भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 356 में से

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एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 185 उपरिस्थं घनं यत्स्यात् तत्क्षिपेदन्यपात्रके। धारयेदातपे धीमानुपरिस्यं घनं नयेत् ॥97॥ एवं पुनः पुननींत्वा द्विमासाभ्यां शिलाजतु । भूयात् कार्यक्षमं वह्नौ क्षिप्तं लिङ्गोपमं भवेत् ॥98॥ निर्धूमं च ततः शुद्धं सर्वकर्मसु योजयेत् । अधःस्थितं च यच्छेषं तस्मिन्नीशं विनिक्षिपेत् ॥99॥ विमर्द्य धारयेद् घर्मे पूर्ववच्चैव तन्नयेत्। शिलाजीत के पत्थरों को लेकर तथा कूटकर सूक्ष्म चूर्ण बना लें और इसको अत्यन्त उष्ण जल में डालकर एक-एक प्रहर भर पड़ा रहने दें। इसके पश्चात् भली-भाँति मलकर वस्त्र में से छानकर शिलाजतु का घोल ले लें। इस जल को मिट्टी या चीनी मिट्टी के तसले अथवा कड़ाही में डालकर धूप में रख दें। जितना घन द्रव (गाढ़ा घोल) ऊपर आता जाये उसको दूसरे पात्र में डालकर धूप में रख दें, इस पर भी जो घन द्रव आता जाये उसको ले लें। इस प्रकार बार-बार लेकर दो मास में सम्पूर्ण शिलाजीत को उस घोल में से निकाल लें। यह शिलाजीत कार्य करने में समर्थ होती है और अग्नि पर रखने पर शिवलिंग या बतासा के समान हो जाती है। उसमें से धुआँ भी नहीं निकलता है। इस शुद्ध शिलाजीत को सब कामों में प्रयुक्त करना चाहिये। उक्त शिलाजीत की शिला का जो चूर्ण पात्र के तलभाग में शेष रह गया है, उसमें और उष्ण जल डालकर भली-भाँति मलकर धूप में रख दें और पूर्वोक्त विधि से शेष शिलाजीत को भी निकाल लें। वक्तव्य-हरिद्वार आदि पर्वतीय नगरों के व्यापारी बद्रीनारायण की पहाड़ियों में से शिलाजीत के पाषाणों का संग्रह किया करते हैं और देश भर में भेजते हैं। इन पाषाणों में से शिलाजीत दो प्रकार से निकाली जाती है-1. उपर्युक्त विधि से इसे 'सूर्यतापी शिलाजीत' कहते हैं और 2. अग्नि-संयोग से, जिसे अग्निती कहते हैं। इसकी विधि यह है-शिलाजीत के पाषाणों को कूटकर तथा जल में डालकर पकाया जाता है और शिलाजीत जल में घुल जाती है, शेष पाषाण-चूर्ण पृथक् होकर नीचे बैठ जाते हैं। तत्पश्चात् उस घोल को लेकर तथा अग्नि पर चढ़ाकर गाढ़ा कर लिया जाता है। दोनों में अन्तर केवल यह है कि एक के निर्माण में सूर्य का और दूसरी के निर्माण में अग्नि का ताप दिया जाता है। मण्डूर भस्म-निर्माण-विधि अक्षाङ्गारैर्धमेत् किट्टं लोहजं तद्गवां जलैः ।। 100 ।। सेचयेत् तप्ततप्तं तत्सप्तवारं पुनः पुनः। चूर्णयित्वा ततः क्वाथैर्द्विगुणैस्त्रिफलाभवैः ।। 101 ।। आलोढ्य भर्जयेद् वह्नौ मण्डूरं जायते वरम्। लोह के किट्ट अर्थात् मण्डूर को बहेड़े की लकड़ियों के कोयलों में तपा-तपाकर सात बार गोमूत्र में बुझायें, इसके पश्चात् उसका सूक्ष्म चूर्ण बनाकर तथा द्विगुण त्रिफला के क्वाथ में मिलाकर अग्नि पर चढ़ाकर भून दें। इस प्रकार उत्तम मण्डूर भस्म बन जाता है। वक्तव्य-मंडूर जितना ही पुराना हो उतना ही उत्तम समझा जाता है। उक्त विधि से बनायी हुई मण्डूर भस्म का वर्ण काला होता है और यदि इसको त्रिफला एवं गोमूत्र की दस-बीस पुटें दे दी जायें तो रक्तवर्ण की उत्तम भस्म तैयार हो जाती है। लोह को जब अधिक परिमाण में गलाया जाता है, तो उसकी जो मैल निकल कर पृथक् हो जाती है, उसे 'मण्डूर' कहते हैं। मण्डूर भस्म पाण्डुरोग की उत्तम औषध है। क्षार बनाने की विधि क्षीरवृक्षस्य काष्ठानि शुष्काण्यग्नौ प्रदीपयेत् ।। 102 ।। नीत्वा तद्भस्म मृत्पात्रे क्षिप्त्वा नीरे चतुर्गुणे। विमर्द्य धारयेद् रात्रौ प्रातरच्छं जलं नयेत् ।। 103 ।। तन्नीशं क्वाथयेद् वह्नौ यावत्सर्वं विशुष्यति। ततः पात्रात् समुल्लिख्य क्षारो ग्राह्यः सितप्रभः ।। 104 ।। चूर्णाभः प्रतिसार्यः स्यात् पेयः स्यात् क्वाथवत् स्थितः । इति क्षारद्वयं धीमान्युक्तकार्येषु योजयेत् ।। 105 ।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे धातुशोधनमारणकल्पना नामैकादशोऽध्यायः ।। 11 ।। क्षीरिवृक्ष (पलाश तथा आक आदि) की सूखी लकड़ियों को अग्नि द्वारा जला दें और उस भस्म को लेकर मिट्टी के पात्र में चौगुने जल में घोलकर रात भर पड़ा रहने दें और प्रातःकाल स्वच्छ जल (इस जल में क्षार घुला रहता है) को सावधानी के साथ ले लें। इस जल को अग्नि पर तब तक पकायें जब तक सम्पूर्ण जल सूख न जाये। इसके पश्चात् पात्र से खुरच कर सफेद वर्ण युक्त क्षार ग्रहण कर लें। क्षार दो प्रकार का होता है-1. चूर्ण जैसा, इसका नाम 'प्रतिसारणीय क्षार' है और 2. क्वाथ जैसा तरल क्षार इसका नाम 'पानीय क्षार' है। इन क्षारों को विद्वान् चिकित्सक योग्य कार्यों में प्रयुक्त करें।

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