भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 356 में से

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पृष्ठ 226

190 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ मध्यमखण्डे धूमसार (घर का धुआँ), रस (पारद), तोरी (फिटकरी), | उक्त द्रव्य उसके आधे भाग में आ जाये। इतने द्रव्यों का पाक शुद्ध गन्धक तथा नौसादर सबको समान भाग में लेकर अम्ल | 36 घंटे में हो जाता है। अधिक द्रव्यों के लिए अधिक समय (काँजी अथवा नींबू) के रस से एक प्रहर तक मर्दन करें। | की आवश्यकता होती है। कभी-कभी उबाल खाकर कुछ उसके बाद कपड़मिट्टी की हुई काचकूपी (आतशी शीशी) | द्रव्य बाहर निकल जाता है और बालू पर गिरकर जम जाता में डाल दें तथा उसके मुख पर मुद्रा (डाट) देकर सुखा लें। | है। इसको फिर शीशी में डाल देना चाहिये। उबाल आते ही फिर एक नाँद या कुण्ड के तलभाग में एक रुपया भर का छेद | अग्नि मन्द कर देनी चाहिये। कभी-कभी शीशी फूट भी करें। इस छिद्र पर अभ्रक का टुकड़ा रख देना चाहिये। नाँद में | जाती है। ऐसा हो जाने पर तत्काल अग्नि को बुझा दें और कूपी के गले तक बालू भर दें। फिर उस नाँद को चूल्हे पर | यदि शीशी में अग्नि जल रही हो तो बालू से बुझा दें। शीतल चढ़ाकर धीर-धीर अग्नि दें और फिर अग्नि को क्रमशः | हो जाने पर उक्त द्रव्य को लेकर दूसरी शीशी में इसका पाक अधिक करते जायें, इस प्रकार बारह प्रहर (36 घंटे) में पारद | करें। यद्यपि आचार्य शार्ङ्गधर ने 'म्रियते सूतकोत्तमः' और मर जाता है। स्वांग शीतल हो जाने पर शीशी को धीरे से तोड़ | 'अधःस्थं मृतसूतं' कहकर पारद का मारण लिखा है, तथापि दें और शीशी के ऊपरी भाग (गर्दन) में लगी हुई गन्धक | इसे पारद का मूर्च्छन-संस्कार समझना चाहिये। स्मरण रहे को छोड़कर अधोभाग में स्थित मृतपारद को लेकर सब कार्यों | कि सभी पारद-गन्धक के यौगिक रससिन्दूर तथा चन्द्रोदय में प्रयुक्त करें। | आदि कूपीपक्वरसायन इसी विधि से बनाये जाते हैं। अन्तर वक्तव्य-उक्त विधि से 'रससिन्दूर' तैयार किया जाता | केवल द्रव्यों तथा उनके परिमाण का होता है, रससिन्दूर में है। पीसने पर उसका वर्ण लाल सिंगरह जैसा होता है। पारद- | पारद से तिगुनी गन्धक दी जाती है और चन्द्रोदय में छः गुनी गन्धक की कज्जली बनाकर तब धूमसार आदि दूसरे द्रव्य | गन्धक तथा पारद से अष्टमांश सुवर्ण। चन्द्रोदय में सुवर्ण एक इसमें मिलाने चाहिये। पिठरी (नाँद) के बाहर भी कपड़मिट्टी | भाग विलीन हो जाता है और तीन भाग शीशी के तलभाग में कर देनी चाहिये। आतशी शीशी पर सात कपड़मिट्टी करके | भस्म रूप में पड़ा मिल जाता है। इसको टंकण तथा नौसादर भली-भाँति सुखा लें। इस शीशी का मुख पहले ही बन्द नहीं | के साथ तपाने से पुनः सुवर्ण बन जाता है। करना चाहिये, अपितु जब सब द्रव्यों का पर्याप्त पाक हो | पारद-मारण-विधि जाये अर्थात् शीशी के भीतर लालिमा दिखलायी पड़ने लगे | अपामार्गस्य बीजानां मूषायुग्मं प्रकल्पयेत्। तब उसका मुख बन्द करना चाहिये, अन्यथा शीशी टूट जाने | तत्सम्पुटे न्यसेत् सूतं मलयूदुग्धमिश्रितम्॥ ३५॥ का भय रहता है। शीशी का मुख खड़िया मिट्टी के डाट से | द्रोणपुष्पीप्रसूनानि विडङ्गमिरिमेदकः । बन्द कर ऊपर से गुड़ चूना को जल में सानकर लेप कर दें। | एतच्चूर्णमधोध्वं च दत्त्वा मुद्रां प्रदीयते॥ ३६॥ डाट लगाने के पूर्व शीशी के मुख में लोहे की मोटी छड़ को | तं गोलं सन्थयेत् सम्यङ्‌मृन्मूषासम्पुटे सुधीः । आग में तपाकर बार-बार डालते रहना चाहिये ताकि शीशी | मुद्रां दत्त्वा शोधयित्वा ततो गजपुटे पचेत् ॥ ३७॥ के गले में लगे हुये गन्धक आदि द्रव्य जलते रहें, अर्थात् | एकमेकपुटेनैव जायते भस्म सूतकम् । शीशी का गला रुकने न पाये। छड़ डालते समय शीशी में से | अपामार्ग (चिरचिटा) के बीजों का कल्क बनाकर दो सीटी की-सी ध्वनि निकला करती है, उससे घबड़ाना नहीं | मूषा (सिकोरा) बनायें और इनके सम्पुट में गूलर के दूध में चाहिये। कपड़मिट्टी के लिए निम्न वस्तुयें आवश्यक होती | पीसा हुआ पारद रख दें, किन्तु पारद के नीचे तथा ऊपर हैं-पोतनी (चिकनी) मिट्टी, बालू, कत्था तथा सेंधा नमक | द्रोणपुष्पी (गूमा) के पुष्पों, वायविडंग तथा इरिमेदक इन सब द्रव्यों को एक साथ घोल लेना चाहिये। कपड़ा पतला | (दुर्गन्धखैर) का चूर्ण देकर (डाट) लगायें। फिर इसको या मलमल का होना चाहिये। नाँद के छिद्र पर अभ्रक का | मिट्टी के सिकोरों के सम्पुट में रखकर भली-भाँति सन्धि- टुकड़ा रखकर ऊपर नमक का चूर्ण बिछा देना चाहिये। इसमें | बन्ध कर दें और कपड़मिट्टी कर सुखा लें तथा गजपुट में बेर या बबूर की लकड़ी की आँच दें। उक्त सब पदार्थ आठ- | रखकर पुट दें। इस प्रकार एक ही पुट में पारद की भस्म हो आठ तोला लेने चाहिये। आतशी शीशी इतनी बड़ी हो कि | जाती है।