भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 356 में से

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पृष्ठ 190

154 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे असगन्ध, बरियारा, बेल की गुदी, पाढल, बनभण्टा, कण्टकारी, गोखरू, कंची, नीम की छाल, सोनापाठा, पुनर्नवा, गन्धप्रसारिणी एवं अरणी प्रत्येक द्रव्य दस-दस पल (40-40 तोला) परिमित लेकर एवं जौकुट कर (आठ पहर तक भिगा दें) चार द्रोण (51 सेर 16 तोला) जल में डालकर क्वाथ करें। जब चतुर्थांश शेष रह जाये तो छानकर उस क्वाथ को ले लें, फिर इस क्वाथ को एक आढक (3 सेर 16 तोला) तिलतैल में मिला दें और उसमें शतावरी का स्वरस एक आढक (3 सेर 16 तोला) डाल दें और तेल से चौगुना गाय का दूध डालकर धीरे-धीरे पाक करें। तैयार होने पर उसमें कूट, इलायची, सफेद चन्दन, बरियारा, जटामांसी, छरीला, सेंधव नमक, असगन्ध, वच, रास्ना, सौंफ, देवदारु, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी एवं तगर प्रत्येक द्रव्य दो-दो पल (8-8 तोला) लेकर एवं कल्क बनाकर और उक्त तैल में डालकर अत्यन्त मन्द आँच से उसका पाक करें। इस तैल को नस्य, अभ्यङ्ग (मालिश), पीने एवं वस्ति (पिचकारी) में प्रयुक्त करना चाहिये। यह तैल पक्षाघात (अर्द्धांग), हनुस्तम्भ (मुख का खुला या बन्द रह जाना), मन्यास्तम्भ (गर्दन की जकड़न), गलग्रह (गले की रुकावट), खल्ली (हाथ-पाँव की ऐंठन), बधिरता (बहिरापन), गतिभंग (खञ्ज एवं कलायखञ्ज का होना), कटिग्रह (कमर की जकड़न), गात्रशोष (अंगों का सूखना), इन्द्रियध्वस (ज्ञानेन्द्रियों का दुर्बल हो जाना), रक्तगत एवं शुक्रगत वातविकार, जीर्णज्वर, क्षय, आन्त्रवृद्धि (आँत उतरना), अण्डवृद्धि, दन्तरोग, शिरोरोग, पार्श्वशूल (पसली का दर्द), पंगुता, बुद्धि का ह्रास, गृध्रसी एवं अन्यान्य भयानक एवं समस्त शरीर में होने वाले वायु के रोगों को जीतता है। इसके प्रभाव से बन्ध्या (बाँझ) स्त्री भी पुत्र उत्पन्न करती है। वातरोग से पीड़ित मनुष्य, हाथी एवं घोड़ा भी इस तैल से सुखी हो जाता है। जैसे भगवान् नारायण दुष्ट दैत्यों का विनाश करते हैं, वैसे ही यह उत्तम 'नारायण तैल' वातरोगों का विनाश करता है। वक्तव्य-यह नारायण तैल आयुर्वेद का सर्वश्रेष्ठ अतएव सुप्रसिद्ध योग है। कल्क द्रव्यों में से सुगन्धित द्रव्यों को अलग भी रख लिया जाता है और परिपाक हो जाने पर छानने के पश्चात् पीसकर डाल दिया जाता है। दो-तीन सप्ताह में तैल सुगन्धित हो जाता है अथवा सुगन्धि के लिए निम्नलिखित द्रव्यों का प्रयोग भी किया जाता है। सुगन्धितद्रव्य प्रयोग-विधि-'समङ्गानखकङ्कोल- नलिकाजातिकोषकम् । त्वक्कुन्दुरुष्ककर्पूरतुरुष्कश्रीनिवास- कम्। स्पृक्काकुङ्कुमस्तूरीं दद्यादत्रावतारिते' ।। अर्थात् मजीठ अथवा नेत्रबाला, नाखूना, शीतलचीनी, नलिका (नालुका नामक सुगन्धित द्रव्य) इनका वेदनायुक्त अंग पर लेप करने से बहुत लाभ होता है। जावित्री, दालचीनी, कुन्दुरुष्क, कर्पूर, तुरुष्क, श्रीनिवास, असवर्ग, केशर एवं कस्तूरी आदि सुगन्धित द्रव्य पकाकर उतारे हुये तैल में डालना चाहिये। वक्तव्य-तेलों को लाल रंग देने के लिये 'रतनजोत' डाली जाती है। रतनजोत पाँच तोला को 20 तोला तैल में पकाकर रख लेना चाहिये। इस प्रकार तैल का रंग तैयार हो जाता है। इसे आवश्यकतानुसार तैल को रंगीन करने के लिए काम में लाना चाहिये। वारुणी तैल (वारुण्या औत्तरं मूलं कुट्टितं तु पलत्रयम् ।। 111 ।। पलद्वादशकं तैलं क्षणं वह्नौ विपाचितम् । निष्कत्रयं भक्तयुक्तं सेवेतास्माद् विनश्यति ।। 112 ।। हस्तकम्पः शिरःकम्पः कम्पो मन्याशिराभवः ।) इन्द्रायण की उत्तम (जो घुनी न हो) जड़ का चूर्ण तीन पल (12 तोला), तैल बारह पल (48 तोला) दोनों को मिलाकर अग्नि पर चढ़ाकर थोड़ी देर तक पकायें, जब चूर्ण तैल पर तैरने लगे और लाल-सा हो जाये तो उतार कर छानकर रख लें (इस तैल की मात्रा तीन निष्क या शाण या बारह आना भर है)। इसे भात के (एक-दो ग्रास में मिलाना चाहिये, अन्यथा सब भात कडुवा हो जायेगा) साथ मिलाकर खाना चाहिये। इससे हाथ का, शिर का और मन्या एवं शिराओं का काँपना या फड़कना नष्ट हो जाता है। वक्तव्य-इसका प्रभाव वातव्याधि के रूप में हुये कम्पन को ठीक करते देखा जाता है, किन्तु वृद्धावस्था के कारण उत्पन्न कम्पन में नहीं। बलादि तैल बलामूलकषायेण दशमूलशृतेन च ।। 113 ।। कुलत्थयवकोलानां क्वाथेन पयसा तथा। अष्टाष्टभागयुक्तेन भागमेकं च तैलकम् ।। 114 ।। गणेन जीवनीयेन शतावर्येन्द्रदारुणा । मञ्जिष्ठाकुष्ठशैलैयतगरागुरुसैन्धवैः ।। 115 ।।