भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः फाण्टादिकल्पना


फाण्ट-निर्माण-विधि

क्षुण्णे द्रव्यपले सम्यग्जलमुष्णं विनिक्षिपेत्। मृत्पात्रे कुडवोन्मानं ततस्तु स्रावयेत् पटात्।।१।। स स्याच्चूर्णद्रवः फाण्टस्तन्मानं द्विपलोन्मितम्। मधुश्वेतागुडादींश्च क्वाथवत् तत्र निक्षिपेत्।।२।।

उचित रूप से कूटे हुये एक पल (4 तोला) द्रव्य को मिट्टी के पात्र में रख दें और उसमें एक कुडव (16 तोला) उष्ण (खौलता हुआ) जल डाल दें, तत्पश्चात् उसे कपड़े से छान ले। इसका नाम 'चूर्णद्रव' तथा 'फाण्ट' है। इसकी मात्रा दो पल (8 तोला) है। इसमें शर्करा (मिश्री), मधु तथा गुड़ आदि (जो क्वाथ-प्रकरण में कहे गये हैं) प्रक्षेप द्रव्य क्वाथ के समान डालने चाहिये।

वक्तव्य—'चाय' इसी प्रकार बनायी जाती है। द्रव्यों को इतना कूट-पीस लेना चाहिये कि उनका सार जल में शीघ्र आ सके। इसका नाम 'चूर्णद्रव' रखने का तात्पर्य यही है कि द्रव्य पूर्णरूप से चूर्ण बना लिये जायें।


बृहत् मधूकपुष्पादि फाण्ट

मधूकपुष्पं मधुकं चन्दनं सपरूषकम्। मृणालं कमलं लोध्रं गम्भारीं नागकेशरम्।।३।। त्रिफला-सारिवा-द्राक्षा-लाजान् कोष्णजले क्षिपेत्। सितामधुयुतः पेयः फाण्टो वासौ हिमोऽथवा।।४।। वातपित्तज्वरं दाहं तृणामूर्च्छारतिभ्रमान्। रक्तपित्तं मदं हन्यान्नात्र कार्या विचारणा।।५।।

महुआ का फूल, मुलेठी, लालचन्दन, फालसा (फल अथवा छाल), कमल की नाल (भसीडा), कमल, लोध, गम्भार की छाल, नागकेसर, त्रिफला, सारिवा, मुनक्का तथा लावा (धान की खील) इन सबको गुनगुने जल में डाल दें, तत्पश्चात् छानकर इस फाण्ट को चीनी तथा शहद डालकर पीये। इसका 'हिम' (देखें-अ० 4 म० खं०) भी बनाया जाता है। यह योग वात तथा पित्त को हरता है तथा दाह, तृष्णा (प्यास), मूर्च्छा, अरति (बेचैनी), भ्रम, रक्तपित्त और मद को नष्ट करता है इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये।


आम्रादि फाण्ट

आम्रजम्बूकिसलयैर्वटशुङ्गप्ररोहकैः । उशीरेण कृतः फाण्टः सक्षौद्रो ज्वरनाशनः।।६।। पिपासाच्छर्द्यतीसारामूर्च्छा जयति दुस्तराम्।

आम तथा जामुन के कोमल पत्ते, वट (बरगद) के शुंग (बरगद के प्रारम्भिक पत्तों का समूह, जो सींग जैसा होता है) और प्ररोह (दाढ़ी या बरोह) तथा खस का 'फाण्ट' शहद मिलाकर पीने से ज्वर को नष्ट करता है। प्यास, कै और अतिसार को तथा भीषण मूर्च्छा को जीत लेता है।


लघुमधूकपुष्पादि फाण्ट

मधूकपुष्पगम्भारीचन्दनोशीरधान्यकैः ।।७।। द्राक्षया च कृतः फाण्टः शीतः शर्करया युतः। तृष्णापित्तहरः प्रोक्तो दाहमूर्च्छाभ्रमाञ्जयेत्।।८।।

महुआ का फूल, गम्भार की छाल अथवा फल, लालचन्दन, खस, धनियाँ तथा मुनक्का का बनाया हुआ 'फाण्ट' सर्वथा ठण्डा होने पर चीनी मिलाकर पीने से तृष्णा (प्यास) और पित्त को हरता है। दाह, मूर्च्छा तथा भ्रम को जीतता है।


मन्थ-विधि

मन्थोऽपि फाण्टभेदः स्यात्तेन चात्रैव कथ्यते। जले चतुष्पले शीते क्षुण्णं द्रव्यपलं क्षिपेत्।।९।। मृत्पात्रे मन्थयेत्सम्यक् तस्माच्च द्विपलं पिबेत्।

'मन्थ' भी फाण्ट का ही एक भेद है, इसलिये इसका विधान भी इसी अध्याये में कहा जाता है। चार पल (16