भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 356 में से

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नवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 159 वक्तव्य-यह एक प्रकार का 'कल्प' है। इसके सेवन से (कुछ महीनों तक निरन्तर लगाने से) बाल जड़ से काल हो जाते हैं। होना), प्रहर्ष (दन्तहर्ष), विद्रधि (गलविद्रधि), कृमिदन्तक (दाँतों में कीड़ा लगना), दन्तस्फुरण (दाँतों की सुरसुराहट), दौर्गन्ध्य (दाँतों की दुर्गन्धि) तथा जीभ, तालु एवं ओठ के रोगों को नष्ट करता है। भृङ्गराज तैल भृङ्गराजरसैर्नैव लोहकिट्टं फलत्रिकम् ।। 161 ।। सारिवां च पचेत् कल्कैस्तैलं दारुणनाशनम्। अकालपलितं कण्डूमिन्द्रलुप्तं च नाशयेत् ।। 162 ।। भाँगरा का रस (4 सेर), लोहकिट्ट (मण्डूर का चूर्ण अथवा लोहचूर्ण), त्रिफला एवं सारिवा (इनका कल्क 1 पाव) और तिल का तैल (1 सेर) सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल दारुण (रूसी), अकालपलित, शिर की खुजली एवं इन्द्रलुप्त रोग को नष्ट करता है। वक्तव्य-इरिमेद एक प्रकार का खैर ही है। इसे 'दुर्गन्धि' या 'विट्खदिर' कहा जाता है। उक्त तैल मुखरोगों की उत्तम तथा प्रसिद्ध औषधि है। इसमें भी सुगन्धित द्रव्यों को तैल सिद्ध होने के बाद डालना चाहिये। जात्यादि तैल (जातीनिम्बपटोलानां नक्तमालस्य पल्लवाः ।। 168 ।। सिक्थं समधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी। मञ्जिष्ठा पद्मकं लोध्रमभया नीलमुत्पलम् ।। 169 ।। तुत्थकं सारिवाबीजं नक्तमालस्य दापयेत्। एतानि समभागानि पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ।। 170 ।। नाडीव्रणे समुत्पन्ने स्फोटके कच्छूरोगिषु । सद्यः शस्त्रप्रहारेषु दग्धविद्धेषु चैव हि ।। 171 ।। नखदन्तक्षते देहे व्रणे दुष्टे प्रशस्यते।) इरिमेदादि तैल इरिमेदत्वचं क्षुण्णा पचेच्छतपलोन्मिताम्। जलद्रोणे ततः क्वाथं गृह्णीयात् पादशेषितम् ।। 163 ।। तैलस्यार्धाढकं दत्त्वा कल्कैः कर्षमितैः पचेत्। इरिमेदलवङ्गाभ्यां गैरिकागुरुपद्मकैः ।। 164 ।। मञ्जिष्ठालोध्रमधुकैर्लाक्षान्यग्रोधमुस्तकैः । त्वग्जातीफलकर्पूरकङ्कोलखदिरैस्तथा ।। 165 ।। पतङ्गधातकीपुष्पसूक्ष्मैलानागकेसरैः । कट्फलेन च संसिद्धं तैलं मुखरुजं जयेत् ।। 166 ।। प्रदुष्टमांसं पलितं शीर्णदन्तं च सौषिरम्। श्यावदन्तं प्रहर्षं च विद्रधिं कृमिदन्तकम् ।। 167 ।। दन्तस्फुरणदौर्गन्ध्यं जिह्वाताल्वोष्ठजां रुजम्। चमेली के पत्र, नीम के पत्र, परवल के पत्र, करञ्ज के पत्र, मोम, मुलेठी, कूट, हल्दी, दारुहल्दी, कुटकी, मजीठ, पद्मकाठ, लोध, हरड़, नीलोत्पल (नीलोफर), तूतिया, सारिवा तथा करञ्ज के बीज प्रत्येक द्रव्य को समान भाग (1-1 तोला) लेकर और कल्क बनाकर तैल (सबसे चौगुना अर्थात् 72 तोला) में पकायें। यह तैल नाड़ीव्रण (नासूर) में, स्फोटक (बड़ी माता के घावों) में, कच्छूरोग (भयानक खुजली) में, सद्यः शस्त्र-क्षत (तत्काल के घावों) में, दिग्दविद्ध (विष में बुझाये हुये बाण आदि के घावों) में, नाखून एवं दाँतों के घावों में तथा शरीर के दूषित व्रणों (घावों) में उत्तम माना जाता है। खैर की छाल का चूर्ण सौ पल (5 सेर) लेकर एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में डालकर क्वाथ करें, चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इस क्वाथ में तिल का तैल एक आढक (3 सेर 16 तोला), खैर की छाल, लौंग, गेरू, अगरचन्दन, पद्मकाठ, मजीठ, लोध, मुलेठी, लाही (लाख), बड़ की छाल, नागरमोथा, दालचीनी, जायफल, कपूर, शीतलचीनी, खैरसार (कत्थ), पतंग, धाय का फूल, छोटी इलायची, नागकेसर तथा कायफल' प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (1-1 तोला) लेकर उसका कल्क बनाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल मुख के सभी रोगों को जीतता है। दुष्टमांस (मांस विकृति) से होने वाला ओष्ठरोग, चलित (दाँतों का हिलना), शीर्णदन्त (अकाल में दाँतों का गिरना), सौषिर (मसूड़ों का फूलना), श्यावदन्त (दाँत का काला वक्तव्य-यह तैल नासूर में अत्यन्त उपयोगी है, क्योंकि जहाँ पर नासूर के भीतर और पिण्डतैल आदि नहीं पहुँचाये जा सकते अथवा बहुत कठिनता से पहुँचाये जा सकते हैं, वहाँ पर यह तैल तरल होने के कारण सरलतापूर्वक पहुँचाया जा सकता है। इसके प्रभाव से भीतर से घाव धीरे-धीरे भर जाता है। हिंग्वादि तैल हिङ्गुतुम्बुरुशुण्ठीभिः कटुतैलं विपाचयेत् ।। 172 ।। तस्य पूरणमात्रेण कर्णशूलं प्रणश्यति।