भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 356 में से

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पृष्ठ 189

नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 153

[बायाँ स्तम्भ] चूर्णयेत् तत्र निक्षिप्य साधयेन्मृदुवह्निना। अस्याभ्यङ्गात्प्रशाम्यन्ति सर्वेऽपि विषमज्वराः ॥ ९६ ॥ कासश्वासप्रतिश्यायत्रिकपृष्ठग्रहास्तथा । वातं पित्तमपस्मारमुन्मादं यक्षराक्षसान् ।। ९७ ।। कण्डूं शूलं च दौर्गन्ध्यं गात्राणां स्फुरणं जयेत्। पुष्टगर्भा भवेदस्य गर्भिण्यभ्यङ्गतो भृशम् ।। ९८ ।। एक आढक (3 सेर 3 पाव 4 तोला) पीपल या बेर (बेरी की लाही = लाख) को चार आढक जल में क्वथित करे, चौथायी शेष रहने पर छानकर क्वाथ को एक प्रस्थ (64 तोला) तिल के तैल में डाल दें और इसी में गाय के दही का जल एक आढक मिला दें, फिर सौंफ, असगन्ध, हल्दी, देवदारु, कुटकी, सम्भालू के बीज, मरोड़फली, कूठ, मुलेठी, सफेदचन्दन, नागरमोथा तथा रास्ना प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला परिमाण में लेकर पीसकर कल्क बना लें। फिर सबको एक साथ मिलाकर मन्दाग्नि द्वारा विधिपूर्वक परिपाक करें। इस तैल के अभ्यंग (मालिश) से सब प्रकार के विषमज्वर तथा कास, श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम) तथा कमर और पीठ का जकड़न आदि शान्त हो जाते हैं। इस तैल (मालिश करने) से वात-विकार, पित्त-विकार, अपस्मार (मिरगी), उन्माद (पागलपन), यक्ष तथा राक्षस के आवेश (भूतबाधा), कण्डू (खुजली), शूल (उदर की पीड़ा या हड्डियों की पीड़ा), शरीर की दुर्गन्धि (बगलगन्ध आदि) तथा अंगों के स्फुरण (फड़कना) को जीतता है और इसके निरन्तर अभ्यंग (मालिश) करने से गर्भिणी का गर्भ पुष्ट होता है। वक्तव्य-लाही या लाख का क्वाथ बहुत बड़े बरतन (कड़ाही) में करना चाहिये और बराबर हिलाते या चलाते रहना चाहिये अन्यथा लाही नीचे लगकर जल जायेगी। यह स्मरण रखना चाहिये कि लाख काष्ठ औषधियों के समान नहीं पकती, अपितु वह पिघल जाती है। अङ्गारक तैल (मूर्वा लाक्षा हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठा सेन्द्रवारुणी। बृहती सैन्धवं कुष्ठं रास्ना मांसी शतावरी ।। ९९ ।। आरनालाढके तत्र तैलप्रस्थं विपाचयेत् । तैलमङ्गारकं नाम सर्वज्वरविमोक्षणम् ।। १०० ।।) मरोड़फली, लाही (लाख), दारुहल्दी, हल्दी, मजीठ, इन्द्रायण की जड़, बनभण्टा, सेंधा नमक, कूठ, रास्ना, जटामांसी तथा शतावर-इन सब द्रव्यों का कल्क (एक कुडुव या 16

[दायाँ स्तम्भ] तोला) बना लें। आरनाल (काँजी) एक आढक (3 सेर या 16 तोला) और तिलतैल एक प्रस्थ (64 तोला), इन सबको एक साथ मिलाकर अच्छी तरह परिपाक करें। इस तैल का नाम 'अंगारक तैल' है। इसकी मालिश करने से सभी प्रकार के ज्वरों से मुक्ति मिलती है। वक्तव्य-काँजी कई प्रकार से बनायी जाती है, किन्तु गुण सबका प्रायः समान ही होता है, क्योंकि सबका सन्धान एक ही प्रकार से किया जाता है। आरनाल नामक काँजी के निर्माण की विधि यह है- 'अरनालं तु गोधूमैरामैः स्यात्त्रिस्रुतैः कृतैः। पक्वैर्वा सन्धितैस्तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः' ।। अर्थात् कच्चे अथवा पके गेहूँ की काँजी को 'आरनाल' कहा जाता है। किसी द्रव्य (पकोड़े, मूली, गाजर, राई, नमक, मिरच आदि) को जल में डालकर दो तीन दिन तक रख देने से एक विशेष प्रकार की गन्ध और रस की उत्पत्ति हो जाने पर 'काँजी' तैयार हो जाती है। नारायण तैल अश्वगन्धां बलां बिल्वं पाटलां बृहतीद्वयम्। श्वदंष्ट्राऽतिबला निम्बं स्योनाकं च पुनर्नवा ।। १०१ ।। प्रसारिणीमग्निमन्थं कुर्याद् दशपलं पृथक् । चतुर्गुणे जले पक्त्वा पादशेषं शृतं नयेत् ।। १०२ ।। तैलाढकेन संयोज्य शतावर्या रसाढकम्। क्षिपेत् तत्र च गोक्षीरं तैलात् तस्माच्चतुर्गुणम् ।। १०३ ।। शनैर्विपाचयेद्देभिः कल्कैर्द्विपलिकैः पृथक् । कुष्ठैला चन्दनं मूर्वा वचामांसी ससैन्धवैः ।। १०४ ।। अश्वगन्धाबलारास्नाशतपुष्पेन्द्रदारुभिः । पर्णीचतुष्टयेनैव तगरेण च साधयेत् ।। १०५ ।। तत्तैलं नावनऽभ्यङ्गे पाने बस्तौ च योजयेत् । पक्षाघातं हनुस्तम्भं मन्यास्तम्भं गलग्रहम् ।। १०६ ।। खल्लत्वं बधिरत्वं च गतिभङ्गं कटिग्रहम् । गात्रशोषेन्द्रियध्वंसावसृक्शुक्रज्वरक्षयान् ।। १०७ ।। अन्त्रवृद्धिं कुरण्डं च दन्तरोगं शिरोग्रहम् । पार्श्वशूलं च पाङ्गुल्यं बुद्धिहानिं च गृध्रसीम् ।। १०८ ।। अन्यांश्च विषमान् वाताञ्जयेत् सर्वाङ्गसंश्रयान् । अस्य प्रभावाद् वन्ध्यापि नारी पुत्रं प्रसूयते ।। १०९ ।। मर्त्यो गजो वा तुरगस्तैलादस्मात् सुखी भवेत् । यथा नारायणो देवो दुष्टदैत्यविनाशनः ।। ११० ।। तथैवं वातरोगाणां नाशनं तैलमुत्तमम् ।

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