भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 356 में से

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158 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे


[बायाँ स्तम्भ]

वक्तव्य—'मरिचादि तैल' का निर्माण सरसों के तैल से ही किया जाता है। त्रिफलादि तैल त्रिफलारिष्टभूनिम्बं द्वे निशे रक्तचन्दनम्। एतै सिद्धमरूंषीणां तैलमभ्यञ्जने हितम् ।। 153 ।। त्रिफला, नीम के पत्र, चिरायता, दारुहल्दी, हल्दी तथा लालचन्दन—इन द्रव्यों के कल्क तथा क्वाथ से पकाया हुआ सरसों का तैल मालिश करने से अरूंषिका (शिर के फोड़ों) को नष्ट करता है। वक्तव्य—उक्त तैल केवल कल्क द्वारा भी सिद्ध किया जाता है। इसे मीठी आँच पर पकाना चाहिये। अरूंषिका नामक फुन्सियाँ शिर में होती हैं, जिनका पीला-पीला तथा दुर्गन्धियुक्त मवाद (पीब) निकल कर वहीं पर जम जाता है। निम्बबीज तैल भावयेन्निम्बबीजानि भृङ्गराजरसेन हि। तथासनस्य तोयेन तत्तैलं हन्ति नस्यतः।। 154 ।। अकालपलितं सद्यः पुंसां दुग्धान्नभोजिनाम्। नीम के बीजों को भाँगरा के रस की तथा विजयसार के क्वाथ की भावना दें और इसके पश्चात् उन बीजों का तैल निकाल लें। इस तैल की नस्य लेने से दूध-भात खाने वाले मनुष्यों का अकाल पलित (जवानी में ही बालों का सफेद हो जाना) शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। वक्तव्य—नीम के बीजों का तैल दो प्रकार से निकाला जाता है—1. बादामरोगन निकालने की विधि से भली-भाँति पीसकर धूप में रख देने से तैल निकल आता है और 2. कोल्हू द्वारा जैसे सरसों तथा तिल आदि का तैल निकाला जाता है। इसकी नस्य का प्रयोग प्रतिदिन वर्षों तक करना चाहिये। इसमें नमक का सर्वथा त्याग करके केवल दूध के साथ भात तथा रोटी का सेवन करना चाहिये। यष्टीमधुक तैल यष्टीमधुकक्षीराभ्यां नवधात्रीफलैः शृतम् ।। 155 ।। तैलं नस्यकृतं कुर्यात् केशाञ्श्मश्रूणि सङ्घशः। मुलेठी, गाय का दूध तथा नवीन या ताजे आँवले, इन द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक पकाये हुये तैल के (नस्य) प्रयोग से केश तथा श्मश्रु (दाढ़ी तथा मोंछ) सघन (घने) हो जाते हैं।


[दायाँ स्तम्भ]

वक्तव्य—इस तैल का पाक यथाविधि करना चाहिये। यह तैल इन्द्रलुप्त (दाढ़ी-मोंछों के बालों का गिरना), खालित्य (शिर के बालों का उखड़ जाना) और शरीर के किसी भी स्थान के बालों के उखड़ जाने पर मालिश करने पर भी बहुत लाभ करता है। मुलेठी और आवलों का कल्क 1 सेर, तिल तैल चार सेर तथा गाय का दूध सोलह सेर मिलाकर पाक करें। इस प्रकार 'आँवले का तेल' तैयार किया जाता है। करञ्ज तैल करञ्जश्चित्रको जाती वरवीरश्च पाचितम् ।। 156 ।। तैलमेभिर्द्रुतं हन्यादभ्यङ्गादिन्द्रलुप्तकम्। करञ्ज के पत्र, चीता के पत्र, चमेली के पुष्प एवं कनेर के पत्र—इन द्रव्यों से पकाया हुआ तैल अभ्यंग (मालिश) करने से शीघ्र ही 'इन्द्रलुप्त' को नष्ट करता है। वक्तव्य—करञ्ज, चीता तथा कनेर के पत्रों के कल्क को तैल में डालकर यथाविधि मन्द-मन्द अग्नि से पाक करें, पाक हो जाने पर उसमें चमेली के फूल डालकर एक सप्ताह धूप में रख देने से उक्त सुगन्धित तेल तैयार हो जाता है। नीलिकादि तैल नीलिका केतकीकन्दं भृङ्गराजः कुरण्टकः ।। 157 ।। तथार्जुनस्य पुष्पाणि बीजकात् कुसुमान्यपि। कृष्णास्तिलाश्च तगरं समूलं कमलं तथा ।। 158 ।। अयोरजः प्रियङ्गुश्च दाडिमत्वग्गुडूचिका। त्रिफला पद्मपङ्कश्च कल्कैरेभिः पृथक्पृथक् ।। 159 ।। कर्षमात्रैः पचेत् तैलं त्रिफलाक्वाथसंयुतम्। भृङ्गराजरसेनैव सिद्धं केशस्थिरीकृतम् ।। 160 ।। अकालपलितं हन्ति दारुणं चोपजिह्विकाम्। नील के पत्र, केवड़े का कन्द, भाँगरा, कुरैया के पत्र, अर्जुन वृक्ष के फूल, विजयसार के फूल, काले तिल, तगर, कमल, कमल की जड़, लोहे का चूर्ण, प्रियंगु, देशी अनार का छिलका, गिलोय, त्रिफला एवं पद्मपङ्क (कमलों की जड़ का कीचड़) प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (तोला) लेकर कल्क बना लें। तिल तैल (72 तोला), त्रिफला का क्वाथ (तैल की अपेक्षा दुगुना) एवं भाँगरा का स्वरस (तैल से दुगुना)—इन द्रव्यों को एक साथ मिलाकर पाक करें। यह तैल मालिश करने से केशों को स्थिर करता (उखड़ने नहीं देता) है, अकालपलित, दारुणक (रूसी) और उपजिह्विका नामक रोग को नष्ट करता है।