भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 356 में से

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पृष्ठ 143

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 107 चावल आदि से चौदह गुने जल में बनाया सिक्थ (सीठी या भात) से रहित 'मण्ड' कहलाता है। यह सोंठ तथा सेंधा नमक डालकर पीने से पाचन और दीपन होता है। वक्तव्य-भक्त और मण्ड बनाने की विधि एक ही है, केवल दोनों में स्वरूप भेद है। अष्टगुण मण्ड धान्यत्रिकटुसिन्धूत्थमुद्गतण्डुलयोजितः ।। 171 ।। भृष्टश्च हिङ्गुतैलाभ्यां स मण्डोऽष्टगुणः स्मृतः। दीपनः प्राणदो वस्तिशोधनो रक्तवर्धनः ।। 172 ।। ज्वरजित् सर्वदोषघ्नो मण्डोऽष्टगुण उच्यते। धनियाँ, सोंठ, मिरच, पीपल तथा सेंधानमक से युक्त मूँग तथा चावलों का मण्ड हींग तथा तैल का छौंक लगा देने पर 'अष्टगुण मण्ड' कहलाता है। इसमें निम्न आठ गुण हैं-

  1. अग्नि को दीप्त करता है, 2. प्राण (बल या शक्ति) देता है, 3. वस्ति को शुद्ध करता है, 4. रक्त को बढ़ाता है, 5. ज्वर को जीतता है, 6. वायु, 7. पित्त और 8. कफ को हरता है, अतएव इस मण्ड को 'अष्टगुण' कहा जाता है। यवमण्ड सुकण्डितैस्तथा भृष्टैर्वाट्यमण्डो यवैर्भवेत् ।। 173 ।। कफपित्तहरः कण्ठ्यो रक्तपित्तप्रसादनः। सुकण्डित (भली प्रकार छिलका-भूँसी उतारे हुये) तथा कुछ भूने हुये जौ का जो मण्ड होता है, उसे 'वाट्य-मण्ड' कहा जाता है। यह कफ और पित्त को हरता है, कण्ठ के विकारों को दूर करता है तथा रक्त तथा पित्त को शुद्ध करता है। वक्तव्य-जौ का दलिया भी बहुत लाभदायक होता है। 'वाट्य एव वाट्यकः' इस अर्थ में यहाँ 'स्वार्थे कन्' इस सूत्र से स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय हुआ है। यह भुने हुये जौ का ही नाम है। लाजमण्ड लाजैर्वा तण्डुलैर्भृष्टैर्लाजमण्डः प्रकीर्तितः ।। 174 ।। श्लेष्मपित्तहरो ग्राही पिपासाज्वरजिन्मतः। इति श्रीदामोदरसूनूना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे क्वाथादिकल्पना नाम द्वितीयोऽध्यायः ।। 2 ।। धान का लावा (खीलों) का अथवा भुने हुये चावलों का मण्ड 'लाजमण्ड' कहलाता है। यह कफ तथा पित्त को हरता है, मल को रोकता है तथा प्यास व ज्वर को जीतता है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। 2 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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