० सू० अ० 38। खदिरादि क्वाथ खदिरत्रिफलाक्वाथो महिषीघृतसंयुतः । विडङ्गचूर्णयुक्तश्च भगन्दरविनाशनः ।। 131 ।। खैरसार तथा त्रिफला का क्वाथ भैंस का घी तथा वायविडंग का चूर्ण मिलाकर पीने से 'भगन्दर' को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त क्वाथ से भगन्दर के घाव को धोना भी चाहिये। पटोलादि क्वाथ पटोलत्रिफलानिम्बकिरातखदिरासनैः । क्वाथः पीतो जयेत् सर्वानुपदंशान् सगुग्गुलुः ।। 132 ।। परवल की पत्ती, त्रिफला, नीम का छाल, चिरायता, खैरसार, विजयसार तथा शुद्ध गुग्गुलु का काढ़ा पीने से सब प्रकार के 'उपदंश' को जीतता है। वक्तव्य-उक्त उपदंशनाशक पटोलादि क्वाथ में शुद्ध गुग्गुल को प्रक्षेप रूप में डालना चाहिये, किन्तु साथ ही उसमें पका देने से घुलने में सरलता होती है और पीने में भी सुविधा रहती है। यह क्वाथ उस स्थिति में बहुत लाभदायक सिद्ध होता है, जब रोगी की हथेलियों में काले दाग पड़ जाते हैं अथवा शरीर भर में फोड़े निकल जाते हैं। इसे कैशोरगुग्गुल के साथ भी पिलाया जाता है। यह 'आतशक' या गर्मी की भी परमोत्तम औषधि है। इसके सेवन काल में रोगी को केवल चने की रोटी घी के साथ देनी चाहिये और नमक, खटाई आदि का परहेज कराना चाहिये। अमृतादि क्वाथ अमृतैरण्डवासानां क्वाथ एरण्डतैलयुक्। पीतः सर्वाङ्गसञ्चारि वातरक्तं जयेद् ध्रुवम् ।। 133 ।। गिलोय, एरण्ड की जड़ तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा

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